प्रीलिम्स में 7 नंबर से फेल, फाइनल लिस्ट से 3 नंबर दूर… फिर आरुषि ने ऐसे मारी UPSC में मारी बाजी

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इंजीनियरिंग के बाद सिविल सेवा का सफर तय करने वाली आरुषि शर्मा ने यूपीएससी में लगातार मिली असफलताओं को पछाड़ते हुए कैसे हासिल की सफलता।

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आरुषि शर्मा

जब इंसान अपनी जिंदगी के बाइस-तेईसवें साल में होता है तो आंखों में कई सपने तैर रहे होते हैं। आरुषि शर्मा भी अपने इंजीनियरिंग के चौथे साल में थीं। प्लेसमेंट का दौर करीब था और उनके बैच के ज्यादातर दोस्त कॉर्पोरेट जगत में कदम रखने की तैयारी में जुटे थे। उस वक्त सिविल सर्विस आरुषि के दिमाग में दूर-दूर तक नहीं था। सच कहें तो उन्होंने पक्का मन बना लिया था कि उन्हें इस तरफ जाना ही नहीं है। लेकिन जिंदगी अक्सर वहां ले जाती है, जहां का हमने कभी सोचा नहीं होता। यह खयाल उनके पिता की तरफ से आया था। उन्होंने आरुषि को बड़े प्यार से समझाया कि कम से कम इस विकल्प पर एक बार सोच कर तो देखो।

शुरुआत में आरुषि ने इस आइडिया को सिरे से नकार दिया। लेकिन धीरे-धीरे यह सवाल उनके जेहन में घर करने लगा कि आखिर आने वाले दशकों में किस तरह की जिंदगी उन्हें सुकून देगी? जब वह खुद को साठ या सत्तर साल की उम्र में देखेंगी, तो क्या सिर्फ अपनी सुख-सुविधाओं और प्रोफेशनल कामयाबी से उन्हें संतुष्टि मिल पाएगी? इसका जवाब था नहीं। वह चाहती थीं कि उनके काम का असर उनके अपने दायरे से कहीं ज्यादा बड़ा हो। इसी सोच ने उनके फैसले को पूरी तरह पलट कर रख दिया और फिर शुरू हुआ एक ऐसा सफर, जिसने उन्हें पूरी तरह बदल दिया।

अकेलेपन और संघर्ष से भरी शुरुआत

यूपीएससी की तैयारी का पहला दौर किसी भी एस्पिरेंट के लिए आसान नहीं होता। आरुषि ने कॉलेज के आखिरी साल में ही किताबें पलटना शुरू कर दिया था, लेकिन असली मेहनत 2018 में ग्रेजुएशन के बाद शुरू हुई। बहुत जल्द उन्हें अपनी और अपने दोस्तों की जिंदगी के बीच का फासला साफ नजर आने लगा। जब उनके दोस्त नई नौकरियों में सेटल हो रहे थे, वीकेंड्स पर पार्टियां कर रहे थे, तब आरुषि घर के एक कमरे में कैद होकर नोट्स बना रही थीं। 'फियर ऑफ मिसिंग आउट' (FOMO) हावी होने लगा था।

खुद को इस भटकाव से बचाने के लिए उन्होंने एक कड़ा फैसला लिया। सारे सोशल मीडिया अकाउंट्स डिलीट कर दिए और दोस्तों को साफ बता दिया कि वह कुछ वक्त के लिए गायब होने वाली हैं। इंजीनियरिंग के बैकग्राउंड से होने की वजह से ह्यूमैनिटीज के विषय पढ़ना भी किसी पहाड़ चढ़ने से कम नहीं था। रिवीजन कमजोर था, पुराने सालों के सवाल ठीक से हल नहीं किए थे और सबसे बड़ी गलती ओवरकॉन्फिडेंस थी। उन्हें लगता था कि पढ़ाई में हमेशा अव्वल रहने की वजह से वह प्रीलिम्स तो आसानी से निकाल ही लेंगी। लेकिन झटका लगना अभी बाकी था।

पहली हार जिसने अंदर तक झकझोर दिया

साल 2019 में आरुषि ने अपना पहला अटेम्प्ट दिया। नतीजा आया और वह प्रीलिम्स के कटऑफ से 7 नंबर पीछे रह गईं। इसका असर बहुत गहरा था। पूरे एक हफ्ते तक वह बिना बात के बस रोती रहती थीं। परिवार वालों को भी समझ नहीं आ रहा था कि उसे कैसे संभालें। वह एक ऐसा डार्क फेज था जहां आगे का रास्ता बिल्कुल धुंधला नजर आ रहा था। लेकिन मां और कुछ बेहद करीबी दोस्तों की लंबी बातों और हौसले ने उन्हें फिर से खड़ा किया। उन्होंने फिर से किताबें उठाईं, लेकिन इम्तिहान अभी खत्म नहीं हुआ था।

जब नाकामी भी मजाक लगने लगी

दूसरे प्रीलिम्स में भी जब उनका रोल नंबर लिस्ट में नहीं दिखा, तो इस बार उनका रिएक्शन बिल्कुल अलग था। वह रोने के बजाय हंसने लगीं। इस हार ने उनका नजरिया बदल दिया था। अब उन्हें यह परीक्षा अपनी काबीलियत पर कोई फैसला नहीं, बल्कि एक ऐसी चुनौती लगने लगी थी जिसे और बेहतर तरीके से समझना जरूरी था। अगले अटेम्प्ट के लिए उन्होंने अपनी पूरी रणनीति बदल दी। सिर्फ प्रीलिम्स पर फोकस करने के बजाय मेन्स की तैयारी भी साथ-साथ शुरू कर दी। ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स पर दोस्तों के साथ रोज पढ़ाई का कॉम्पिटिशन होने लगा। मकसद सिर्फ एक था- बीते हुए कल से ज्यादा आज पढ़ाई करनी है।

मंजिल के करीब आकर फिसल जाना

इस नई रणनीति ने काम किया और वह मेन्स तक पहुंच गईं। आरुषि ने एग्जाम में हर एक सवाल का जवाब लिखा और उन्हें पूरा भरोसा था कि इस बार फाइनल लिस्ट में उनका नाम जरूर होगा। लेकिन किस्मत को कुछ और मंजूर था। फाइनल रिजल्ट में वह सिर्फ 3 नंबर से चूक गईं। हालांकि, बाद में रिजर्व लिस्ट से उन्हें 2021 के सिविल सर्विस एग्जाम के जरिए 'इंडियन इंफॉर्मेशन सर्विस' मिल गई। लेकिन यह खबर ऐसे वक्त पर आई, जब अगला प्रीलिम्स सिर्फ पांच दिन दूर था। वे पांच दिन भावनाओं के भंवर की तरह बीते। पढ़ते-पढ़ते अचानक ख्याल आता कि फाइनल लिस्ट छूट गई, वह रुकतीं, मुंह धोतीं और फिर से किताबों में सिर गड़ा देतीं।

इसके बाद की जोरदार वापसी

इस बार आरुषि ने पूरे 15-20 नंबर के मार्जिन से प्रीलिम्स क्लियर किया। लेकिन कोई जश्न नहीं मना। सिर्फ एक दिन की छुट्टी ली, ताकि अपना कमरा साफ कर सकें और फिर से मेन्स की तैयारी में जुट गईं। एक तरफ जहां बाकी लोग सम्मान समारोहों में व्यस्त थे, आरुषि ने फिर से दुनिया से नाता तोड़ लिया था।

यूपीएससी का यह सफर हमेशा अनिश्चितताओं से भरा रहा। जिस पेपर को देकर उन्हें लगा कि सब बर्बाद हो गया, उसमें सबसे अच्छे नंबर आए। जिस पेपर में लगा कि झंडे गाड़ दिए हैं, उसमें नंबर कम रह गए। यहां तक कि निबंध वाले पेपर में भी पिछले बार के मुकाबले 30 नंबर कम आए थे। लेकिन इन सब उतार-चढ़ावों के बावजूद, सफर आखिरकार अपनी मंजिल तक पहुंच गया।

कैसे बदल गई पूरी दुनिया

यही वह वक्त था जब आरुषि ने पहली बार अपना इंस्टाग्राम अकाउंट बनाया। उन्होंने खुद से वादा किया था कि सिलेक्शन के बाद ही वह सोशल मीडिया पर लौटेंगी। अकाउंट बनाने के आधे घंटे बाद ही रिजर्व लिस्ट का रिजल्ट आ गया। वह सीढ़ियां उतरकर नीचे आईं और अपने माता-पिता से सिर्फ एक लाइन कही- 'मैं अब बेरोजगार नहीं हूं।' सालों की अनिश्चितता और मेहनत इस एक वाक्य में सिमट गई थी। उनके माता-पिता के चेहरे पर जो खुशी थी, उसने उन तमाम मुश्किल सालों को एक झटके में सार्थक कर दिया।

किताबों से दोस्ती

रिजर्व लिस्ट से सर्विस मिलने के बाद भी आरुषि रुकी नहीं। इस बार उन्होंने पढ़ाई के साथ-साथ किताबें पढ़ने (रीडिंग हैबिट) पर भी खासा जोर दिया। एक दोस्त के साथ कॉम्पिटिशन करते हुए उन्होंने 50 से ज्यादा किताबें पढ़ डालीं। इस आदत ने न सिर्फ उनके आत्मविश्वास को बढ़ाया बल्कि बातचीत के तरीके को भी निखारा। सिविल सर्विस 2022 के इंटरव्यू में यह तैयारी बहुत काम आई। उनसे फिलॉसफी, साहित्य और विचारों से जुड़े कई सवाल पूछे गए, ये वही विषय थे जिन्हें उन्होंने अपनी तैयारी के दौरान गहराई से समझा था। उनके इंटरव्यू के नंबर पिछली बार के 173 से उछलकर सीधे 195 तक पहुंच गए। जब फाइनल रिजल्ट आया, तो आरुषि शर्मा ने ऑल इंडिया रैंक 402 हासिल की और 'इंडियन पोस्टल सर्विस' जॉइन की।

Himanshu Tiwari

लेखक के बारे में

Himanshu Tiwari

शॉर्ट बायो: हिमांशु तिवारी पिछले 10 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं और मौजूदा वक्त में लाइव हिन्दुस्तान के करियर टीम से जुड़े हुए हैं।

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