पेंशन पर सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला, इन सरकारी कर्मचारियों को मिलेगी राहत
मुख्य बातें
- सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार की आपत्तियों को खारिज करते हुए कहा कि पेंशन सेवा से मिलने वाला एक कानूनी अधिकार है, न कि कोई अपनी मर्जी से दिया जाने वाला फायदा
- 18 साल लंबी कानूनी लड़ाई आखिरकार अपने अंजाम तक पहुंची

Supreme Court on pension: सुप्रीम कोर्ट ने सरकारी कर्मचारियों के पेंशन को लेकर एक अहम टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा कि किसी कर्मचारी को केवल इस आधार पर पेंशन से वंचित नहीं किया जा सकता कि उसकी सेवा को औपचारिक रूप से नियमित (रेगुलराइज) नहीं किया गया था। कोर्ट ने यह टिप्पणी बिहार के एक मामले में की है।
क्या है मामला?
दरअसल, बिहार की एक महिला के पति ने डाक विभाग में करीब 30 वर्षों तक कैजुअल लेबर (अस्थायी कर्मचारी) के रूप में काम किया था। लंबे समय तक सेवा देने के बावजूद उनकी नौकरी नियमित नहीं की गई थी। कर्मचारी की मृत्यु के बाद उनकी पत्नी ने पारिवारिक पेंशन की मांग की, लेकिन केंद्र सरकार ने यह कहते हुए दावा खारिज कर दिया कि कर्मचारी की सेवा कभी नियमित नहीं हुई थी, इसलिए वह पेंशन का हकदार नहीं था। अब सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि किसी ऐसे कर्मचारी को पेंशन देने से मना नहीं किया जा सकता, जिसने किसी सरकारी विभाग में दशकों तक सेवा की हो लेकिन सिर्फ इसलिए कि उसकी नौकरी कभी औपचारिक रूप से पक्की नहीं हुई थी।
18 साल पुरानी लड़ाई
यह कानूनी लड़ाई 18 साल पुरानी है। यह लड़ाई 18 साल तक चली। यह लड़ाई तीन न्यायिक मंच सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल, पटना हाईकोर्ट और आखिरकार सुप्रीम कोर्ट से होकर गुजरी। अब जब सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया कि नौकरी पक्की न होने की वजह से, किसी ऐसे कर्मचारी को पेंशन के फायदों से वंचित नहीं किया जा सकता, जिसने अपनी जिंदगी का एक बड़ा हिस्सा जनसेवा में समर्पित कर दिया हो।
केंद्र सरकार ने यह तर्क दिया कि ऐसे मामलों में पेंशन लाभों का विस्तार करने से अतिरिक्त वित्तीय बोझ पड़ सकता है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को मानने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि पेंशन कोई ऐसी कृपा का विषय नहीं है जो नियोक्ता की वित्तीय सुविधा पर निर्भर हो, बल्कि यह लंबे वर्षों की सेवा के माध्यम से अर्जित किया गया एक विलंबित वेतन है। जस्टिस संजय करोल और ए.जी. मसीह की बेंच ने इस बात पर जोर दिया कि जो कर्मचारी लंबे समय तक जरूरी काम करते हैं, उन्हें सिर्फ उनकी नौकरी के नाम या पदनाम के आधार पर मिलने वाले फायदों से वंचित नहीं किया जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने सरकारी अधिकारियों को यह भी याद दिलाया कि कर्मचारियों के साथ निष्पक्ष व्यवहार करना उनकी जिम्मेदारी है। जजों ने कहा कि सरकार को एक आदर्श नियोक्ता के तौर पर काम करना चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि जिन कर्मचारियों ने सार्वजनिक संस्थानों में सालों तक सेवा की है, उन्हें वे सभी फायदे मिलें जिनके वे हकदार हैं।
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Deepak Kumarहिन्दुस्तान डिजिटल में करीब 5 साल से कार्यरत दीपक कुमार यहां बिजनेस की खबरें लिखते हैं। दीपक को स्टॉक मार्केट, पर्सनल फाइनेंस के अलावा बिजनेस से जुड़े तमाम विषयों की गहरी समझ है। वह जटिल आर्थिक और कारोबारी मुद्दों को सरल, संतुलित और आम बोलचाल की भाषा में पाठकों तक पहुंचाना बखूबी जानते हैं। उनकी बिजनेस सेक्शन के अलावा एंटरटेनमेंट, स्पोर्ट्स और पॉलिटिक्स से जुड़ी खबरों पर भी मजबूत पकड़ है। दीपक को उनके बेहतरीन काम के लिए विभिन्न स्तरों पर सम्मानित भी किया जा चुका है। मूल रूप से बिहार के सीवान जिले से ताल्लुक रखने वाले दीपक के पास पत्रकारिता का करीब 13 साल का अनुभव है। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत अमर उजाला से की। इसके बाद दैनिक भास्कर, आजतक और इंडियन एक्सप्रेस ग्रुप जैसे प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में भी काम किया। इसका अगला पड़ाव हिन्दुस्तान डिजिटल था, जहां वह वर्तमान में असिस्टेंट न्यूज एडिटर के रूप में कार्यरत हैं। दीपक ने दिल्ली यूनिवर्सिटी से मास कम्युनिकेशन में ग्रेजुएशन की पढ़ाई की जबकि हिमाचल प्रदेश सेंट्रल यूनिवर्सिटी से पोस्ट ग्रेजुएट हुए हैं। जहां एक तरफ वह सोशल मीडिया पर सक्रिय हैं तो वहीं नई तकनीकों से खुद को अपडेट रखते हैं। खाली समय में फिल्में देखना, खाना बनाना और क्रिकेट खेलना पसंद है।
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