एम्स और केंद्रीय विश्वविद्यालयों में प्रोफेसरों की कमी, अब सरकार बढ़ाएगी और सीटें; होगी बड़ी भर्तियां
एम्स और केंद्रीय विश्वविद्यालयों में प्रोफेसरों के हजारों पद खाली हैं। आरक्षित वर्ग के उम्मीदवार न मिलने से संकट गहराया, अब सरकार कुल पद बढ़ाकर समाधान निकालने की तैयारी में है।

उच्च शिक्षण संस्थानों, एम्स और अन्य मेडिकल कॉलेजों में प्रोफेसरों के पद बड़े पैमाने पर खाली हैं। आरक्षित श्रेणियों में उम्मीदवारों का नहीं मिलना इसकी एक प्रमुख वजह है। पद रिक्त होने से कामकाज पर असर न पड़े, इसके लिए सरकार बड़ी संख्या में कुल पद बढ़ाने की तैयारी कर रही है, ताकि जरूरी संख्या मौजूद रहे।
संस्थानों में बड़े पैमाने पर पदों के खाली होने से संस्थानों का काम प्रभावित हो रहा है। इस चुनौती से निपटने के लिए सरकार कुल पदों की संख्या में वृद्धि कर सकती है। इससे सामान्य और आरक्षित दोनों श्रेणियों के पद बढ़ेंगे। ऐसे में यदि आरक्षित श्रेणी के उम्मीदवार नहीं भी मिलते हैं तो सामान्य पदों पर इतने उम्मीदवार भर्ती हो जाएंगे जिससे शिक्षण संस्थानों के कामकाज को सुचारू रूप से चलाया जा सकेगा। इस पर एम्स और अन्य संस्थानों में विचार-विमर्श की प्रक्रिया चल रही है।
खाली पद सामान्य में बदलने की प्रक्रिया लंबी: सूत्रों ने कहा कि आरक्षित श्रेणी के खाली पदों को सामान्य में बदलने की प्रक्रिया है, लेकिन वह बहुत लंबी है। इसके लिए कई बार विज्ञापन निकालने के बाद संबंधित मंत्रालय और कार्मिक मंत्रालय की अनुमति लेनी होती है। आरक्षित श्रेणियों के आयोगों से अनापत्ति हासिल करनी होती है। इसमें समय लगता है। आरक्षित पदों को एक-दूसरी आरक्षित श्रेणियों में भी भेजने की व्यवस्था है, लेकिन तीनों श्रेणियों में उपलब्धता में दिक्कत है, इसलिए इस प्रावधान का फायदा नहीं है।
एम्स में हर तीन महीने में इंटरव्यू: सूत्रों के अनुसार, रिक्त पद भरने के लिए सरकार ने कई कदम उठाए हैं। इसके तहत एम्स में हर तीन महीने में साक्षात्कार किए जाते हैं। यानी साल में चार बार भर्ती होती है। इसी प्रकार कुछ विश्वविद्यालयों ने पद रिक्त होने से छह महीने पहले भर्ती प्रक्रिया शुरू करने के लिए भी कदम उठाए हैं। लेकिन आरक्षित श्रेणियों के उम्मीदवारों की उपलब्धता चिंता का विषय बनी हुई है।
अभी यह कोशिशें हो रहीं
सरकार की ओर से सभी केंद्रीय संस्थानों से बैकलॉग रिक्तियों को तेजी से भरने के निर्देश दिए गए हैं। वहीं देशभर के विश्वविद्यालयों में आरक्षित श्रेणियों की भर्ती के लिए बड़े पैमाने पर अभियान चलाए जा रहे हैं। इसके अलावा यूजीसी ने ‘सीयू-चयन’ नाम से ऑनलाइन पोर्टल शुरू किया है। इससे केंद्रीय विश्वविद्यालयों में भर्ती प्रक्रिया आसान हुई है।
एम्स में 40 फीसदी पद खाली
सरकार की ओर से संसद और आरटीआई के जरिये जो जानकारी दी गई है, उसके अनुसार एम्स में प्रोफेसरों के 40 फीसदी पद खाली हैं। देश में 23 में से 19 एम्स संचालित हैं जिनमें 6,376 पद स्वीकृत हैं, लेकिन 2,561 पद खाली हैं। सबसे बड़ी वजह ओबीसी, एसटी, एसी पदों का खाली रह जाना है। इन तीन श्रेणियों में 49.5 फीसदी पद आरक्षित रहते हैं। सूत्रों के अनुसार, खाली पदों में 90-95 फीसदी पद आरक्षित श्रेणियों के हैं।
सेंट्रल यूनिवर्सिटी में 5400 पद खाली
इसी प्रकार देश के 45 केंद्रीय विश्वविद्यालयों में प्रोफेसरों के करीब 5,400 पद खाली हैं। इनमें एसटी के 83, एससी के 75 और ओबीसी वर्ग के करीब 80 फीसदी पद रिक्त हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने दिए थे चार माह में भर्ती के निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने हाल में उच्च शिक्षण संस्थानों में खाली पड़े शैक्षणिक और गैर-शैक्षणिक पद चार महीने में भरने का निर्देश दिया था। इन संस्थानों में 70% से अधिक पद खाली होने की रिपोर्ट के बाद, कुलपति और रजिस्ट्रार जैसे पद एक महीने में भरने को कहा गया था।
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Himanshu Tiwariशॉर्ट बायो: हिमांशु तिवारी पिछले 10 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं और मौजूदा वक्त में लाइव हिन्दुस्तान के करियर टीम से जुड़े हुए हैं।
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हिमांशु तिवारी डिजिटल पत्रकारिता की दुनिया का एक जाना-पहचाना नाम हैं। बीते 10 सालों से वह लगातार पत्रकारिता में सक्रिय हैं और इस वक्त लाइव हिन्दुस्तान में चीफ सब एडिटर के तौर पर काम कर रहे हैं और बीते 3 साल से वह इस संस्थान से जुड़े हैं। शिक्षा, करियर, नौकरियों, नीट, जेईई, बैंकिंग, एसएससी और यूपीएससी, यूपीपीएससी, बीपीएससी और आरपीएससी जैसी सिविल सेवा परीक्षाओं से जुड़े मुद्दों पर उनकी खास पकड़ मानी जाती है। हिमांशु ने साल 2016 में पत्रकारिता की शुरुआत एबीपी न्यूज के डिजिटल प्लेटफॉर्म से किया। इसके बाद वह इंडिया टीवी और जी न्यूज (डीएनए) जैसे बड़े न्यूज चैनलों के डिजिटल प्लेटफॉर्म का भी हिस्सा रह चुके हैं। हिमांशु तिवारी सिर्फ पत्रकार नहीं, बल्कि एक सजग पाठक और आजीवन विद्यार्थी हैं, उनकी यही खूबी उनके कार्य में परिलक्षित होती है। उनका मानना है कि इन परीक्षाओं से जुड़ी सही और समय पर जानकारी लाखों युवाओं के भविष्य को दिशा दे सकती है, इसलिए वह इस बीट को सिर्फ खबर नहीं, बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी की तरह देखते हैं।
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