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हेल्थ इंश्योरेंस में न छुपाएं पुरानी बीमारी, क्लेम के समय फंसा सकती है कंपनी

उपभोक्ता कई बार स्वास्थ्य बीमा पॉलिसी लेते समय पहले की बीमारी को छुपा लेते हैं। कुछ मौकों पर बीमा एजेंट भी सस्ते प्रीमियम का झांसा देकर ऐसा करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। कंपनी पहले से बीमारी या पुरानी बीमारी होने (प्री-एक्जिट डिसीज) के नाम पर क्लेम देन से इनकार कर सकती है। 

बीमा पॉलिसीबाजार के हेल्थ इंश्योरेंस हेड अमित छाबड़ा का कहना है कि प्रत्येक पॉलिसी में अलग-अलग नियम शर्तं होती हैं। एड्स, दांतों का इलाज, मनोरोग संबंधी विसंगति, लिंग परिवर्तन सर्जरी, कास्मेटिक सर्जरी, खुद को नुकसान पहुंचाने से लगी चोट जैसे मामले किसी भी स्टैंडर्ड हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसी के दायरे में नहीं होते हैं। ज्यादातर स्टैंडर्ड हेल्थ पॉलिसी में किसी भी तरह के इलाज के लिए 30 से 90 दिनों का वेटिंग पीरियड होता है, यानी इतनी अवधि के बाद ही किसी बीमारी पर क्लेम मिल सकता है। 
इन बातों का रखें ध्यान
किसी पॉलिसी में कंपनी कोई अनुचित शर्त थोपती है तो उसका बीमा न लें। हालांकि ग्राहकों को भी पॉलिसी जान लेना चाहिए कि कौनसी बीमारियां दायरे में हैं और कौन सी नहीं।

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क्लेम रद्द होने का खतरा 
स्वास्थ्य जांच पर खर्च करना आपके लिए दोहरा फायदेमंद हो सकता है। बीमा विशेषज्ञों का कहना है कि स्वास्थ्य जांच कराने के बाद आप बीमा खरीदते हैं तो कुछ बीमारियों की वजह से उसका प्रीमियम जरूर थोड़ा महंगा हो जाता है। लेकिन ऐसी पॉलिसी में क्लेम मिलना भी ज्यादा आसान हो जाता है। साथ ही संबंधित बीमारियों का कवर भी आसानी से मिल जाता है जो जिससे आपकी जेब हल्की होने से बच जाती है। .
जान लें वेटिंग पीरियड के बारे में
बीमा कंपनियां जब पॉलिसी देती हैं तो उसमें कुछ बीमारियों का कवर तुरंत मिलना शुरू हो जाता है। जबकि कुछ बीमारियों के लिए इंतजार अवधि (वेटिंग पीरियड) होती है। इंतजार अवधि का मतलब होता है कि बीमा पॉलिसी लेने के बाद आपको कोई बीमारी होती है तो उसका कवर कितने दिन बाद मिलेगा। .
पॉलिसी से पहले स्वास्थ्य जांच जरूर कराएं..
पॉलिसी खरीदने के बाद आप किसी बीमारी का इलाज कराते हैं और जांच में पता चलता है कि वह बीमारी काफी पुरानी और पॉलिसी लेने के पहले की है तो कंपनियां पुरानी बीमारी की शर्त का हवाला देकर क्लेम देने से मना सकती हैं। वह तर्क देती हैं कि पॉलिसी लेते समय उपभोक्ता ने बीमारी को छुपाया था और इस आधार पर क्लेम से इनकार कर सकती हैं। ऐसी स्थिति उपभोक्ता के लिए परेशानी का सबब बन जाती है।

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