जब करनी थी शुरुआत, तभी मार दी नौकरी को लात; 23 साल की लड़की ने क्यों छोड़ी Google की जॉब

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23 साल की उम्र में जहां लोग करियर की शुरुआत करते हैं, वहीं भारतीय मूल की आशना दोशी ने गूगल की लाखों की नौकरी को लात मारकर अपना AI स्टार्टअप शुरू कर दिया है।

aashna doshi quits google at 23 to start ai company bounty success story

आम तौर पर 23 साल की उम्र में एक नौजवान की जिंदगी कैसी होती है? कॉलेज की कैंटीन के उधार चुकाना, 'नौकरी डॉट कॉम' पर रेज्यूमे अपडेट करना और रात को सोते वक्त यह दुआ मांगना कि किसी तरह एक ढंग की नौकरी लग जाए। और अगर गलती से भी गूगल जैसी टेक दुनिया के भगवान का ऑफर लेटर हाथ में आ जाए, तो पूरे खानदान में मोहल्ले के हलवाई की सारी मिठाई बंट जाती है। लेकिन जरा सोचिए, कोई लड़की गूगल के उस गोल्डन ऑफर को हाथ में ले, कुछ महीने वहां की मखमली कुर्सी पर बैठे और फिर अचानक एक दिन एचआर को ईमेल लिख दे कि, "शुक्रिया, पर मुझे अब यह नहीं करना!" सुनने में यह किसी सिरफिरे इंसान की कहानी लगती है, लेकिन यह 16 आने सच है। भारतीय मूल की 23 वर्षीय सॉफ्टवेयर इंजीनियर आशना दोशी ने ठीक ऐसा ही किया है। जिस उम्र में लोग अपना करियर सेट करने की जद्दोजहद में होते हैं, आशना ने उसी स्टार्टिंग लाइन पर अपने खुद के पॉडकास्ट और 'Bounty' नाम के एक AI स्टार्टअप के लिए गूगल की लाखों की सैलरी वाली नौकरी को सरेआम लात मार दी है।

आशना के अंदर बगावत का यह कीड़ा कोई रातों-रात नहीं पनपा था। 'बिजनेस इनसाइडर' में लिखे अपने एक लेख में उन्होंने बताया कि गूगल के सिस्टम में घुसने से पहले ही उन्होंने कंपनी के साथ एक माइंड गेम खेल लिया था। फरवरी 2024 की बात है, वो जॉर्जिया टेक से ग्रेजुएट होने ही वाली थीं कि गूगल ने उन्हें फुल-टाइम सॉफ्टवेयर इंजीनियर का ऑफर थमा दिया। कोई भी सामान्य इंसान आंख बंद करके दस्तखत कर देता, क्योंकि उस वक्त अमेरिकी टेक मार्केट में छंटनी का ऐसा खौफनाक दौर था कि अच्छे-अच्छों की कुर्सियां हिल रही थीं। लेकिन आशना ने देखा कि पोस्टिंग कैलिफोर्निया की है, जबकि उन्हें काम न्यूयॉर्क की तेज रफ्तार और जुनूनी जिंदगी के बीच करना था। उन्होंने गूगल के मुंह पर सीधा 'नो' बोल दिया।

यह एक ऐसा जुआ था जिसमें अच्छे-अच्छे गच्चा खा जाएं। लेकिन कहते हैं न कि मुकद्दर भी हिम्मत वालों के आगे सिर झुकाता है, ठीक दो महीने बाद गूगल के रिक्रूटर का दोबारा फोन आया कि "ठीक है मैडम, आप न्यूयॉर्क ही आ जाइए।" आशना ने अपनी शर्तों पर वो ऑफर कुबूल कर लिया।

कोडिंग से किया पॉडकास्ट के माइक तक सफर

न्यूयॉर्क के ऑफिस में आशना की जिंदगी सेट हो चुकी थी। शानदार वर्क कल्चर, दुनिया के सबसे बेहतरीन दिमागों के साथ लंच और हर महीने बैंक अकाउंट में गिरने वाली एक भारी-भरकम रकम। लेकिन कुछ ही हफ्तों में आशना को अहसास होने लगा कि कोडिंग की यह काली स्क्रीन उनके अंदर के असली इंसान को कैद कर रही है। वो दिन भर तकनीकी बग्स फिक्स करतीं और कोड के जाल बुनतीं, जबकि उनका असली दिल लोगों की कहानियां सुनने, उनसे बातें करने और यह जानने में लगता था कि टेक दुनिया के बड़े धुरंधर आखिर बड़े बने कैसे।

इसी खुजली को शांत करने के लिए 2025 की शुरुआत में उन्होंने बिग-टेक में ही काम करने वाली अपनी एक कलीग के साथ मिलकर एक पॉडकास्ट शुरू किया, जिसका नाम '0 to 1' रखा। इस नाम के पीछे की सोच बड़ी गहरी थी, उनका मानना था कि 'शून्य से एक तक पहुंचने का जो सफर है, वो असल में उस 'एक' के मुकाम पर पहुंच जाने से कहीं ज्यादा मायने रखता है'। शुरुआत में दोनों लड़कियों के पास कोई वीआईपी कॉन्टैक्ट नहीं थे। उन्होंने लिंक्डइन पर अनजान लोगों को 'कोल्ड मैसेजेस' भेजे, अपने नेटवर्क को खंगाला और मिन्नतें कीं। धीरे-धीरे स्टार्टअप फाउंडर्स, बड़े इंजीनियर और टेक एग्जीक्यूटिव उनके माइक पर आने लगे। कंटेंट में ईमानदारी थी, सो महज एक साल के भीतर यूट्यूब पर उनके एक लाख से ज्यादा व्यूज हो गए। इसी पॉडकास्ट ने आशना के लिए अमेजन और माइक्रोसॉफ्ट के टॉप बॉसेस के कमरों के दरवाजे खोल दिए, जहां तक सीधे पहुंचना एक आम गूगल कर्मचारी के लिए किसी तपस्या से कम नहीं होता।

मुझे बड़ी मशीन का छोटा नट-बोल्ट नहीं बनना: आशना

पॉडकास्ट हिट हो रहा था और इधर गूगल की 9 से 5 की नौकरी में आशना का दम घुटने लगा था। बड़ी टेक कंपनियों की सबसे बड़ी सच्चाई यह होती है कि वहां फैसले एक विशालकाय कछुए की चाल से होते हैं। आप एक बहुत बड़े समुद्री जहाज का एक ऐसा छोटा सा नट-बोल्ट होते हैं, जिसके होने या न होने से जहाज की दिशा पर तुरंत कोई फर्क नहीं पड़ता। आशना को यह 'स्लो मोशन' जिंदगी रास नहीं आ रही थी। वो खुद के फैसले लेना चाहती थीं, वो भी बुलेट ट्रेन की रफ्तार से। वो चाहती थीं कि आज उन्होंने जो काम किया है, कल सुबह उसका जमीन पर असर दिखाई दे। मई के महीने में उन्होंने अपना इस्तीफा एचआर के मुंह पर दे मारा। अब वो पूरी तरह से अपने AI स्टार्टअप 'Bounty' को खड़ा करने में जुटी हैं। यह एक आउटकम बेस्ड मार्केटप्लेस है। आसान भाषा में समझें तो यह कंपनियों के लिए एक ऐसा डिजिटल प्लेटफॉर्म है, जहां वे अपना काम पोस्ट कर सकती हैं, और कंपनियां इस AI सिस्टम को पैसा तभी देंगी जब उन्हें 100% सही और पक्के नतीजे मिलेंगे। हवा-हवाई बातों के लिए शून्य रुपया।

आज की तारीख में आशना की पक्की आमदनी शून्य है। 'बाउंटी' अभी लॉन्च होने के फेज में है और पॉडकास्ट ने अभी तक स्पॉन्सरशिप से डॉलर छापने शुरू नहीं किए हैं। कल तक जिस लड़की के पास गूगल की गारंटी थी, आज उसके पास सिर्फ खुद का जिगरा है। वो गूगल वाली कमाई का एक छोटा सा हिस्सा ही जुटा पा रही हैं, लेकिन उनके चेहरे पर शिकन की एक लकीर तक नहीं है।

जब उनसे इस पागलपन के बारे में पूछा गया, तो 23 साल की इस लड़की ने जो जवाब दिया, वो आज के हर उस युवा को अपने कमरे की दीवार पर लिख लेना चाहिए जो सिक्योरिटी के नाम पर अपनी जवानी किसी केबिन में सड़ा रहा है। आशना ने कहा, "गूगल को छोड़ना एक बहुत बड़ा रिस्क था। लेकिन मेरा हमेशा से यह मानना रहा है कि अगर आपको किसी चीज की तरफ एक ऐसा खिंचाव महसूस हो रहा हो जो आपको सोने न दे, तो कुछ बहुत बड़ा हासिल करने के लिए आपको जो अच्छा है उसे लात मारने की हिम्मत दिखानी ही पड़ेगी। आर्थिक सुरक्षा इंसान को बहुत सुकून देती है, लेकिन यकीन मानिए... यह एक बहुत खूबसूरत जाल भी है।"

Himanshu Tiwari

लेखक के बारे में

Himanshu Tiwari

शॉर्ट बायो: हिमांशु तिवारी पिछले 10 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं और मौजूदा वक्त में लाइव हिन्दुस्तान के करियर टीम से जुड़े हुए हैं।

परिचय एवं अनुभव
हिमांशु तिवारी डिजिटल पत्रकारिता की दुनिया का एक जाना-पहचाना नाम हैं। बीते 10 सालों से वह लगातार पत्रकारिता में सक्रिय हैं और इस वक्त लाइव हिन्दुस्तान में चीफ सब एडिटर के तौर पर काम कर रहे हैं और बीते 3 साल से वह इस संस्थान से जुड़े हैं। शिक्षा, करियर, नौकरियों, नीट, जेईई, बैंकिंग, एसएससी और यूपीएससी, यूपीपीएससी, बीपीएससी और आरपीएससी जैसी सिविल सेवा परीक्षाओं से जुड़े मुद्दों पर उनकी खास पकड़ मानी जाती है। हिमांशु ने साल 2016 में पत्रकारिता की शुरुआत एबीपी न्यूज के डिजिटल प्लेटफॉर्म से किया। इसके बाद वह इंडिया टीवी और जी न्यूज (डीएनए) जैसे बड़े न्यूज चैनलों के डिजिटल प्लेटफॉर्म का भी हिस्सा रह चुके हैं। हिमांशु तिवारी सिर्फ पत्रकार नहीं, बल्कि एक सजग पाठक और आजीवन विद्यार्थी हैं, उनकी यही खूबी उनके कार्य में परिलक्षित होती है। उनका मानना है कि इन परीक्षाओं से जुड़ी सही और समय पर जानकारी लाखों युवाओं के भविष्य को दिशा दे सकती है, इसलिए वह इस बीट को सिर्फ खबर नहीं, बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी की तरह देखते हैं।

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हिमांशु मूल रूप से उत्तर प्रदेश के बलिया जिले से ताल्लुक रखते हैं। उन्होंने कलकत्ता विश्वविद्यालय से स्नातक की पढ़ाई की और फिर जामिया मिलिया इस्लामिया, नई दिल्ली से पत्रकारिता के गुर सीखे। जामिया में मिली ट्रेनिंग ने उन्हें यह समझ दी कि पत्रकारिता सिर्फ तेज खबर लिखने का नाम नहीं, बल्कि तथ्यों की जांच, संदर्भ की समझ और संतुलित नजरिए से बात रखने की कला है।

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काम से इतर हिमांशु की गहरी रुचि समकालीन इतिहास, समानांतर सिनेमा और दर्शन में रही है। राजनीति और विदेश नीति पर पढ़ना-लिखना उन्हें विशेष रूप से पसंद है। इसी रुचि के चलते उन्होंने दो लोकसभा चुनावों और दर्जनों विधानसभा चुनावों की कवरेज की, जहां राजनीति को उन्होंने बेहद नजदीक से देखा और समझा। चुनावी आंकड़ों की बारीकियां, नेताओं के भाषण, जमीनी मुद्दे और जनता की प्रतिक्रियाएं, इन सभी पहलुओं को समेटते हुए उन्होंने सैकड़ों खबरें और विश्लेषण तैयार किए, जो राजनीतिक प्रक्रिया की गहरी समझ को दर्शाते हैं।

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