60 साल पहले वॉरेन बफेट ने की थी एक गलती, जिसका उन्हें अब भी है मलाल

Mar 06, 2026 05:00 pm ISTDrigraj Madheshia लाइव हिन्दुस्तान
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बात साल 1966 की है। बफेट ने महज 4 मिलियन डॉलर में डिज्नी में 5% हिस्सेदारी खरीद ली। अगले साल 1967 में ही अपनी यह हिस्सेदारी 6 मिलियन डॉलर में बेच दी, जिससे उन्हें 50% का मुनाफा हुआ। अब बफेट ने अफसोस जताया कि अगर वह वह 5% हिस्सा आज तक रखे होते, तो उसकी कीमत 8 से 10 अरब डॉलर के बीच होती।

60 साल पहले वॉरेन बफेट ने की थी एक गलती, जिसका उन्हें अब भी है मलाल

बात साल 1966 की है, जब दिग्गज निवेशक वॉरेन बफेट कैलिफोर्निया में वॉल्ट डिज्नी से मिलने पहुंचे। यह वो दौर था, जब डिज्नी ने अपना मशहूर डिज्नीलैंड पार्क खोला था। बफेट ने उस मुलाकात को याद करते हुए कहा कि वॉल्ट डिज्नी ने उनके साथ कंपनी की पूरी योजना साझा की और बेहद विनम्रता से बात की। यह मुलाकात इतनी अच्छी रही कि बफेट ने महज 4 मिलियन डॉलर में डिज्नी में 5% हिस्सेदारी खरीद ली। उस समय पूरी डिज्नी कंपनी की वैल्यू सिर्फ 80 मिलियन डॉलर थी और उस पर कोई कर्ज भी नहीं था। बफेट को यह सौदा इतना सस्ता इसलिए लगा क्योंकि कंपनी ने सिर्फ 'पाइरेट्स ऑफ द कैरेबियन' राइड पर ही 17 मिलियन डॉलर खर्च कर दिए थे, यानी पूरी कंपनी की कीमत उसके कुछ प्रमुख राइड्स की लागत से भी कम थी।

बेचने का फैसला गलत साबित हुआ

हालांकि, बफेट से एक बड़ी चूक हुई। अपनी सामान्य लंबी अवधि की निवेश नीति के विपरीत, उन्होंने अगले साल 1967 में ही अपनी यह हिस्सेदारी 6 मिलियन डॉलर में बेच दी, जिससे उन्हें 50% का मुनाफा हुआ। बाद में इस फैसले पर पछतावा करते हुए बफेट ने इसे एक बड़ी भूल करार दिया।

उन्होंने समझाया कि उस वक्त वह कंपनी के असली मूल्य को नहीं समझ पाए थे। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि फिल्म 'मैरी पोपिन्स' ने उस साल लगभग 30 मिलियन डॉलर कमाए थे, और यह फिल्म सालों बाद भी बच्चों की नई पीढ़ी को दिखाई जा सकती थी। उन्होंने इसे एक ऐसे तेल के कुएं से जोड़ा जहां से तेल निकलने के बाद वापस भर जाता है।

डिज्नी के पास 200 से ज्यादा फिल्में और एनाहिम में 300 एकड़ जमीन थी, जहां डिज्नीलैंड हर साल 90 लाख लोग आते थे। इतना सब कुछ होने के बावजूद पूरी कंपनी सिर्फ 80 मिलियन डॉलर में बिक रही थी। बफेट ने अफसोस जताया कि अगर वह वह 5% हिस्सा आज तक रखे होते, तो उसकी कीमत 8 से 10 अरब डॉलर के बीच होती।

सीख: गलतियों से घबराएं नहीं, आगे बढ़ें

बफेट ने 1988 में बर्कशायर हैथवे की वार्षिक बैठक में इस गलती पर बात करते हुए कहा कि हालांकि यह फैसला गलत था, लेकिन यह उनके लिए किसी परेशानी का कारण नहीं है। उन्होंने कहा कि उन्हें उस समय खरीदारी जारी रखनी चाहिए थी, लेकिन वह बेचने की जल्दी में थे। उनका मानना है कि अच्छे व्यवसाय समय के साथ और महंगे होते जाते हैं। बफेट की इस कहानी से सीख ली जा सकती है कि पछतावे को छोड़ना सीखना चाहिए।

उन्होंने कहा कि उन्होंने जो कुछ भी बेचा, वह आगे चलकर और महंगा हुआ, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि वह उसी बात पर अटके रहें। उन्होंने आगे बढ़कर कोका-कोला जैसी कंपनियों में पैसा लगाया और आज बर्कशायर के पास अप्रत्यक्ष रूप से डिज्नी में हिस्सेदारी भी है। 1996 में जब डिज्नी ने कैपिटल सिटीज/एबीसी का अधिग्रहण किया, तो बर्कशायर को उस डील के चलते डिज्नी में 3.6% हिस्सा मिल गया। इस तरह बफेट का निवेश एक बार फिर डिज्नी से जुड़ गया।

Drigraj Madheshia

लेखक के बारे में

Drigraj Madheshia

दृगराज मद्धेशिया पिछले 21 वर्षों से पत्रकारिता जगत का एक विश्वसनीय चेहरा हैं। वर्तमान में 'लाइव हिन्दुस्तान' की बिजनेस टीम के एक महत्वपूर्ण सदस्य के रूप में, वे शेयर बाजार, कमोडिटी, पर्सनल फाइनेंस और यूटिलिटी सेक्टर पर अपनी गहरी पकड़ रखते हैं। वह कलम से बाजार की नब्ज टटोलने वाले एक पत्रकार हैं, जो शेयर बाजार से लेकर आपकी जेब (Personal Finance) तक, हर खबर को आसान बनाते हैं। टीवी, प्रिंट और डिजिटल मीडिया के अपने विस्तृत अनुभव के साथ, दृगराज जटिल मार्केट डेटा को आम पाठकों के लिए 'कुछ अलग' और आसान भाषा में पेश करने के लिए पहचाने जाते हैं। उन्होंने अपने करियर में हिन्दुस्तान, सहारा समय, दैनिक जागरण और न्यूज नेशन जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में अपनी सेवाएं दी हैं। मूलत: उत्तर प्रदेश के कुशीनगर जिले के रहने वाले दृगराज मैथ्स बैकग्राउंड होने के कारण डेटा और कैलकुलेशन में माहिर हैं, जो बिजनेस पत्रकारिता के लिए एक बड़ा प्लस पॉइंट है। उन्होंने कॅरियर की शुरुआत गोरखपुर से सहारा समय साप्ताहिक से बतौर फ्रीलांसर की और बहुत ही जल्द सहारा समय उत्तर प्रदेश/उत्तराखंड के हिस्सा बन गए। ​इसके बाद छत्तीसगढ़ में वॉच न्यूज से जुड़े। टीवी को छोड़ हिन्दुस्तान अखबार के बरेली एडिशन की लॉन्चिंग टीम का हिस्सा बने। साढ़े सात साल की मैराथन पारी के बाद अगला पड़ाव न्यूज नेशन डिजिटल रहा। इसके बाद एक बार फिर हिन्दुस्तान दिल्ली से जुड़े और अब डिजिटल टीम का हिस्सा हैं। और पढ़ें

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