DA Image
हिंदी न्यूज़   ›   बिजनेस  ›  अभी और पड़ेगी महंगाई की मार, कच्चा तेल 2018 के शिखर पर, जानें और क्या-क्या होगा असर
बिजनेस

अभी और पड़ेगी महंगाई की मार, कच्चा तेल 2018 के शिखर पर, जानें और क्या-क्या होगा असर

नई दिल्ली। हिन्दुस्तान ब्यूरोPublished By: Drigraj Madheshia
Thu, 17 Jun 2021 12:26 PM
अभी और पड़ेगी महंगाई की मार, कच्चा तेल 2018 के शिखर पर, जानें और क्या-क्या होगा असर

कच्चे तेल का दाम बुधवार को 74 डॉलर प्रति बैरल के पार चला गया। इसके दाम में तेज उछाल ने भारत के लिए दोहरी मुश्किलें खड़ी कर दी हैं। इससे एक तरफ पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ाने को मजबूर होना पड़ रहा है। वहीं दूसरी ओर इससे महंगाई तेजी से बढ़ रही है। आने वाले समय में महंगाई के बेकाबू होने की आशंका बढ़ गई है।
कच्चे तेल के दाम बढ़ने से सरकार और तेल कंपनियों को अधिक मात्रा में विदेशी मुद्रा खर्च करनी पड़ती है। वहीं पेट्रोल-डीजल सस्ता नहीं कर पाने से महंगाई पर काबू पाना मुश्किल हो जाता है। इतना ही नहीं रिजर्व बैंक के लिए कर्ज सस्ता करना भी आसान नहीं रह जाता है।

आम आदमी पर कच्चे के ऊंचे भाव का ऐसा होगा असर

पेट्रोल-डीजल सस्ते नहीं होंगे

कच्चे तेल के दाम में तेजी से पेट्रोल-डीजल की कीमतों में कमी की उम्मीद नहीं कर सकते। ऐसे में पेट्रोल डीजल का दाम बढ़ेगा जिससे आम आदमी की जेब हल्की है। अपना वाहन इस्तेमाल करने वालों की जेब पर सीधा असर होगा।

कच्चा तेल का भाव बढ़ाता है महंगाई

जो उपभोक्ता सीधे तौर पर पेट्रोल-डीजल का इस्तेमाल नहीं करते हैं उनपर भी कच्चे तेल के दाम बढ़ने से असर होता है। विशेषज्ञों के मुताबिक पेट्रोलियम पदार्थ के दाम 10 फीसदी बढ़ते पर महंगाई दर करीब 0.8 फीसदी तक बढ़ जाता है। इसका सीधा असर रोजमर्रा के उत्पादों पर होता है।

किचन का बजट बढ़ेगा

कच्चे तेल के दाम चढ़ने से जब पेट्रोल-डीजल महंगा होता है उसका सबसे पहले असर मालभाड़े पर होता है। जब मालभाड़ा बढ़ता है तो उसकी वजह से खाने-पीने से लेकर घर में उपयोग होने वाले अन्य उत्पादों के दाम बढ़ जाते हैं।

कर्ज सस्ता नहीं होगा

रिजर्व बैंक मौद्रिक समीक्षा में महंगाई पर गौर करता है। महंगाई बढ़ने की वजह से पिछली की मौद्रिक समीक्षा से रिजर्व बैंक दरों को स्थिर रखे हुए है। मौजूदा समय में थोक महंगाई 12 फीसदी से ऊपर पहुंच गई है। ऐसे मे आने वाले समय में कर्ज और सस्ता होने की उम्मीद नहीं है।

निवेश पर रिटर्न कम मिलेगा

भारत अपनी तेल जरूरत का 80 फीसदी आयात करता है। यह आयात पेट्रोलियम कंपनियां करती हैं। उद्योग विशेषज्ञों के मुताबिक कच्चा तेल एक डॉलर महंगा होने पेट्रोलियम कंपनियों पर आठ हजार करोड़ रुपये का बोझ पड़ता है। इससे कंपनियं का लाभ घटता है जिससे वह निवेशकों डिविडेंट कम देती हैं।

खाने के तेलों ने भी उड़ाई भारत की नींद

पेट्रोलियम पदार्थों की महंगाई से जूझ रहे भारत की नींद खाद्य तेलों की महंगाई ने भी उड़ा दी है। पिछले कुछ समय में सोया तेल में 70 फीसदी का उछाल आया है। इसी तरह पाम ऑयल के दाम में 18 फीसदी का उछाल आया है। इतना ही नहीं कुछ खाद्य तेलों की कीमतें 150 फीसदी तक बढ़ी हैं। खाद्य तेलों की कीमतों में वृद्धि का सीधार असर आम उपभोक्ता की जेब पर होता है।

यह भी पढ़ें: गौतम अडाणी ने चंद मिनटों में गंवाए 46,399 करोड़ रुपये

इसके अलावा सरकार को भी इसके लिए बड़ी मात्रा में विदेशी मुद्रा खर्च करनी पड़ती है। इससे चालू खाते का घाटा बढ़ जाता है। आयात और निर्यात के अंतर के चालू खाते का घाटा कहते हैं। बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि ब्राजील और यूएस में सूखे से सोया तेल का उत्पादन पांच साल के निचले स्तर पर पहुंच गया है जिससे इसके दाम बढ़ते जा रहे हैं। भारत का खाद्य आयात का बिल सालाना आठ से 10 अरब डॉलर है। यह कच्चे तेल और सोने के बाद तीसरा सबसे बड़ा आयातित उत्पाद है जिसपर सबसे अधिक विदेशी मुद्रा खर्च होती है।

 

संबंधित खबरें