ओपेक से यूएई का बाहर निकलना भारत के लिए अच्छी खबर, होर्मुज पर निर्भरता कम होगी?

हिन्दुस्तान टीम
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मुख्य बातें

  • यूएई के पास हबशान फुजैरा पाइपलाइन है, जो होर्मुज जलमार्ग से बाहर है, इसके जरिए भारत को तेल की निर्बाध सप्लाई सुनिश्चित हो सकती है
  • इससे भारत की इस जलमार्ग पर निर्भरता भी कम हो सकेगी
ओपेक से यूएई का बाहर निकलना भारत के लिए अच्छी खबर, होर्मुज पर निर्भरता कम होगी?

प्रमुख तेल निर्यातक संगठन ओपेक से बाहर निकलने का यूएई का ऐलान भारत के लिए अच्छी खबर है। यह फैसला लंबी अवधि में भारत के लिए सस्ते तेल का बड़ा अवसर पैदा कर सकता है। वहीं, अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी कच्चे तेल की सप्लाई बढ़ने से कीमतों में कमी आने की संभावना बढ़ेगी।

ऊर्जा क्षेत्र के विशेषज्ञ मानते है कि यूएई अब अपनी पूरी क्षमता के साथ कच्चे तेल का उत्पादन कर सकता है। इससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में सप्लाई बढ़ेगी और कीमतों में कमी आएगी। दरअसल, ओपेक अपने सदस्य देशों के साथ मिलकर कच्चे तेल उत्पादन का दैनिक कोटा तय करता है, ताकि तेल सप्लाई को नियंत्रित कर कीमतों को स्थिर रख सके। ओपेक देश वैश्विक तेल उत्पादन का 40% हिस्सा उत्पादित करते हैं। ओपेक देश तेल का उत्पादन बढ़ाते या कम करते है, तो इसका सीधा असर कीमतों पर पड़ता है।

कुछ समय के लिए अस्थिरता संभव: ओएनजीसी के पूर्व चेयरमैन आरएस शर्मा के अनुसार, यूएई के ओपेक छोड़ने से कुछ वक्त के लिए कच्चे तेल के बाजार में अस्थिरता दिख सकती है, लेकिन यूएई द्वारा कच्चे तेल का उत्पादन बढ़ाने से बाजार में स्थिरता आने की उम्मीद है।

सऊदी अरब बड़ी वजह

वियना स्थित तेल गठबंधन ओपेक पर सऊदी अरब का वर्चस्व है। सऊदी अरब ने अपने प्रभाव का इस्तेमाल करते हुए ओपेक देशों से उत्पादन कम करने की नीति को मंजूरी दिला दी। इसके अलावा सऊदी अरब और यूएई के बीच आर्थिक मुद्दों और क्षेत्रीय राजनीति, विशेष रूप से लाल सागर क्षेत्र को लेकर प्रतिस्पर्धा बढ़ती जा रही है। यूएई का यह भी मानना है कि युद्ध के दौरान कई ईरानी हमलों से उसे बचाने के लिए अरब देशों ने पर्याप्त कदम नहीं उठाए।

1960 में हुआ गठन

पेट्रोलियम निर्यातक देशों का संगठन (ओपेक) और उसके सहयोगी देश सामूहिक रूप से ओपेक प्लस के नाम से जाने जाते हैं। ओपेक की स्थापना 1960 में सऊदी अरब, ईरान, इराक, वेनेजुएला और कुवैत द्वारा की गई थी। 1967 में यूएई इससे जुड़ा। वर्तमान में इसके 12 सदस्य देश हैं। 2016 में ही ओपेक देशों ने 10 अन्य तेल उत्पादक देशों को शामिल करने का फैसला किया, जिससे ओपेक प्लस का गठन हुआ।

दुनिया पर इसका संभावित असर

विशेषज्ञों के अनुसार, यूएई ने धीरे-धीरे तेल उत्पादन बढ़ाने की बात कही है। शुरुआत में कच्चा तेल दबाव में रहेगा। यूएई ने आक्रामक तरीके से तेल बेचा, तो कच्चा तेल 70 डॉलर प्रति बैरल के नीचे भी फिसल सकता है।

अमेरिका के लिए बड़ी रणनीतिक जीत

यूएई का ओपेक से बाहर निकलना अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के लिए एक बड़ी रणनीतिक जीत का है। राष्ट्रपति ट्रंप लंबे समय से ओपेक पर तेल की कीमतें बढ़ाकर दुनिया भर के देशों का आर्थिक शोषण करने का आरोप लगाते रहे हैं।

1. यूएई, भारत का पुराना और भरोसेमंद मित्र

यूएई, भारत का पुराना और भरोसेमंद मित्र रहा है। वह भारत का तीसरा सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार है। ओपेक से हटने के बाद यूएई उत्पादन बढ़ाने के लिए स्वतंत्र होगा और यह कदम दोनों देशों के रिश्तों को और मजूबत कर सकता है।

2. रियायती दर पर समझौता संभव

भारत सीधे यूएई के साथ लंबे समय के लिए और रियायती दरों पर तेल समझौते कर सकता है। इससे देश की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूती मिलेगी।

3. कच्चे तेल की निर्बाध सप्लाई

यूएई के पास हबशान फुजैरा पाइपलाइन है, जो होर्मुज जलमार्ग से बाहर है, इसके जरिए भारत को तेल की निर्बाध सप्लाई सुनिश्चित हो सकती है। इससे भारत की इस जलमार्ग पर निर्भरता भी कम हो सकेगी।

4. आयात बिल घटेगा

भारत अपनी जरूरत का 85 फीसदी से अधिक कच्चा तेल आयात करता है। कच्चा तेल 5 से 10 डॉलर प्रति बैरल भी सस्ता होता है, तो भारत का आयात बिल घटेगा।

उत्पादन बढ़ाने की कसक

●यूएई ने अपनी तेल उत्पादन क्षमता बढ़ाने के लिए अरबों डॉलर का निवेश किया है। लेकिन ओपेक के प्रतिबंध के कारण पूरी क्षमता का उपयोग नहीं कर पा रहा है। इससे राजस्व पर असर।

●यूएई लगभग 2.9 मिलियन बैरल प्रतिदिन तेल का उत्पादन करता है। हालांकि, होर्मुज के बंद होने से उसकी उत्पादन क्षमता प्रभावित हुई है।

●यूएई की वर्तमान क्षमता 4.85 मिलियन बैरल प्रतिदिन तक है, लेकिन उसका लक्ष्य 2027 तक 5 मिलियन बैरल प्रतिदिन तक पहुंचने का है।

Drigraj Madheshia

लेखक के बारे में

Drigraj Madheshia

दृगराज मद्धेशिया पिछले 21 वर्षों से पत्रकारिता जगत का एक विश्वसनीय चेहरा हैं। वर्तमान में 'लाइव हिन्दुस्तान' की बिजनेस टीम के एक महत्वपूर्ण सदस्य के रूप में, वे शेयर बाजार, कमोडिटी, पर्सनल फाइनेंस और यूटिलिटी सेक्टर पर अपनी गहरी पकड़ रखते हैं। वह कलम से बाजार की नब्ज टटोलने वाले एक पत्रकार हैं, जो शेयर बाजार से लेकर आपकी जेब (Personal Finance) तक, हर खबर को आसान बनाते हैं। टीवी, प्रिंट और डिजिटल मीडिया के अपने विस्तृत अनुभव के साथ, दृगराज जटिल मार्केट डेटा को आम पाठकों के लिए 'कुछ अलग' और आसान भाषा में पेश करने के लिए पहचाने जाते हैं। उन्होंने अपने करियर में हिन्दुस्तान, सहारा समय, दैनिक जागरण और न्यूज नेशन जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में अपनी सेवाएं दी हैं। मूलत: उत्तर प्रदेश के कुशीनगर जिले के रहने वाले दृगराज मैथ्स बैकग्राउंड होने के कारण डेटा और कैलकुलेशन में माहिर हैं, जो बिजनेस पत्रकारिता के लिए एक बड़ा प्लस पॉइंट है। उन्होंने कॅरियर की शुरुआत गोरखपुर से सहारा समय साप्ताहिक से बतौर फ्रीलांसर की और बहुत ही जल्द सहारा समय उत्तर प्रदेश/उत्तराखंड के हिस्सा बन गए। ​इसके बाद छत्तीसगढ़ में वॉच न्यूज से जुड़े। टीवी को छोड़ हिन्दुस्तान अखबार के बरेली एडिशन की लॉन्चिंग टीम का हिस्सा बने। साढ़े सात साल की मैराथन पारी के बाद अगला पड़ाव न्यूज नेशन डिजिटल रहा। इसके बाद एक बार फिर हिन्दुस्तान दिल्ली से जुड़े और अब डिजिटल टीम का हिस्सा हैं। और पढ़ें

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