
भारत में महिलाओं की बेरोजगारी 3 महीने के हाई लेवल पर, 2 महीने की गिरावट के बाद फिर से बढ़ी
संक्षेप: पुरुषों के मुकाबले महिलाओं में बेरोजगारी में ज्यादा तेजी देखने को मिली। ग्रामीण क्षेत्रों में पुरुषों की दर 4.7% और महिलाओं की 4.3% रही। शहरी क्षेत्रों में महिलाओं की बेरोजगारी दर बढ़कर 9.3% पहुंच गई, जो अगस्त में 8.9% थी। पुरुषों के लिए यह 6% रही।
सितंबर में 15 वर्ष और उससे अधिक आयु के लोगों की बेरोजगारी दर थोड़ा बढ़कर 5.2% हो गई, जो अगस्त में 5.1% थी। यह दर पिछले दो महीनों की गिरावट के बाद फिर से बढ़ी है। सभी आयु वर्गों को मिलाकर बेरोजगारी दर 5.3% रही, जो तीन महीने की सबसे ऊंची स्तर पर पहुंच गई।

ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों की स्थिति
ग्रामीण इलाकों में 15 वर्ष से ऊपर के लोगों की बेरोजगारी दर सितंबर में 4.6% हो गई, जो अगस्त में 4.3% थी। वहीं, शहरी क्षेत्रों में यह दर हल्की बढ़त के साथ 6.8% रही, जबकि अगस्त में 6.7% थी।
पुरुषों के मुकाबले महिलाओं में बेरोजगारी में ज्यादा तेजी देखने को मिली। ग्रामीण क्षेत्रों में पुरुषों की दर 4.7% और महिलाओं की 4.3% रही। शहरी क्षेत्रों में महिलाओं की बेरोजगारी दर बढ़कर 9.3% पहुंच गई, जो अगस्त में 8.9% थी। पुरुषों के लिए यह 6% रही।
श्रम भागीदारी दर (LFPR) में सुधार जारी
15 वर्ष से ऊपर की आबादी के लिए श्रम भागीदारी दर (LFPR) लगातार तीसरे महीने बढ़ी है। जून 2025 में यह 54.2% थी, जो सितंबर में बढ़कर 55.3% हो गई यानी पांच महीनों में सबसे ऊंचा स्तर।
ग्रामीण क्षेत्रों में भागीदारी बढ़कर 57.4% हुई है (जून में 56.1%), जबकि शहरी क्षेत्रों में यह 50.9% पर स्थिर रही। महिलाओं की भागीदारी दर सितंबर में 34.1% तक पहुंची, जो मई 2025 के बाद सबसे ज्यादा है।
रोजगार वृद्धि वाले प्रमुख क्षेत्र
हालांकि समग्र बेरोजगारी दर में हल्की बढ़ोतरी है, कुछ क्षेत्रों में रोजगार के अवसर बढ़े भी हैं। ग्रामीण निर्माण कार्य, महिला स्व-रोजगार, और सामाजिक सेवाओं (जैसे शिक्षा व स्वास्थ्य) से संबंधित गतिविधियों में सुधार दिखा है। इससे संकेत मिलता है कि ग्रामीण भारत में गैर-कृषि क्षेत्रों की हिस्सेदारी धीरे-धीरे मजबूत हो रही है ।
श्रम बाजार का समग्र संकेत
साल 2025 की तीसरी तिमाही की यह तस्वीर बताती है कि भारत का श्रम बाजार स्थिर लेकिन असमान गति से आगे बढ़ रहा है।
जहां ग्रामीण भागीदारी और महिलाओं का आर्थिक योगदान बढ़ा है, वहीं खेती के बाद का मौसमी असर और शहरी नौकरी बाजार की सुस्ती ने कुल बेरोजगारी में थोड़ा इज़ाफा किया है। विशेषज्ञ मानते हैं कि आने वाले महीनों में त्योहारी सीजन और निर्माण क्षेत्र की बढ़ी गतिविधियां इस अस्थायी सुस्ती को कम कर सकती हैं





