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तीन साल में सरकारी बैंकों को मिली पूंजी ने 45 साल का रिकॉर्ड तोड़ा

बैंकों के राष्ट्रीयकरण के 50 साल पूरे होने पर सरकारी बैंकों के भविष्य को लेकर चर्चा तेज हो गई है। हालांकि पांच साल में बैंकों को दो लाख 70 हजार करोड़ रुपये की पूंजी देकर सरकार ने स्पष्ट संकेत दिए हैं कि वह आर्थिक-सामाजिक बदलावों को आम जनता तक पहुंचाने के लिए सरकारी बैंकों को मजबूत करेगी। यूपीए सरकार के आंकड़ों को भी जोड़ लें तो वित्त वर्ष 2010-11 से 2019-20 तक बैंकों को 3.8 लाख करोड़ रुपये की मदद मुहैया कराई जा चुकी है। जबकि 19 जुलाई 1969 को 14 बैंकों के राष्ट्रीयकरण के बाद से 2010 तक बैंकों को 1.5 लाख करोड़ की सहायता दी गई।

सामाजिक सुधारों की रीढ़ है सरकारी बैंक
विशेषज्ञों का कहना है कि सरकारी बैंक सामाजिक सुधारों की रीढ़ हैं और उनके पूरे तरह से निजीकरण के बारे में सोचा नहीं जा सकता। गरीबों के जीवन में बदलाव के लिए आधार के जरिये लोगों को सीधे मदद की मुहिम के तहत मोदी बैंकों के जरिये सरकार ने सामाजिक योजनाओं को आगे बढ़ाया। जनधन, जीवन ज्योति बीमा योजना, अटल पेंशन योजना, किसानों को पेंशन की प्रधानमंत्री मान धन योजना को बैंकों ने बखूबी जमीनी स्तर तक पहुंचाया है। हर तरह की सब्सिडी सीधे लाभार्थियों के खाते में डालने में उनकी अहमियत नजरअंदाज नहीं की जा सकती।

बैंकों के कर्ज, जमा में दहाई अंक की बढ़ोतरी बरकरार

उदारीकरण के बाद निजी बैंकों से पिछड़े
आर्थिक सुधार लागू होने के बाद 1992 के बाद निजी बैंकों की तुलना में सरकारी बैंकों को झटका लगा। तब 12 बैंकों को घाटा हुआ और बैंकों को वैश्विक मुकाबले में लाने के लिए 20 हजार 500 करोड़ की पूंजी दी गई। मगर बैंकों का घाटा बढ़ता चला गया और निजी बैंकों से वह पिछड़ गए। आज सरकारी बैंकों का बाजार पूंजीकरण महज छह लाख करोड़ रुपये है, जबकि निजी बैंकों का पूंजीकरण करीब गुना बढ़कर 17 लाख 16 हजार करोड़ रुपये हो गया है। 

पांच दशक पहले राष्ट्रीयकरण
तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 19 जुलाई 1969 को 14 बैंकों के राष्ट्रीयकरण का ऐलान किया।
1980 में दूसरी बार सामाजिक योजनाओं को पूरा करने को कुछ बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया।
1996 तक सरकारी बैंकों को पूंजी पर्याप्त अनुपात पाने का लक्ष्य दिया गया।

चुनौतियां
01 लाख 64 हजार 470 करोड़ का घाटा पिछले तीन साल में।
10 लाख करोड़ रुपये का फंसा कर्ज(एनपीए) बैंकों का।
19 में से 15 सरकारी बैंक अभी घाटे की स्थिति से जूझ रहे।

सुधार : मजबूत बैंकों की जरूरत
1992-93 में बैंकों में वैश्विक बासेल-3 मानक लागू करने की कवायद शुरू।
2014 में बनी नायक समिति ने बैंकों में सरकारी नियंत्रण कम करने की वकालत।
01 अप्रैल 2017 से एसबीआई में पांच सहायक बैंकों का विलय हुआ।
2019 अप्रैल से बैंक ऑफ बड़ौदा में देना और विजया बैंक का विलय।
03-04 छोटे बैंकों का हो सकता है पंजाब नेशनल बैंक में मर्जर।

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  • Web Title:PSU banks Gets Rs 70000 Crore in last Five Months