आने वाले दिनों में आर्थिक पैकेज का कई गुना असर होगा: निर्मला सीतारमण

Drigraj Madheshia हिन्दुस्तान टाइम्स, नई दिल्ली
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मुख्य बातें

  • केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने भारतीय अर्थव्यवस्था को महामारी के संकट से उबरने में मदद करने के लिए 20 लाख करोड़ रुपये के आर्थिक पैकेज की 5 दिन तक विशिष्ट रूपरेखा की घोषणा की और इसको लेकर 50..
आने वाले दिनों में आर्थिक पैकेज का कई गुना असर होगा: निर्मला सीतारमण

केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने भारतीय अर्थव्यवस्था को महामारी के संकट से उबरने में मदद करने के लिए 20 लाख करोड़ रुपये के आर्थिक पैकेज की 5 दिन तक विशिष्ट रूपरेखा की घोषणा की और इसको लेकर 50 से ज्यादा घोषणाएं की। इन घोषणाओं के जरिए उन्होंने "आत्मनिर्भर भारत" की नींव रखी। रविवार को घोषणा के कुछ ही समय बाद वित्त मंत्री ने आर सुकुमार और शिशिर गुप्ता को एक विस्तृत साक्षात्कार में उपायों के पीछे तर्क के बारे में बताया। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि यह पैकेज बिजनेसमैन और कॉमन मैन दोनों को राहत देगा। आइए इस जानें वित्त मंत्री ने और क्या कहा इस राहत पैकेज के बारे में..

 


फ्रांस से तुलना ठीक नहीं है। उसने जो कदम उठाया, उसकी सीमाएं हैं। हमने यह जरूर सुनिश्चित किया है कि हर कंपनी को बैंकों से कर्ज मिले, वो भी बिना अतिरिक्त गारंटी के, क्योंकि उद्योगों को मुश्किल घड़ी से उबारना है।

अब जबकि आर्थिक पैकेज की पूरी रूपरेखा घोषित हो गई है तो बजट की क्या स्थिति है?


हमने कर्ज सीमा को आर्थिक पैकेज की घोषणा से पहले ही संज्ञान में ले लिया था (केंद्र सरकार ने चालू वित्त वर्ष के लिए बाजार से कर्ज उठाने की सीमा 4.20 लाख रुपये बढ़ा दी थी।)। यही कारण है कि इसे लेकर नया कार्यक्रम घोषित किया गया। हालांकि, बाकी चीजों को अभी समझना होगा। राजस्व संग्रह और विनिवेश के चलते कोई भी आकलन जल्दबाजी होगा। अभी मई चल रहा है। वित्त वर्ष गुजरने में दस और महीने बाकी हैं।

राजस्व को लेकर कोई आकलन किया है? संकट में क्या कोई आकलन काम आएगा?  फंडिंग का क्या होगा? कर्ज सीमा में बढ़ोतरी के बारे में तो बताया, पर क्या वो राजस्व घाटे की भरपाई के लिए काफी रहेगा? या फिर बाजार से और कर्ज उठाने की जरूरत पड़ेगी?

हमने विस्तृत आकलन के बाद 2097053 करोड़ रुपये का आर्थिक पैकेज घोषित किया है। घोषणा के समय हम इससे वाकिफ थे कि पैकेज के साथ हमें राजस्व घाटे का भी सामना करना पड़ेगा। देखते हैं आगे क्या होता है?

 राजस्व में कमी आती है, जो स्वाभाविक है तो ऐसी सूरत में राज्यों के हिस्से का क्या होगा?

राजस्व संग्रह को केंद्र और राज्यों के बीच बांटने का फॉर्मूला है। संग्रह में कमी आती है तो राज्यों को उतना ही मिल सकेगा, जितना फॉर्मूला में प्रावधान है। इसके अलावा जीएसटी क्षतिपूर्ति भी तो है। मेरे पास जो भी संग्रह है, मैं राज्यों को उसमें से क्षतिपूर्ति देने के लिए प्रतिबद्ध हूं। अगर संग्रह कम होता है तो जीएसटी परिषद को फैसला लेना होगा।

किस तरह के राजस्व घाटे की आशंका है?

अभी कुछ कहना जल्दबाजी होगा। मैं आरई (संशोधित आकलन आने का समय) के आसपास ही कुछ कहने की स्थिति में रहूंगी।

राहत पैकेज में मौद्रिक पहलू और लिक्विडिटी पर जोर की आलोचना हो रही है। यह कहा जा रहा है कि राजकोषीय व्यय 10-15% है।

यह अद्भुत है कि हमारे पैकेज की तुलना अन्य देशों में घोषित आर्थिक मदद से हो रही है। मौजूदा समय में मैं सभी से इस बात पर ध्यान देने का आग्रह करूंगी कि राहत राशि किस वर्ग के पास जा रही है। मुझे लगता है कि व्यक्ति विशेष नहीं, बल्कि समाज के हर उस तबके को मदद की जरूरत है, जो समय में अस्तित्व बनाए रखने के लिए संघर्ष कर रहा है। अगर छोटी इकाइयों तक अतिरिक्त राशि नहीं पहुंची तो वे कर्मचारियों को वेतन नहीं दे पाएंगी। इसलिए मैं यह सुनिश्चित कर रही हूं कि मदद राशि कहां जाए। आर्थिक इकोसिस्टम में इसका प्रभाव देखने के लिए थोड़ा इंतजार करें।

 ब्रिटेन सहित कई देशों में छुट्टी पर भेजे गए मध्यम वर्ग के वेतनभोगी कर्मचारियों को भी आर्थिक मदद देने का ऐलान किया गया है। आपने इस बारे में क्यों नहीं सोचा?

क्या कोई ऐसा वर्ग है, जिसके बारे में कह सकूं कि उसे मदद की जरूरत नहीं है? हर किसी को मदद की जरूरत है, पर अलग स्तर की। मुझे यह जानकर हैरानी होती है कि ऐसे मामलों में हम विकसित अर्थव्यवस्थाओं से तुलना करते हैं, जिनके पास ज्यादा बजट के साथ बेहतर डाटा और मजबूत आपूर्ति तंत्र भी है। 2014 में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद देश में जो तंत्र स्थापित हुआ, उसने डीबीटी पेश किया। इससे नकद हस्तांतरण, एलपीजी आपूर्ति, किसानों को खाद्य सब्सिडी देना संभव हो रहा है। लेकिन क्या मेरे पास कोई और डाटा है? क्या संकट से पहले किसी राजनीतिक दल या अर्थशास्त्री के पास प्रवासी मजदूरों का आंकड़ा था? जब हमने मजदूरों को बीमा देने की इच्छा के बारे में कहा तो क्या किसी भी राज्य ने हमें उनका डाटा उपलब्ध कराया? क्या प्रवासी मजदूरों के रजिस्ट्रेशन के लिए हमें ऐसी महामारी का इंतजार था?

सरकार ने कई अहम सुधारों की घोषणा की है, लेकिन उनका असर मध्यम या लंबी अवधि में दिखेगा। छोटी अवधि में दो चीजें सबसे अहम हैं। पहली, लोगों के हाथ में नकदी देना। दूसरी, मांग में उछाल लाना। आपकी नजर में ऐसा कैसे किया जा सकता है?

टर्म लोन और वर्किंग कैपिटल लोन के जरिए। बैंकों से छोटी इकाइयों को टर्म और वर्किंग कैपिटल लोन देने को कहा है। छोटी इकाई के हाथ में रकम जाएगी तो वे इसका इस्तेमाल कच्चा माल खरीदने या वेतन देने में करंेगी। इससे मांग पैदा होगी। मांग में इजाफा लाने का एक यही तरीका नहीं है कि लोगों के हाथों में पैसे आ जाएं और वे बाहर जाएं, रोजमर्रा की चीजें खरीदें। संस्थागत स्तर पर भी ऐसा हो सकता है। लॉकडाउन के बाद छोटी कंपनियां ऋण की मदद से खुल सकेंगी। वहां कामबहाल होने से मांग बढ़ेगी। हम नाबार्ड से किसानों को अतिरिक्त राशि दे रहे हैं, ताकि खरीफ पूर्व फसलों की बुवाई कर सकें।

नागरिक उड्डयन, पर्यटन, मनोरंजन, हॉस्पिटेलिटी सहित कई क्षेत्र हैं, जिनमें अगर आप कंपनियों को आर्थिक मदद दे भी दें तो वे अगले एक साल तक संघर्ष करेंगी।

ये क्षेत्र घोषित किसी न किसी योजना के दायरे में आएंगे। कोई भी क्षेत्र मदद से अछूता नहीं रहेगा। और मैं यह बैंकों से विस्तृत चर्चा के बाद कह रही हूं। बैंक कर्ज देने में इसलिए हिचकिचा रहे हैं क्योंकि उन्हें पैसा वापस न आने का डर है। वे इसे लेकर चिंतित हैं कि हालात और खराब हुए या कर्ज लेने वाले उद्योग की नीयत बिगड़ी तो क्या होगा। हम बैंकों को ज्यादा से ज्यादा ऋण देने की दिशा में प्रेरित करने के लिए गारंटी लाए हैं।

क्या क्रेडिट रेटिंग में संभावित गिरावट ने आर्थिक मदद देते समय आपके हाथ रोके?

हमने क्रेडिट रेटिंग के मुद्दे पर चर्चा जरूर की, लेकिन सबका मानना था कि भारत अकेले इस समस्या से नहीं गुजर रहा है। यह वैश्विक संकट है। रेटिंग एजेंसियां तभी आपका आकलन करती हैं, जब आप दुनिया में अकेले खराब प्रदर्शन कर रहे हों। महामारी में जब दुनिया की हर अर्थव्यवस्था मुश्किल का सामना कर रही है तो क्रेडिट रेटिंग को लेकर ज्यादा चिंता करने की जरूरत नहीं है। हमारा विदेशी मुद्रा भंडार मजबूत है। जीडीपी के मुकाबले कर्ज के अनुपात में कमी आई है। रबी की फसलों का बंपर उत्पादन हुआ है। रेटिंग एजेंसियां भला क्यों हमारी रेटिंग घटाएंगी?

पैकेज में कई सुधारों पर अमल के लिए अधिसूचना की जरूरत पड़ेगी?

हां। कुछ सुधारों को अध्यादेश के जरिए भी लागू किया जाएगा।

आपने राज्यों के पर्याप्त कर्ज न लेने का जिक्र किया है, ऐसा क्यों हो रहा है?

पता नहीं। राज्यों के मुख्यमंत्री और वित्त मंत्री लगातार प्रधानमंत्री व मुझे पत्र लिख रहे हैं। मुख्यमंत्रियों के साथ हुई प्रधानमंत्री की हालिया बैठक में राज्यों को ज्यादा कर्ज लेने की अनुमति देने की मांग भी उठी थी। हमने ऐसा किया भी, लेकिन यह बताते हुए कि उनकी तरफ से इस वित्त वर्ष के लिए स्वीकृत कुल राशि का कितनी फीसदी कर्ज उठाया गया है। यह आंकड़ा 14 फीसदी के करीब है।

क्या प्रवासी मजदूरों को और मदद देने की जरूरत है?

मुझेआकलन करना होगा। हम और मदद देने को तैयार हैं। राहत के दरवाजे बंद नहीं हुए हैं।

पैकेज को एक वाक्य में कैसे बयां करेंगी?

मैं प्रधानमंत्री के भाषण की पंक्ति का जिक्र करना चाहूंगी। उन्होंने कहा था कि पैकेज लैंड, लेबर, लिक्विडिटी व लॉ पर केंद्रित होगा। हमने ऐसा किया। हर किसी को इससे फायदा होगा। मुझे भरोसा है कि भारतीय किसान की तरह भारतीय उद्यमी भी हर तूफान का सामना करने में सक्षम हैं। मैं यह नहीं कह रही कि उन्हें उनके हाल पर छोड़ दूंगी। मैं उन्हें मदद देना जारी रखूंगी। उनका हौसला मेरी हिम्मत बढ़ा रहा है।

Drigraj Madheshia

लेखक के बारे में

Drigraj Madheshia

दृगराज मद्धेशिया पिछले 21 वर्षों से पत्रकारिता जगत का एक विश्वसनीय चेहरा हैं। वर्तमान में 'लाइव हिन्दुस्तान' की बिजनेस टीम के एक महत्वपूर्ण सदस्य के रूप में, वे शेयर बाजार, कमोडिटी, पर्सनल फाइनेंस और यूटिलिटी सेक्टर पर अपनी गहरी पकड़ रखते हैं। वह कलम से बाजार की नब्ज टटोलने वाले एक पत्रकार हैं, जो शेयर बाजार से लेकर आपकी जेब (Personal Finance) तक, हर खबर को आसान बनाते हैं। टीवी, प्रिंट और डिजिटल मीडिया के अपने विस्तृत अनुभव के साथ, दृगराज जटिल मार्केट डेटा को आम पाठकों के लिए 'कुछ अलग' और आसान भाषा में पेश करने के लिए पहचाने जाते हैं। उन्होंने अपने करियर में हिन्दुस्तान, सहारा समय, दैनिक जागरण और न्यूज नेशन जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में अपनी सेवाएं दी हैं। मूलत: उत्तर प्रदेश के कुशीनगर जिले के रहने वाले दृगराज मैथ्स बैकग्राउंड होने के कारण डेटा और कैलकुलेशन में माहिर हैं, जो बिजनेस पत्रकारिता के लिए एक बड़ा प्लस पॉइंट है। उन्होंने कॅरियर की शुरुआत गोरखपुर से सहारा समय साप्ताहिक से बतौर फ्रीलांसर की और बहुत ही जल्द सहारा समय उत्तर प्रदेश/उत्तराखंड के हिस्सा बन गए। ​इसके बाद छत्तीसगढ़ में वॉच न्यूज से जुड़े। टीवी को छोड़ हिन्दुस्तान अखबार के बरेली एडिशन की लॉन्चिंग टीम का हिस्सा बने। साढ़े सात साल की मैराथन पारी के बाद अगला पड़ाव न्यूज नेशन डिजिटल रहा। इसके बाद एक बार फिर हिन्दुस्तान दिल्ली से जुड़े और अब डिजिटल टीम का हिस्सा हैं। और पढ़ें

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