क्यों बढ़ी थोक महंगाई, किस पर और कितना होता है असर

Feb 17, 2026 06:24 am ISTDrigraj Madheshia हिन्दुस्तान टीम
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WPI: जनवरी 2026 में देश की थोक महंगाई दर बढ़कर 1.81 फीसदी पर पहुंच गई, जो बीते नौ महीनों का सबसे ऊंचा स्तर है। थोक महंगाई के बढ़ने के पीछे बेसिक मेटल्स के निर्माण, गैर-खाद्य सामान, खाने-पीने की चीजों और कपड़ों की कीमतों में बढ़ोतरी बड़ी वजह रही।

क्यों बढ़ी थोक महंगाई, किस पर और कितना होता है असर

जनवरी 2026 में देश की थोक महंगाई दर बढ़कर 1.81 फीसदी पर पहुंच गई, जो बीते नौ महीनों का सबसे ऊंचा स्तर है। दिसंबर में यह दर 0.83 फीसदी थी। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, थोक महंगाई में यह तेजी काराखाना क्षेत्र और खाद्य वस्तुओं की बढ़ती कीमतों की वजह से आई है। जनवरी में थोक महंगाई के बढ़ने के पीछे बेसिक मेटल्स के निर्माण, गैर-खाद्य सामान, खाने-पीने की चीजों और कपड़ों की कीमतों में बढ़ोतरी बड़ी वजह रही। खास तौर पर मैन्युफैक्चरिंग से जुड़े उत्पादों की कीमतों ने थोक महंगाई को ऊपर की ओर धकेला।

खाद्य महंगाई बढ़कर 1.41 फीसदी हुई

गौरतलब है कि इस दौरान खाद्य महंगाई बढ़कर 1.41 फीसदी हो गई, जबकि दिसंबर में यह 0.00 फीसदी पर स्थिर थी यानी खाने-पीने की चीजों की कीमतों में दोबारा हलचल दिखी है। प्राथमिक वस्तुओं की महंगाई भी तेज होकर 2.21 फीसदी पहुंच गई, जो दिसंबर में सिर्फ 0.21 फीसदी थी।

रॉयटर्स के एक सर्वे में अर्थशास्त्रियों ने अनुमान लगाया था कि जनवरी में थोक मुद्रास्फीति आधारित महंगाई बढ़कर करीब 1.25 फीसदी रहेगी लेकिन वास्तविक आंकड़ा इससे ज्यादा निकला, जिससे साफ है कि कीमतों का दबाव उम्मीद से तेज रहा।

खुदरा महंगाई भी बढ़ी

थोक महंगाई के साथ-साथ खुदरा महंगाई में भी इजाफा देखने को मिला है। जनवरी 2026 में खुदरा महंगाई बढ़कर 2.75 फीसदी हो गई। यह बढ़ोतरी मुख्य रूप से खाद्य पदार्थों और कीमती धातुओं की कीमतों की वजह से हुई। ग्रामीण इलाकों में महंगाई 2.73 फीसदी और शहरी इलाकों में 2.77 फीसदी दर्ज की गई। गौरतलब है कि महंगाई को मापने के लिए आधार वर्ष 2012 की जगह 2024 कर दिया गया है।

थोक महंगाई का असर कैसे होता है

रोजमर्रा की चीजें महंगी होने की संभावना

जब थोक स्तर पर खाद्यान्न, सब्जियां, दाल, तेल, चीनी या अन्य वस्तुओं के दाम बढ़ते हैं, तो व्यापारी और खुदरा विक्रेता भी कीमतें बढ़ा देते हैं। इसका मतलब है कि रसोई का बजट बढ़ सकता है। उदाहरण के तौर पर, अगर गेहूं, दाल या सब्जियों की थोक कीमत बढ़ती है, तो कुछ हफ्तों या महीनों में बाजार में उनके खुदरा दाम भी बढ़ सकते हैं।

उद्योगों की लागत बढ़ सकती है

थोक महंगाई बढ़ने का मतलब है कि कच्चा माल, धातु, कपड़ा, रसायन जैसी औद्योगिक वस्तुएं महंगी हो रही हैं। इससे कंपनियों की उत्पादन लागत बढ़ती है। ऐसे में दो स्थितियां बनती हैं। पहला, कंपनियां मुनाफा कम कर लें या फिर बढ़ी हुई लागत का बोझ ग्राहकों पर डाल दें। अक्सर दूसरा विकल्प अपनाया जाता है, जिससे टीवी, फ्रिज, कपड़े, सीमेंट, गाड़ियां आदि महंगी हो सकती हैं।

नौकरी और वेतन पर असर

अगर उद्योगों की लागत लगातार बढ़ती है, तो कंपनियां खर्च कम करने के लिए नई भर्ती रोक सकती हैं, वेतन वृद्धि सीमित कर सकती हैं या नया निवेश टाल सकती हैं। इससे रोजगार के अवसरों पर असर पड़ सकता है।

ब्याज दरों पर असर

हालांकि ब्याज दर तय करते समय भारतीय रिजर्व बैंक मुख्य रूप से खुदरा महंगाई को देखता है, लेकिन थोक महंगाई का रुझान भी संकेत देता है कि आगे चलकर खुदरा महंगाई बढ़ सकती है। अगर कीमतों का दबाव ज्यादा बढ़े, तो आरबीआई ब्याज दरें कम करने से बच सकता है या जरूरत पड़ने पर दरें बढ़ा भी सकता है। इससे होम लोन, कार लोन और अन्य कर्ज महंगे हो सकते हैं।

किसानों और व्यापारियों पर असर

थोक महंगाई हमेशा बुरी खबर नहीं होती। अगर कृषि उत्पादों की थोक कीमतें बढ़ती हैं, तो किसानों को बेहतर दाम मिल सकते हैं। लेकिन अगर इनपुट लागत (खाद, डीजल, बीज) ज्यादा बढ़ जाए, तो फायदा सीमित हो सकता है।

Drigraj Madheshia

लेखक के बारे में

Drigraj Madheshia

दृगराज मद्धेशिया:-लाइव हिन्दुस्तान में पिछले 6 साल से बिजनेस टीम का अहम हिस्सा हैं। दृगराज को पत्रकारिता में 21 वर्षों का लंबा अनुभव है। इन्होंने टीवी, प्रिंट और डिजिटल मीडिया में अपनी स्पेशल खबरों से खास पहचान बनाई है। शेयर मार्केट, कमोडिटी, पर्सनल फाइनेंस और यूटिलिटी पर विशेष पकड़। मैथ्स से ग्रेजुएट, मास कम्युनिकेशन और कंप्यूटर साइंस में पीजी डिप्लोमा। दृगराज, रिसर्च और एनॉलिस के जरिए मार्केट डेटा को आसान भाषा में 'कुछ अलग' पाठकों तक पहुंचाते हैं। लाइव हिन्दुस्तान से पहले साढ़े सात साल तक हिन्दुस्तान अखबार में बतौर सीनियर रिपोर्टर काम किया। इसके अलावा सहारा समय, दैनिक जागरण, न्यूज नेशन में भी अपनी सेवाएं दे चुके हैं।

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