BHU में इतिहास-विज्ञान से ऊब रहे छात्र, इन कोर्स के लिए मची है लूट; क्या है वजह
बीएचयू पीजी दाखिले में छात्रों का रुझान बदल रहा है। युवा अब पारंपरिक विषयों की जगह रोजगार परक प्रोफेशनल और वोकेशनल कोर्सेज में अपनी सबसे गहरी दिलचस्पी दिखा रहे हैं।

एक वक्त था जब यूनिवर्सिटी में दाखिला लेने वाले नौजवानों का सबसे बड़ा सपना किसी तरह एमए या एमएससी की डिग्री हासिल करना होता था। तब इतिहास, राजनीति विज्ञान, या फिर फिजिक्स और केमिस्ट्री जैसे पारंपरिक विषयों का रुतबा ही कुछ और था। लेकिन अब हवा का रुख पूरी तरह से बदल चुका है। आज का युवा सिर्फ डिग्री के लिए कॉलेज नहीं जा रहा, बल्कि वह अपने मुस्तक़बिल को लेकर बेहद संजीदा है। बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी (बीएचयू) के पोस्ट ग्रेजुएट (पीजी) दाखिलों के ताजा आंकड़े इसी बदलती हुई हकीकत को बयां कर रहे हैं। अब तालीम का मतलब सिर्फ किताबें पढ़ना नहीं रह गया है, बल्कि एक ऐसा हुनर सीखना हो गया है जो सीधे रोजगार से जुड़ता हो।
प्रोफेशनल कोर्सेज में हाउसफुल का बोर्ड
छात्रों का रुझान अब रोजगारपरक और व्यावसायिक कोर्सेज की तरफ तेजी से बढ़ रहा है। हालत यह है कि शिक्षाशास्त्र (बीएड, एमएड), पर्यावरण विज्ञान (एनवायरमेंटल साइंस), फूड ऐंड न्यूट्रिशन, और डेयरी एवं फूड प्रोसेसिंग टेक्नोलॉजी जैसे पाठ्यक्रमों में मारामारी मची हुई है। इन कोर्सेज में खाली सीटें उंगलियों पर गिनी जा सकती हैं। कुछ विभागों में तो आलम यह है कि स्पॉट राउंड के लिए एक भी सीट बची ही नहीं है। खासकर शिक्षाशास्त्र की बात करें, तो बीएचयू के मुख्य परिसर और उससे जुड़े तमाम कॉलेजों की सारी सीटें सामान्य राउंड में ही खचाखच भर चुकी हैं।
इस बदलते हुए रुझान को देखते हुए यूनिवर्सिटी प्रशासन ने भी पिछले साल एक बड़ा कदम उठाया था। छात्रों की घटती दिलचस्पी को भांपते हुए 32 पारंपरिक कोर्सेज में 15 से 40 फीसदी तक सीटें घटा दी गई थीं। यह फैसला इस बात का सुबूत है कि सिर्फ किताबी ज्ञान वाले कोर्सेज अब अपनी चमक खो रहे हैं।
कला और सामाजिक विज्ञान के हाल बेहाल
वाराणसी के इस प्रतिष्ठित संस्थान में दाखिले की जो तस्वीर उभर कर सामने आ रही है, वह कई विभागों के लिए चिंता का सबब बन सकती है। खाली सीटों की लंबी-चौड़ी लिस्ट साफ बता रही है कि कला और सामाजिक विज्ञान के साथ-साथ पारंपरिक विज्ञान के विषयों से भी छात्रों का मोहभंग हो रहा है। अलग-अलग संकायों और संबद्ध कॉलेजों को मिला लिया जाए, तो लगभग 2400 सीटें अब भी खाली पड़ी हैं। इन्हें भरने के लिए यूनिवर्सिटी को स्पॉट राउंड का सहारा लेना पड़ रहा है। उधर, बीएचयू प्रशासन 30 जुलाई से नियमित कक्षाएं शुरू करने की पूरी तैयारी कर चुका है।
स्पॉट राउंड के आंकड़ों पर नजर डालें तो कला संकाय के कई बड़े और नामी विषयों में दर्जनों सीटें खाली हैं। एमए दर्शनशास्त्र (फिलोसोफी) का हाल यह है कि मुख्य कैंपस और कॉलेजों में 20 से ज्यादा सीटें अलग-अलग श्रेणियों में राह देख रही हैं। एमए बंगाली में भी दर्जनों कुर्सियां खाली हैं। वहीं, एमए हिंदी, इतिहास, राजनीति विज्ञान, समाजशास्त्र, संस्कृत, उर्दू, अर्थशास्त्र और अंग्रेजी जैसे विषयों में भी बात स्पॉट राउंड तक जा पहुंची है।
अगर आंकड़ों को थोड़ा करीब से देखें, तो एमए हिंदी में सामान्य वर्ग की 8, ओबीसी की 1 और अन्य श्रेणियों की कई सीटें बची हुई हैं। एमए इतिहास में सामान्य की 6 और ओबीसी की 5 सीटें खाली हैं। दर्शनशास्त्र विभाग में सामान्य वर्ग की 4, एससी की 6 और ओबीसी की 1 सीट अब भी किसी छात्र के इंतजार में है।
कानून और विज्ञान के पारंपरिक विषयों से भी रूठे छात्र
ऐसा नहीं है कि सिर्फ आर्ट्स के विषयों का क्रेज कम हुआ है, बल्कि लॉ (कानून) और साइंस में भी यही कहानी दोहराई जा रही है। एलएलबी (ऑनर्स) जैसे प्रतिष्ठित कोर्स में इस बार उम्मीद से काफी कम आवेदन आए हैं। यहां स्पॉट राउंड के लिए सामान्य वर्ग की 14, एससी की 6, एसटी की 3, ईडब्ल्यूएस की 6 और ओबीसी की 8 सीटें खाली रह गई हैं। एलएलएम में भी कई सीटें बच गई हैं।
सबसे ज्यादा हैरानी तो विज्ञान के पारंपरिक विषयों को देखकर होती है। एमएससी फिजिक्स में सामान्य और ओबीसी की 3-3 सीटें, एमएससी केमिस्ट्री में 4 सामान्य और 1 ओबीसी सीट, और एमएससी मैथेमेटिक्स में 5 सामान्य सीटें खाली हैं। वहीं, एमएससी बायोटेक्नोलॉजी में 12 सामान्य, 5 एससी और 8 ओबीसी सीटें स्पॉट राउंड का हिस्सा बन गई हैं। मॉलिक्यूलर एंड ह्यूमन जेनेटिक्स में भी सामान्य वर्ग की 12 सीटें रिक्त हैं। यह इस बात का साफ इशारा है कि पुरानी ढर्रे वाली साइंस की पढ़ाई में अब युवाओं की वो दिलचस्पी नहीं रही।
रोजगार की तलाश में बदलता युवा
आखिर यह बदलाव आ क्यों रहा है? इस सवाल पर शिक्षा जगत के जानकारों और शिक्षाविदों का कहना है कि इसके पीछे नई शिक्षा नीति (NEP), तेजी से बदलता जॉब मार्केट और स्किल बेस्ड (कौशल आधारित) पढ़ाई की बढ़ती मांग सबसे बड़ी वजह है। आज का युवा जानता है कि सिर्फ एक सादी एमए या एमएससी की डिग्री उसे वो नौकरी नहीं दिला सकती, जो एक प्रोफेशनल या इंटरडिसिप्लिनरी कोर्स दिला सकता है। फूड टेक्नोलॉजी हो या एनवायरमेंटल साइंस, इन क्षेत्रों में इंडस्ट्री सीधे तौर पर युवाओं को हाथों-हाथ ले रही है।
लेखक के बारे में
Himanshu Tiwariशॉर्ट बायो: हिमांशु तिवारी पिछले 10 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं और मौजूदा वक्त में लाइव हिन्दुस्तान के करियर टीम से जुड़े हुए हैं।
परिचय एवं अनुभव
हिमांशु तिवारी डिजिटल पत्रकारिता की दुनिया का एक जाना-पहचाना नाम हैं। बीते 10 सालों से वह लगातार पत्रकारिता में सक्रिय हैं और इस वक्त लाइव हिन्दुस्तान में चीफ सब एडिटर के तौर पर काम कर रहे हैं और बीते 3 साल से वह इस संस्थान से जुड़े हैं। शिक्षा, करियर, नौकरियों, नीट, जेईई, बैंकिंग, एसएससी और यूपीएससी, यूपीपीएससी, बीपीएससी और आरपीएससी जैसी सिविल सेवा परीक्षाओं से जुड़े मुद्दों पर उनकी खास पकड़ मानी जाती है। हिमांशु ने साल 2016 में पत्रकारिता की शुरुआत एबीपी न्यूज के डिजिटल प्लेटफॉर्म से किया। इसके बाद वह इंडिया टीवी और जी न्यूज (डीएनए) जैसे बड़े न्यूज चैनलों के डिजिटल प्लेटफॉर्म का भी हिस्सा रह चुके हैं। हिमांशु तिवारी सिर्फ पत्रकार नहीं, बल्कि एक सजग पाठक और आजीवन विद्यार्थी हैं, उनकी यही खूबी उनके कार्य में परिलक्षित होती है। उनका मानना है कि इन परीक्षाओं से जुड़ी सही और समय पर जानकारी लाखों युवाओं के भविष्य को दिशा दे सकती है, इसलिए वह इस बीट को सिर्फ खबर नहीं, बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी की तरह देखते हैं।
लेखन की सोच और मकसद
हिमांशु के लिए पत्रकारिता का मतलब सिर्फ सूचना देना नहीं है, बल्कि पाठक को सोचने की जगह देना भी है। खासकर करियर और शिक्षा के क्षेत्र में वह यह मानते हैं कि एक गलत या अधूरी खबर किसी छात्र की पूरी तैयारी को भटका सकती है। इसलिए उनके लेखन में सरल भाषा, ठोस तथ्य और व्यावहारिक नजरिया हमेशा प्राथमिकता में रहता है। उनकी कोशिश रहती है कि पाठक को सिर्फ खबर की जानकारी ही न हो, बल्कि यह भी समझ आए कि उस खबर का उसके जीवन और भविष्य से क्या रिश्ता है।
शिक्षा और अकादमिक पृष्ठभूमि
हिमांशु मूल रूप से उत्तर प्रदेश के बलिया जिले से ताल्लुक रखते हैं। उन्होंने कलकत्ता विश्वविद्यालय से स्नातक की पढ़ाई की और फिर जामिया मिलिया इस्लामिया, नई दिल्ली से पत्रकारिता के गुर सीखे। जामिया में मिली ट्रेनिंग ने उन्हें यह समझ दी कि पत्रकारिता सिर्फ तेज खबर लिखने का नाम नहीं, बल्कि तथ्यों की जांच, संदर्भ की समझ और संतुलित नजरिए से बात रखने की कला है।
रुचियां और निजी झुकाव
काम से इतर हिमांशु की गहरी रुचि समकालीन इतिहास, समानांतर सिनेमा और दर्शन में रही है। राजनीति और विदेश नीति पर पढ़ना-लिखना उन्हें विशेष रूप से पसंद है। इसी रुचि के चलते उन्होंने दो लोकसभा चुनावों और दर्जनों विधानसभा चुनावों की कवरेज की, जहां राजनीति को उन्होंने बेहद नजदीक से देखा और समझा। चुनावी आंकड़ों की बारीकियां, नेताओं के भाषण, जमीनी मुद्दे और जनता की प्रतिक्रियाएं, इन सभी पहलुओं को समेटते हुए उन्होंने सैकड़ों खबरें और विश्लेषण तैयार किए, जो राजनीतिक प्रक्रिया की गहरी समझ को दर्शाते हैं।
विशेषज्ञताएं
- शिक्षा, करियर और नौकरियों से जुड़ी खबरों पर विशेष रुचि और निरंतर लेखन
- नीट, जेईई और राज्यवार बोर्ड परीक्षाओं से जुड़े मुद्दों, बदलावों और परिणामों पर गहन फोकस
- UPSC, UPPSC, MPPSC, BPSC, RPSC और JPSC जैसी सिविल सेवा परीक्षाओं की तैयारी, पैटर्न और नीतिगत पहलुओं पर पैनी नजर
- अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम और विदेश नीति से जुड़े विषयों का विश्लेषणात्मक लेखन
- राजनीति, चुनावी आंकड़ों और जमीनी मुद्दों पर सरल और तथ्यपरक एक्सप्लेनर तैयार करने का अनुभव


