40 मिनट तक कराया फाउंडर ने इंतजार, सॉरी तक नहीं बोला, कैंडिडेट ने ठुकरा दी लाखों की नौकरी
बेंगलुरु के एक आंत्रप्रेन्योर ने नौकरी का शानदार ऑफर सिर्फ इसलिए ठुकरा दिया क्योंकि इंटरव्यू लेने वाला फाउंडर चालीस मिनट की देरी से आया और उसने माफी भी नहीं मांगी।

सोचिए आप किसी बड़ी कंपनी में नौकरी के लिए इंटरव्यू देने गए हैं। आपने पूरी तैयारी की है, मन में कई उम्मीदें हैं और आप वक्त पर वहां पहुंच भी जाते हैं। लेकिन जिस इंसान को आपका इंटरव्यू लेना है, वो पूरे 40 मिनट की देरी से आता है। हद तो तब हो जाती है जब वो शख्स अपनी इस देरी के लिए एक बार माफी तक मांगना जरूरी नहीं समझता। ऐसे में आपका रिएक्शन क्या होगा? जाहिर है, आपको बुरा लगेगा और शायद गुस्सा भी आए। बेंगलुरु के रहने वाले एक आंत्रप्रेन्योर के साथ बिल्कुल ऐसा ही हुआ। लेकिन उन्होंने इसके बाद जो किया, वो आज इंटरनेट पर चर्चा का विषय बन गया है।
एक वाकये ने खोल दी फाउंडर की पोल
हायरिंग स्टार्टअप 'बाइनरी' के फाउंडर शिखर सक्सेना ने हाल ही में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर अपने पुराने दिनों का एक किस्सा शेयर किया। उन्होंने बताया कि कैसे उन्होंने एक बहुत ही बढ़िया जॉब ऑफर को सिर्फ इसलिए लात मार दी क्योंकि कंपनी का फाउंडर इंटरव्यू के लिए काफी लेट आया था। सबसे ज्यादा खटकने वाली बात ये थी कि उस फाउंडर के चेहरे पर अपनी इस देरी के लिए कोई पछतावा नहीं था, उसने कैंडिडेट को 'सॉरी' तक नहीं कहा। शिखर के मुताबिक, इस एक वाकये ने उस फाउंडर की असलियत उनके सामने रख दी। उन्हें लगा कि जो इंसान दूसरों के वक्त की कद्र नहीं कर सकता, उसके साथ काम करना किसी भी लिहाज से सही नहीं है।
एक्स पोस्ट में झलका खराब वर्क कल्चर का दर्द
अपने एक्स पोस्ट में शिखर लिखते हैं, "मैंने एक बार एक बहुत ही मशहूर फाउंडर के साथ इंटरव्यू दिया था। उसने मुझे 40 मिनट तक इंतजार करवाया और उसके बाद सॉरी तक नहीं बोला।" शिखर ने बताया कि इस छोटी सी बात ने उनके मन में एक बड़ी घंटी बजा दी। उन्होंने तय किया कि वो इस कंपनी के साथ कभी नहीं जुड़ेंगे। मजे की बात ये है कि उनका ये फैसला बाद में बिल्कुल सही साबित हुआ। शिखर ने अपने पोस्ट में आगे बताया कि कुछ वक्त बाद उन्हें उन लोगों से उस कंपनी की खौफनाक कहानियां सुनने को मिलीं, जिन्होंने उस फाउंडर के साथ काम किया था। उनका वो अंदाजा सौ टका सच निकला।
हमदर्दी की कमी और घमंड का सीधा कनेक्शन
अक्सर कॉर्पोरेट दुनिया में ये मान लिया जाता है कि बॉस हमेशा सही होता है और कैंडिडेट को हर हाल में एडजस्ट करना चाहिए। लेकिन अब ये नजरिया तेजी से बदल रहा है। शिखर का मानना है कि किसी इंसान का बर्ताव, खासकर छोटी-छोटी बातें जैसे कि देरी होने पर माफी मांगना या किसी के वक्त की अहमियत समझना, उसके चरित्र के बारे में बहुत कुछ बता देता है। उनके मुताबिक, अगर कोई गलती होने पर माफी नहीं मांगता है या बात का फॉलो-अप नहीं करता है, तो ये साफ तौर पर उसमें हमदर्दी की भयंकर कमी को दिखाता है। उन्होंने लोगों को सीधे शब्दों में सलाह दी कि ऐसे लोगों से जितना हो सके, दूर ही रहना चाहिए।
लोग बोले- ये रेड फ्लैग है
जैसे ही शिखर ने ये पोस्ट शेयर किया, इंटरनेट पर मानों एक नई बहस छिड़ गई। लोग जमकर अपनी भड़ास निकाल रहे हैं और अपने-अपने कड़वे अनुभव शेयर कर रहे हैं। ज्यादातर यूजर्स शिखर के फैसले की तारीफ कर रहे हैं। उनका कहना है कि हायरिंग का प्रोसेस अक्सर किसी भी कंपनी के वर्क कल्चर का पहला आईना होता है। अगर शुरुआत ही इतनी खराब हो, तो आगे क्या ही उम्मीद की जा सकती है। कमेंट सेक्शन में आस्था नाम की एक यूजर ने लिखा, "माफी ना मांगना एक बहुत बड़ा रेड फ्लैग है।" लोग इसे सीधे तौर पर बॉस के अहंकार और घमंड से जोड़कर देख रहे हैं।
इस वायरल पोस्ट पर बात करते हुए एक और शख्स ने अपनी कहानी साझा की। उसने बताया कि कैसे उसके एक दोस्त ने एक फाउंडर के साथ मीटिंग फिक्स कराई थी। लेकिन जब वो पहुंचा तो उस फाउंडर का पहला ही सवाल था- "हम क्यों मिल रहे हैं?" उस फाउंडर को मीटिंग के बारे में कोई भनक ही नहीं थी और उसका रवैया ऐसा था मानो उसे जबरदस्ती घसीट कर वहां बिठाया गया हो। उस शख्स ने बताया कि आज भी वो उस बुरे इंटरव्यू को एक पैमाना मानकर चलता है ताकि आगे सतर्क रह सके। कई लोगों का तो यहां तक कहना है कि माफी ना मांगकर वो फाउंडर असल में अपना रुतबा और पावर दिखाने की कोशिश कर रहा था।
लेखक के बारे में
Himanshu Tiwariशॉर्ट बायो: हिमांशु तिवारी पिछले 10 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं और मौजूदा वक्त में लाइव हिन्दुस्तान के करियर टीम से जुड़े हुए हैं।
परिचय एवं अनुभव
हिमांशु तिवारी डिजिटल पत्रकारिता की दुनिया का एक जाना-पहचाना नाम हैं। बीते 10 सालों से वह लगातार पत्रकारिता में सक्रिय हैं और इस वक्त लाइव हिन्दुस्तान में चीफ सब एडिटर के तौर पर काम कर रहे हैं और बीते 3 साल से वह इस संस्थान से जुड़े हैं। शिक्षा, करियर, नौकरियों, नीट, जेईई, बैंकिंग, एसएससी और यूपीएससी, यूपीपीएससी, बीपीएससी और आरपीएससी जैसी सिविल सेवा परीक्षाओं से जुड़े मुद्दों पर उनकी खास पकड़ मानी जाती है। हिमांशु ने साल 2016 में पत्रकारिता की शुरुआत एबीपी न्यूज के डिजिटल प्लेटफॉर्म से किया। इसके बाद वह इंडिया टीवी और जी न्यूज (डीएनए) जैसे बड़े न्यूज चैनलों के डिजिटल प्लेटफॉर्म का भी हिस्सा रह चुके हैं। हिमांशु तिवारी सिर्फ पत्रकार नहीं, बल्कि एक सजग पाठक और आजीवन विद्यार्थी हैं, उनकी यही खूबी उनके कार्य में परिलक्षित होती है। उनका मानना है कि इन परीक्षाओं से जुड़ी सही और समय पर जानकारी लाखों युवाओं के भविष्य को दिशा दे सकती है, इसलिए वह इस बीट को सिर्फ खबर नहीं, बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी की तरह देखते हैं।
लेखन की सोच और मकसद
हिमांशु के लिए पत्रकारिता का मतलब सिर्फ सूचना देना नहीं है, बल्कि पाठक को सोचने की जगह देना भी है। खासकर करियर और शिक्षा के क्षेत्र में वह यह मानते हैं कि एक गलत या अधूरी खबर किसी छात्र की पूरी तैयारी को भटका सकती है। इसलिए उनके लेखन में सरल भाषा, ठोस तथ्य और व्यावहारिक नजरिया हमेशा प्राथमिकता में रहता है। उनकी कोशिश रहती है कि पाठक को सिर्फ खबर की जानकारी ही न हो, बल्कि यह भी समझ आए कि उस खबर का उसके जीवन और भविष्य से क्या रिश्ता है।
शिक्षा और अकादमिक पृष्ठभूमि
हिमांशु मूल रूप से उत्तर प्रदेश के बलिया जिले से ताल्लुक रखते हैं। उन्होंने कलकत्ता विश्वविद्यालय से स्नातक की पढ़ाई की और फिर जामिया मिलिया इस्लामिया, नई दिल्ली से पत्रकारिता के गुर सीखे। जामिया में मिली ट्रेनिंग ने उन्हें यह समझ दी कि पत्रकारिता सिर्फ तेज खबर लिखने का नाम नहीं, बल्कि तथ्यों की जांच, संदर्भ की समझ और संतुलित नजरिए से बात रखने की कला है।
रुचियां और निजी झुकाव
काम से इतर हिमांशु की गहरी रुचि समकालीन इतिहास, समानांतर सिनेमा और दर्शन में रही है। राजनीति और विदेश नीति पर पढ़ना-लिखना उन्हें विशेष रूप से पसंद है। इसी रुचि के चलते उन्होंने दो लोकसभा चुनावों और दर्जनों विधानसभा चुनावों की कवरेज की, जहां राजनीति को उन्होंने बेहद नजदीक से देखा और समझा। चुनावी आंकड़ों की बारीकियां, नेताओं के भाषण, जमीनी मुद्दे और जनता की प्रतिक्रियाएं, इन सभी पहलुओं को समेटते हुए उन्होंने सैकड़ों खबरें और विश्लेषण तैयार किए, जो राजनीतिक प्रक्रिया की गहरी समझ को दर्शाते हैं।
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- अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम और विदेश नीति से जुड़े विषयों का विश्लेषणात्मक लेखन
- राजनीति, चुनावी आंकड़ों और जमीनी मुद्दों पर सरल और तथ्यपरक एक्सप्लेनर तैयार करने का अनुभव


