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Ambedkar Mahaparinirvan Diwas : महापरिनिर्वाण दिवस पर जानें बाबासाहेब अंबेडकर के जीवन से जुड़ी 25 दिलचस्प बातें

Ambedkar Mahaparinirvan Diwas : महापरिनिर्वाण दिवस पर जानें बाबासाहेब अंबेडकर के जीवन से जुड़ी 25 दिलचस्प बातें

संक्षेप:

Ambedkar death anniversary Mahaparinirvan Diwas 2025 : भगवान बुद्ध के निधन को असल महापरिनिर्वाण कहा गया है। यह बौद्ध कैलेंडर के अनुसार सबसे पवित्र दिन होता है। महापरिनिर्वाण दिवस डॉ. बीआर अंबेडकर की परिवर्तनकारी विरासत के लिए श्रद्धांजलि के रूप में बहुत मायने रखता है।

Dec 06, 2025 06:17 am ISTPankaj Vijay लाइव हिन्दुस्तान
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BR Ambedkar Punyatithi mahanirvan divas : हर साल देश में 6 दिसंबर डॉ. भीम राव अंबेडकर की पुण्यतिथि का दिन महापरिनिर्वाण दिवस के रूप में मनाया जाता है। 6 दिसंबर 1956 को भारत ने अपने समाज सुधारक, संविधान निर्माता और दलितों के मसीहा बाबासाहेब अंबेडकर को खो दिया था। शोषितों और समाज के निचले तबकों के संरक्षक के रूप में प्रसिद्ध बाबासाहेब का निधन उनके अनुयायियों और देशभर के नागरिकों के लिए गहरा झटका था। डॉ. अंबेडकर ने वर्ष 1956 में हिंदू धर्म छोड़कर बौद्ध धर्म अपनाया था वह हिंदू धर्म के कई तौर तरीकों से काफी दुखी हो गए थे। परिनिर्वाण बौद्ध धर्म के प्रमुख सिद्धांतों और लक्ष्यों में से एक है। इसका मतलब 'मौत के बाद निर्वाण' होता है। बौद्ध धर्म के मुताबिक जो व्यक्ति निर्वाण प्राप्त करता है वह संसारिक इच्छाओं, मोह माया से मुक्त हो जाता है। निर्वाण की अवस्था हासिल करना बेहद कठिन होता है। इसके लिए किसी को बहुत ही सदाचारी और धर्मसम्मत जीवन जीना होता है। 80 साल की आयु में भगवान बुद्ध के निधन को असल महापरिनिर्वाण कहा गया है।

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डॉ. भीमराव रामजी आंबेडकर बड़े समाज सुधारक और विद्वान थे। उन्होंने अपना पूरा जीवन जातिवाद को खत्म करने और गरीब, दलितों, पिछड़े वर्गों के उत्थान के लिए अर्पित किया। उनके अनुयायियों का मानना है कि उनके गुरु भगवान बुद्ध की तरह ही काफी सदाचारी थे। डॉ. आंबेडकर अपने महान कार्य व सदाचारी जीवन की वजह से निर्वाण प्राप्त कर चुके हैं। यही वजह है कि उनकी पुण्यतिथि को महापरिनिर्वाण दिवस या महापरिनिर्वाण दिन के तौर पर मनाया जाता है।

अंबेडकर पुण्यतिथि महापरिनिर्वाण दिवस के दिन अंबेडकर के अनुयायी और अन्य भारतीय नेता मुंबई स्थित दादर चैत्य भूमि पर जाते हैं और भारतीय संविधान के निर्माता को श्रद्धांजलि देते हैं। लोग उनकी प्रतिमा पर फूल-माला चढ़ाते हैं। दीपक व मोमबत्तियां जलाकर उन्हें श्रद्धांजलि देते हैं। कई जगहों पर उनकी याद में कार्यक्रम होते हैं। उनके विचारों को याद किया जाता है।

यहां पढ़ें बीआर अंबेडकर से जुड़ी कुछ रोचक व खास बातें-

1. क्यों कहते हैं संविधान निर्माता, क्या था रोल

डॉ भीमराव आंबेडकर को संविधान निर्माता माना जाता है। वो संविधान की ड्राफ्टिंग कमेटी (मसौदा समिति) के अध्यक्ष थे। संविधान का मसौदा तैयार करने का ज्यादातर काम सिर्फ आंबेडकर के कंधो पर आ गया था। इस समिति की जिम्मेदारी संविधान का लिखित प्रारूप प्रस्तुत करना था। वैसे तो इस समति में 7 सदस्य (कन्हैयालाल मुंशी, मोहम्मद सादुल्लाह, अल्लादि कृष्णस्वामी अय्यर, गोपाळ स्वामी अय्यंगार, एन. माधव राव और टीटी कृष्णामचारी) थे लेकिन मृत्यु, बीमारी और अन्य व्यस्तताओं की वजह से कमेटी के ज्यादातर सदस्य मसौदा बनाने में पर्याप्त योगदान नहीं दे पाए थे। यह बात ड्राफ्टिंग कमेटी के सदस्य टी.टी कृष्णामचारी ने खुद नवंबर 1948 में संविधान सभा में की थी।

टी. टी. कृष्णमाचारी ने नवम्बर 1948 में संविधान सभा के सामने कहा था, ‘सम्भवत: सदन इस बात से अवगत है कि आपने ( ड्राफ्टिंग कमेटी में) में जिन सात सदस्यों को नामांकित किया है, उनमें एक ने सदन से इस्तीफा दे दिया है और उनकी जगह अन्य सदस्य आ चुके हैं। एक सदस्य की इसी बीच मृत्यु हो चुकी है और उनकी जगह कोई नए सदस्य नहीं आए हैं। एक सदस्य अमेरिका में थे और उनका स्थान भरा नहीं गया। एक अन्य व्यक्ति सरकारी मामलों में उलझे हुए थे और वह अपनी जिम्मेदारी का निर्वाह नहीं कर रहे थे। एक-दो व्यक्ति दिल्ली से बहुत दूर थे और सम्भवत: स्वास्थ्य की वजहों से कमेटी की कार्यवाहियों में हिस्सा नहीं ले पाए। सो कुल मिलाकर यही हुआ है कि इस संविधान को लिखने का भार डॉ. आंबेडकर के ऊपर ही आ पड़ा है। मुझे इस बात पर कोई संदेह नहीं है कि हम सब को उनका आभारी होना चाहिए कि उन्होंने इस जिम्मेदारी को इतने सराहनीय ढंग से अंजाम दिया है।’

आंबेडकर उन चंद लोगों में शामिल थे, जो ड्राफ्टिंग कमेटी का सदस्य होने के साथ-साथ शेष 15 समितियों में एक से अधिक समितियों के सदस्य थे। संविधान सभा द्वारा ड्राफ्टिंग कमेटी के अध्यक्ष के रूप में उनका चयन उनकी राजनीतिक योग्यता और कानूनी दक्षता के चलते हुए था। उन्हें कई देशों के संविधान का ज्ञान था।

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2. क्यों कही थी संविधान जलाने की बात

साल 1953 में राज्यसभा में जब संविधान संशोधन को लेकर बहस चल रही थी, तब बाबा साहेब राज्यपाल की शक्तियां बढ़ाने के मुद्दे पर अड़े थे। अल्पसंख्यकों के हितों की रक्षा पर भी वह अडिग थे। इस बहस के दौरान बाबासाहेब ने कहा कि छोटे तबके के लोगों को हमेशा डर लगा रहता है कि बहुसंख्यक उन्हें नुकसान पहुंचा सकते हैं। उन्होंने कहा था, मेरे मित्र मुझसे कहते हैं कि संविधान मैंने बनाया है। मैं बताना चाहता हूं कि इसको जलाने वाला पहला इंसान भी मैं ही होऊंगा। मुझे इसकी कोई जरूरत नहीं है क्योंकि ये किसी के लिए भी अच्छा नहीं है। यह किसी के लिए भी ठीक नहीं है। कई लोग इसे लेकर आगे बढ़ना चाहते हैं पर यह भी याद रखना होगा कि एक ओर बहुसंख्यक हैं और दूसरी ओर अल्पसंख्यक। बहुसंख्यक यह नहीं कह सकते हैं कि अल्पसंख्यकों को महत्व नहीं दें। ऐसा करने से लोकतंत्र को ही नुकसान होगा। दरअसल बाबासाहेब लोकतंत्र में अल्पसंख्यकों के अधिकार को लेकर बेहद सजग थे। वे बहुसंख्यकों द्वारा अल्पसंख्यकों के अधिकार को किसी भी तरह से हड़पने के सख्त खिलाफ थे।

उपरोक्त बयान की सफाई बाबासाहेब से दो साल बाद दी थी। उनके बयान के बाद की कहानी 1955 की है। 19 मार्च को संसद की कार्यवाही के दौरान राज्यसभा में संविधान के चौथे संशोधन से जुड़े विधेयक पर चर्चा हो रही थी। तभी कार्यवाही में हिस्सा लेने पहुंचे पंजाब के सांसद अनूप सिंह ने बाबासाहेब से पूछा कि आपने दो साल पहले संविधान को जलाने की बात क्यों कही थी। इसके बाद बाबा साहेब ने कहा पिछली बार वे इसका जवाब पूरा नहीं दे पाए थे। उन्होंने कहा कि मैंने सोच समझकर संविधान को जलाने की बात कही थी। हम लोग मंदिर इसलिए बनाते हैं क्योंकि उसमें भगवान आकर रह सके। अगर भगवान से पहले ही राक्षस आकर रहने लगें तो मंदिर को नष्ट करने के सिवाय और कोई रास्ता नहीं बचेगा। कोई यह सोचकर मंदिर नहीं बनाता कि उसमें राक्षस रहने लगें। सब चाहते हैं मंदिर में देवता ही रहें। इसलिए उन्होंने संविधान जलाने की बात कही थी। उनका मानना था कि कोई भी संविधान कितना ही अच्छा क्यों ना हो अगर उसे ढंग से लागू नहीं किया जाएगा तो वह उपयोगी साबित नहीं हो सकता।

इससे पहले जब संविधान लागू हुआ तो बाबा साहेब ने उसी दिन कहा था कि हम सबसे अच्छा संविधान लिख सकते हैं, लेकिन उसकी कामयाबी आखिरकार उन लोगों पर निर्भर करेगी, जो देश को चलाएंगे।

3. गांधी जी से क्यों नहीं बनती थी, क्यों नहीं मानते थे उन्हें महात्मा

महात्मा गांधी और बाबासाहेब अंबेडकर दोनों ने समाज सुधार के लिए अथक प्रयास किए। लेकिन कई मुद्दों पर इनके विचार काफी अलग थे। सबसे बड़ा मतभेद यह था कि गांधीजी जाति व्यवस्था से छुआछूत मिटाना चाहते थे जबकि अंबेडकर पूरी जाति व्यवस्था को खत्म करना चाहते थे। गांधी जी वर्ण-व्यवस्था के समर्थक थे। हालांकि दोनों ही दलितों की स्थिति सुधारने के पक्षधर थे। बीबीसी को दिए इंटरव्यू में एक उन्होंने कहा था कि गांधी कभी महात्मा नहीं थे। मैं उन्हें महात्मा कहने से इनकार करता हूं। मैंने अपनी जिंदगी में उन्हें कभी महात्मा नहीं कहा। इसके अलावा महात्मा गांधी ग्रामीण अर्थव्यवस्था की वकालत करते थे। वे पूर्ण विकास के लिए गांव का रुख करने के लिए कहते थे। जबकि अंबेडकर लोगों से गांव छोड़कर शहरों का रुख करने की अपील करते थे। उनका मानना था कि दलितों को बेहतर शिक्षा, तरक्की के लिए शहरों में आना चाहिए।

4. अपने जमाने के सबसे पढ़े लिखे लोगों में से एक

बीआर अंबेडकर अपने जमाने के सबसे ज्यादा पढ़े लिखे कुछेक महान विद्वान लोगों में से एक थे। उनके पास अलग अलग 32 विषयों की डिग्रियां थीं। एलफिंस्टन कॉलेज मुंबई से बीए करने के बाद वह एमए करने अमेरिका की कोलंबिया यूनिवर्सिटी चले गए। वहीं से पीएचडी भी की। इसके बाद लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से एमएससी, डीएससी किया। ग्रेज इन (बैरिस्टर-एट-लॉ) किया। एलफिंस्टन कॉलेज में वह अकेले दलित छात्र थे।

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5. किताबे पढ़ने का जबरदस्त शौक

डॉ. अंबेडकर को खूब किताबे पढ़ने का शौक था। उनके पास किताबों का विशाल व बेहतरीन संग्रह था। जॉन गुंथेर ने इनसाइड एशिया में लिखा है कि 1938 में अंबेडकर के पास 8000 किताबे थीं। उनकी मृत्यु के समय वो 35000 हो गई थीं।

6. बागबानी का शौक

बाबासाहेब अंबेडकर को बागबानी का भी शौक था। उनके बगीचे की काफी तारीफ होती थी। उन्हें अपने कुत्ते से भी बेहद प्यार था। वह कई बार खुद खाना बनाकर अपने दोस्तों को खाने पर बुलाते थे।

7. पिता की 14 संतान लेकिन सिर्फ अंबेडकर को मिला स्कूल में पढ़ने का मौका

अंबेडकर के पूर्वज ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी में सैनिक थे। पिता ब्रिटिश इंडियन आर्मी में सूबेदार थे। इस वजह से भी अंबेडकर को स्कूल में पढ़ने का मौका मिला। उस समय एक दलित और अछूत मानी जाने वाली जाति के बच्चे के लिए स्कूल जाकर पढ़ना संभव नहीं था। अंबेडकर को स्कूल में अन्य बच्चों जितने अधिकार नहीं थे। उन्हें अलग बैठाया जाता था। वह खुद पानी भी नहीं पी सकते थे। ऊंची जाति के बच्चे ऊंचाई से उनके हाथों पर पानी डालते थे।

8. इनसे से प्रेरित

अंबेडकर कबीरदास, ज्योतिबा फुले, महात्मा बौद्ध के विचारों से काफी प्रेरित थे।

9. क्या था असली नाम

अंबेडकर का असल नाम अंबावाडेकर था। यही नाम उनके पिता ने स्कूल में दर्ज भी कराया था। लेकिन उनके एक अध्यापक ने उनका नाम बदलकर अपना सरनेम 'अंबेडकर' उन्हें दे दिया। इस तरह स्कूल रिकॉर्ड में उनका नाम अंबेडकर दर्ज हुआ।

10. 9 साल की लड़की से हुई थी शादी

बाल विवाह प्रचलित होने के कारण 1906 में अंबेडकर की शादी 9 साल की लड़की रमाबाई से हुई। उस समय अंबेडकर की उम्र महज 15 साल थी।

11. डॉ. अंबेडकर के लिए अमेरिका में पढ़ाई करना बड़ौदा के गायकवाड़ शासक सहयाजी राव तृतीय से मासिक स्कॉलरशिप मिलने के कारण संभव हो सका था।

12. कई देशों के संविधानों का अध्ययन किया था

बाबासाहेब अंबेडकर की कानूनी विशेषज्ञता भारतीय संविधान के निर्माण में बहुत मददगार साबित हुआ। उन्हें संविधान निर्माता व संविधान का जनक कहा जाता है। उन्होंने संविधान बनाने से पहले कई देशों के संविधानों का अध्ययन किया था। काबिलियत के दम पर वह भारत के पहले कानून मंत्री के पद तक पहुंचे।

13. अंबेडकर दलितों पर हो रहे अत्याचार के विरुद्ध आवाज उठाने के लिए 'बहिष्कृत भारत', 'मूक नायक', 'जनता' नाम के पाक्षिक और साप्ताहिक पत्र निकालने शुरू किये। 1927 से उन्होंने छुआछूत जातिवाद के खिलाफ अपना आंदोलन तेज कर दिया। महाराष्ट्र में रायगढ़ के महाड में उन्होंने सत्याग्रह भी शुरू किया। उन्होंने कुछ लोगों के साथ मिलकर ‘मनुस्मृति’ की तत्कालीन प्रति जलाई थी। 1930 में उन्होंने कलारम मंदिर आंदोलन शुरू किया।

14. आजादी की लड़ाई के बीच आंबेडकर ने 1936 में लेबर पार्टी का गठन किया। अंबेडकर ने 1952 में बॉम्बे नॉर्थ सीट से देश का पहला आम चुनाव लड़ा था लेकिन हार गए थे। वह बार राज्यसभा से दो बार सांसद रहे।

15. कुछ विद्वानों का मानना है कि अंबेडकर नहीं चाहते थे कि अंग्रेज एक बार में भारत छोड़कर चले जाएं। दरअसल डॉ अंबेडकर वाइसराय की एग्जीक्यूटिव काउंसिल के सदस्य थे। सदस्य का दर्जा आज के समय के कैबिनेट मंत्री के बराबर होता था। जानकारों के मुताबिक उन्हें लगता था कि वह इस पद पर रहते हुए दलितों के भले के लिए कई अहम कार्य कर सकते हैं जोकि अंग्रेजों के भारत छोड़ने के बाद नहीं किए जा सकेंगे।

16. हिंदू कोड बिल पास न होने पर दे दिया था इस्तीफा

सन् 1951 में उन्होंने 'हिंदू कोड बिल' संसद में पेश किया। डॉ. आंबेडकर का मानना था कि सही मायने में प्रजातंत्र तब आएगा जब महिलाओं को पैतृक संपत्ति में बराबरी का हिस्सा मिलेगा और उन्हें पुरुषों के समान अधिकार दिए जाएंगे। संसद में अपने हिन्दू कोड बिल मसौदे को रोके जाने के बाद अंबेडकर ने मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया।

17. संघर्ष की यात्रा के दौरान कई बीमारियों से जूझते रहे

संघर्ष की यात्रा के दौरान बाबासाहेब कई बीमारियों से जूझते रहे थे। वो डायबिटीज, ब्लडप्रेशर, न्यूराइटिस और आर्थराइटिस जैसी लाइलाज बीमारियों से पीड़ित थे। डाइबिटीज के चलते उनका शरीर बेहद कमजोर हो गया था। गठिया की बीमारी के चलते वो कई कई रातों तक बिस्तर पर दर्द से परेशान रहते थे।

18. हिंदू धर्म छोड़ा

14 अक्टूबर 1956 को अंबेडकर और उनके समर्थकों ने पंचशील को अपनाते हुए बौद्ध धर्म ग्रहण किया। वह हिंदू धर्म के कई तौर तरीकों से काफी दुखी हो गए थे। 6 दिसंबर, 1956 को अंबेडकर की मृत्यु हो गई।

19. जब संविधान लागू हुआ तो बाबा साहब ने उसी दिन कहा था कि हम सबसे अच्छा संविधान लिख सकते हैं, लेकिन उसकी कामयाबी आखिरकार उन लोगों पर निर्भर करेगी, जो देश को चलाएंगे।

20. शांतिवन क्या है

नागपुर जिले के चिचोली गांव में डॉ आंबेडकर वस्तु संग्रहालय 'शांतिवन' में उनके निजी उपयोग की वस्तुएं रखी हैं। संग्रहालय के केंद्रीय कक्ष में उनकी अस्थियां रखी हुई हैं।

21. दो बार लोकसभा चुनाव हारे

भारत के संविधान निर्माता बाबा साहब आंबेडकर ने आजादी के बाद 1952 में भारत का पहला लोकसभा चुनाव लड़ा था। वे महाराष्ट्र की उत्तरी मुंबई सीट से चुनाव लड़े थे लेकिन वे हार गए। इसके बाद 1954 में बंडारा लोकसभा के लिए हुए उपचुनाव में भी आबंडेकर खड़े हुए लेकिन फिर हार गए।

22· 1938 में कांग्रेस ने अस्‍पृश्‍यों के नाम में परिवर्तन करने वाला एक विधेयक पेश किया। डॉ. अंबेडकर ने इसकी आलोचना की। उनका दृष्टिकोण था कि नाम बदलना समस्या का समाधान नहीं है।

23. डॉ. बी.आर. अंबेडकर की पुण्यतिथि पूरे देश में ‘महापरिनिर्वाण दिवस’ के रूप में मनायी जाती है।

24. 1954 में काठमांडू, नेपाल में डॉ. बाबासाहेब अंबेडकर को "जगतिक बौद्ध धर्म परिषद" में बौद्ध भिक्षुओं द्वारा "बोधिसत्व" की उपाधि से सम्मानित किया गया। खास बात यह है कि डॉ. अंबेडकर को जीवित रहते हुए ही बोधिसत्व की उपाधि से सम्मानित किया गया।

25. इसके अलावा बाबासाहेब ने भारतीय रिजर्व बैंक की स्‍थापना में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस केंद्रीय बैंक का गठन बाबासाहेब द्वारा हिल्टन यंग कमीशन को प्रस्तुत की गई अवधारणा के आधार पर किया गया था।

Pankaj Vijay

लेखक के बारे में

Pankaj Vijay
पंकज विजय लाइव हिन्दुस्तान में डिप्टी न्यूज एडिटर हैं। यहां वह करियर, एजुकेशन, जॉब्स से जुड़ी खबरें देखते हैं। पंकज को पत्रकारिता में डेढ़ दशक से ज्यादा का अनुभव है। लाइव हिन्दुस्तान के साथ जुड़ने से पहले उन्होंने एनडीटीवी डिजिटल, आजतक डिजिटल, अमर उजाला समाचार पत्र में काम किया। करियर-एजुकेशन-जॉब्स के अलावा वह विभिन्न संस्थानों में देश-विदेश, राजनीति, रिसर्च व धर्म से जुड़ी बीट पर भी काम कर चुके हैं। भारतीय जनसंचार संस्थान (आईआईएमसी), दिल्ली से हिन्दी पत्रकारिता में पीजी डिप्लोमा व डीयू से इतिहास में बीए ऑनर्स किया है। और पढ़ें
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