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14 जनवरी, 2021|12:09|IST

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कई सरकारों की बलि लेने वाला प्याज अब आम आदमी का निकालेगा आंसू

कुछ महीनों तक सब्जी बाजार में उपेक्षित-सा रहने वाला प्याज अचानक उठता है और सरकारों की नींव हिला देता है

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ऐन बिहार चुनाव के बीच प्याज के तेवर तीखे होना ठीक नहीं है। प्याज ने कई सरकारों की बलि ली है। सत्ताधारियों को सत्ता से बेदखल किया है। इसने बड़े-बड़े राजनीतिज्ञों को रुलाया है और सरकारें भी गिराई हैं। कुछ महीनों तक सब्जी बाजार में उपेक्षित-सा रहने वाला प्याज अचानक उठता है और सरकारों की नींव हिला देता है। भले ही इसके पीछे मौसम या फसल-चक्र की मेहरबानी रही हो। दिल्ली की सड़कों से लेकर न्यूयार्क टाइम्स की सुर्खियां बटोरने वाला प्याज आज अपने पुराने फार्म में लौट रहा है। एक हफ्ते में प्याज की कीमतों में 20 फीसद का उछाल आया है। नासिक की थोक मंडी में 19 अक्टूबर को प्याज का भाव 62 रुपये किलो था। अभी लोग पिछले साल की तरह 'प्याज के आंसू' तो नहीं रो रहे पर बिहार चुनाव में ताल ठोक रहे नेताओं को जरूर यह प्याज रुला सकता है। क्योंकि, प्याज और राजनीति का यह रिश्ता पुराना है। 

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कई पार्टियां बीते दौर में राष्ट्रीय राजधानी में प्याज का रुतबा देख चुकी हैं। प्याज की महंगाई का अंजाम केंद्र की सत्ता में काबिज भारतीय जनता पार्टी  भुगत भी चुकी है। साल 1998 में पार्टी को दिल्ली राज्य की सत्ता गंवानी पड़ी थी। इस साल दिल्ली में प्याज के दाम 60 रुपये किलो तक चले गए थे, उस समय प्याज की कीमतों को लेकर विदेशी अखबारों तक ने इसे अपनी सुर्खी बनाया था। 12 अक्टूबर 1998 को न्यूयार्क टाइम्स में प्याज की महंगाई को लेकर खबर छपी थी, जिसमें प्याज को भारत का सबसे गर्म मुद्दा बताया गया था। दिल्ली के पूर्व बीजेपी अध्यक्ष मनोज तिवारी एक गायक के रूप में तेजी से उभर रहे थे। उसी समय उनका गाया गाना, " का हो अटल चाचा, पियजवे अनार हो गईल..' काफी पापुलर हुआ था।

प्याज के 'डर' से बीजेपी ने बदला दिल्ली का सीएम

विधानसभा चुनाव से ठीक पहले प्याज की महंगाई का मुद्दा जब गरमाया तो बीजेपी ने दिल्ली के तत्कालीन मुख्यमंत्री साहिब सिंह वर्मा को हटाकर सुषमा स्वराज को मुख्यमंत्री बनाया, लेकिन सत्ता नहीं बची और विधानसभा चुनाव में उसे मुंह की खानी पड़ी। विधानसभा चुनाव में प्याज की महंगाई को जोर-शोर से उठाने वाली कांग्रेस ने जीत हासिल की। उसके बाद से अभी तक बीजेपी दिल्ली में सत्तासीन नहीं हो पाई है। शीला दीक्षित दिल्ली की मुख्यमंत्री बनीं, लेकिन 15 साल बाद प्याज ने उन्हें भी रुला दिया। अक्तूबर 2013 को प्याज की बढ़ी कीमतों पर सुषमा स्वराज की टिप्पणी थी कि यहीं से शीला सरकार का पतन शुरू होगा। वही हुआ। भ्रष्टाचार के साथ महंगाई का मुद्दा चुनाव में एक और बदलाव का साक्षी बना। आप सत्त में आ गई।

केंद्र की सत्ता को भी हिला चुका है प्याज

आपातकाल के बुरे दौर के बाद जब देश में जनता पार्टी की सरकार बनी थी तो यह सरकार अपने ही अंतर्विरोधों से लड़खड़ा जरूर रही थी, लेकिन फिर भी सत्ता से बेदखल हो चुकी इंदिरा गांधी के पास कोई बड़ा मुद्दा नहीं था। अचानक ही प्याज की कीमतें बढ़ने लगीं तो उन्हें एक मुद्दा मिल गया।  उस समय पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने तत्कालीन प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह की सरकार पर प्याज के दाम को काबू में रखने में नाकाम होने का आरोप लगाया था। 1980 में प्याज की महंगाई चुनावी मुद्दा बनी। इसके बाद हुए चुनाव में इंदिरा 1980 में लोकसभा चुनाव जीतकर दोबारा सत्ता में आईं थी। कहा जाता है कि जनता पार्टी की सरकार भले ही अपनी वजहों से गिरी हो, लेकिन कांग्रेस ने उसके बाद का चुनाव प्याज की वजह से जीत लिया।

congress party workers from pune hold placards during a protest against government decision about th

बिहार चुनाव के बीच प्याज की कीमतों में उछाल 

अब फिर प्याज की कीमतों में उछाल का सीजन है। फर्क सिर्फ इतना है कि इस समय बिहार का विधानसभा चुनाव चल रहा है। देश में अब हर ओर प्याज के बढ़े दामों की चर्चा होनी शुरू हो गई है। पिछले साल के आंसू अभी भी लोगों को या हैं। महाराष्ट्र प्याज का सबसे बड़ा उत्पादनकर्ता है और इसकी एशिया में सबसे बड़ी मंडी लासलगांव यहीं है। 19 अक्टूबर को इस मंडी में थोक प्याज का भाव 62 रुपये किलो था। महाराष्ट्र के नासिक और मालेगोयन में पिछले सप्ताह की बारिश और तेलंगाना और आंध्र प्रदेश के कुछ हिस्सों में फसलों को नुकसान पहुंचा है या कटाई में देरी हुई है।

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  • Web Title:onion price hike which has sacrificed many governments will now extract tears from the common man