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31 मार्च, 2021|3:45|IST

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म्यूचुअल फंड निवेशकों के लिए रिस्क-ओ-मीटर बहुत ही मददगार

mutual funds hindustan times

अगर आप म्यूचुअल फंड निवेशक हैं या निवेश करने की तैयारी कर रहे हैं तो सेबी का नया रिस्क-ओ-मीटर (जोखिम मापने का पैमाना ) बहुत ही मददगार साबित हो सकता है। सेबी का नया जोखिम मापने का पैमाना हर फंड के वास्तविक पोर्टफोलियो पर आधारित है। इसके दो फायदे हैं। पहला, रिक्स मीटर पर रीडिंग देखकर आप यता पता लगा सकते हैं कि आपको उस फंड में निवेश करना चाहिए या नहीं। वहीं, दूसरा, जैसे पोर्टफोलियो और मार्केट की स्थितियां बदलेंगी रिस्क लेवल बदल जाएगा। यह फैसला लेने में मदद करेगा कि आपको फंड भुनाना चाहिए या नहीं।

पोर्टफोलियो पर नजर रखना जरूरी

वित्तीय विशेषज्ञों का कहना है कि निवेशकों में मन में यह भी सवाल उठ सकता है कि उसने फंड हाउस में फाइव स्टर रेंटिंग देखकर निवेश किया। हालांकि, बाद में उसकी रेटिंग को नीचे कर दिया गया। निवेशकों के लिए यही समझना सबसे जरूरी है। अगर, रेटिंग में कुछ बदलाव ही नहीं होगा तो उसके फायदे कैसे समझ में आएंगे। इसलिए निवेशकों की यह जिम्मेदारी बनती है कि वह समय-समय पर अपने म्यूचुअल फंड की बदलती स्थितियों पर नजर रखें। अगर, जोखिम अधिक लगे तो वह अपना निवेश निकाल लें।

जोखिम मापने की पांच श्रेणियां

सेबी ने म्यूचुअल फंड निवेशकों को जोखिम से बचाने के लिए पांच श्रेणियां बनाई है। इसमें लो, मॉडरेट लो, मॉडरेट, मॉडरेट हाई, हाई और वेरी हाई है। सेबी के निर्देश के अनुसार, सभी म्यूचुअल फंड्स के लिए हर महीने इस रिस्क-ओ-मीटर की समीक्षा करनी होगी। बदलाव की जानकारी ई-मेल या एसएमएस के जरिये सभी यूनिटहोल्डर्स को देनी है। पोर्टफोलियो का ब्योरा भी महीना पूरा होने के 10 दिन के भीतर अपनी और एंफी की वेबसाइट पर बताना जरूरी है।

साफ-साफ ब्योरा दिखाना जरूरी

म्यूचुअल फंड्स को नए इश्यू लाते समय एप्लीकेशन फॉर्म और स्कीम से जुड़े सभी अहम दस्तावेजों में इसका ब्योरा देना जरूरी है। रिस्क-ओ-मीटर के संकेत को भी स्कीम के नाम के पास ही साफ साफ बताना होगा। साथ ही विज्ञापनों में भी इसकी जानकारी स्पष्ट तरीके से देनी होगी।ताकि निवेशक आसानी से समझ पाएं और उन्हें किसी तरह की दुविधा न हो।

म्यूचुअल फंड में तेजी से बढ़ा निवेश


छोटे निवेशकों द्वारा म्यूचुअल फंड में तेजी से निवेश बढ़ा है। इसलिए सेबी ने अब जोखिम मापने का पैमान को ज्यादा बढ़ा दिया है। यानी म्यूचुअल फंड हाउसों को रिस्क के बारे में ज्यादा जानकारी निवेशकों को देनी होगी। इसके पीछे उद्देश्य यही है कि अगर कोई निवेशक पैसा लगाता है तो उसे पैसा लगाने से पहले इस तरह के जोखिम का पता रहे ताकि वह निवेश करते समय सावधानी बरते।

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