सौतेली बहनों का भी है पिता की प्रॉपर्टी पर बराबर का हक, हाईकोर्ट का बड़ा फैसला
मुख्य बातें
- सौतेली बहनों को पैतृक संपत्ति में बराबर का हक मिलेगा
- यह आदेश हाईकोर्ट ने दिया है
- सौतेली बेटियों का भी पिता की संपत्ति पर पूरा अधिकार होगा
- दरअसल, एक ऐसा ही मामला आया जिसमें भाई ने सौतेली बहनों को पिता की प्रॉपर्टी से बेदखल करने की कोशिश की और ये पूरा मामला कोर्ट चला गया

सौतेली बहनों को पैतृक संपत्ति में बराबर का हक मिलेगा। यह आदेश हाईकोर्ट ने दिया है। सौतेली बेटियों का भी पिता की संपत्ति पर पूरा अधिकार होगा। दरअसल, एक ऐसा ही मामला आया जिसमें भाई ने सौतेली बहनों को पिता की प्रॉपर्टी से बेदखल करने की कोशिश की और ये पूरा मामला कोर्ट चला गया। आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में छह सौतेली बहनों को उनके पिता की पैतृक संपत्ति में बराबर का हिस्सा देने का आदेश दिया। कोर्ट ने साफ कहा कि पिता यदि कोई हक त्यागपत्र देते भी हैं, तो वह सिर्फ अपने हिस्से का त्याग कर सकते हैं। बेटियों के कानूनी अधिकार खत्म नहीं कर सकते।
सौतेली बेटियों का भी पिता की संपत्ति पर है पूरा हक
आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने पैतृक संपत्ति से जुड़े एक बड़े मामले में छह सौतेली बहनों के पक्ष में फैसला सुनाया है। अदालत ने कहा कि बेटियां अपने पिता की पैतृक संपत्ति में जन्म से अधिकार रखती हैं। उन्हें इस अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता।
आखिर क्या था पूरा मामला
लाइव लॉ के मुताबिक मामला काकीनाडा के दो पैतृक संपत्तियों से जुड़ा था। परिवार में पिता सोमराजू की पहली पत्नी से एक बेटा और एक बेटी थे। पहली पत्नी की मौत के बाद उन्होंने दूसरी शादी की, जिससे उनकी छह बेटियां हुईं। बाद में बेटे टी सत्यनारायण ने दावा किया कि उसके पिता ने 1998 में एक रिलिंक्विशमेंट डीड के जरिए पूरी संपत्ति उसके नाम कर दी थी। रिलिंक्विशमेंट डीड (Relinquishment Deed) एक तरह का हक त्याग पत्र कहा जाता है। यह एक ऐसा कानूनी डॉक्यूमेंट है जिसके जरिए कोई व्यक्ति अपनी इच्छा से ज्वाइंट या पैतृक संपत्ति में अपने हिस्से के कानूनी अधिकारों को परिवार के किसी अन्य सदस्य के पक्ष में कर देता है। इसी आधार पर उसने अपनी छह सौतेली बहनों को संपत्ति में हिस्सा देने से इनकार कर दिया।
हालांकि, पिता सोमराजू ने अदालत में कहा कि उनसे धोखे से अंगूठा लगवाया गया था। उन्हें बताया गया था कि संपत्ति को लेकर कोई कानूनी विवाद है, जबकि ऐसा कोई मामला था ही नहीं। उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें डीड में लिखे 80,000 रुपये कभी नहीं मिले और बाद में उन्होंने उस डॉक्यूमेंट को कैंसिल करने के लिए रजिस्टर्ड कैंसिलेशन डीड भी करा दी।
हाईकोर्ट ने पाया कि जिस रिलिंक्विशमेंट डीड के आधार पर बेटियों का अधिकार छीना जा रहा था, उसे बेटे ने अदालत में सबूत के तौर पर पेश ही नहीं किया। इसलिए वह यह साबित नहीं कर सका कि डॉक्यूमेंट सही और वैध था। कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि मान भी लिया जाए कि रिलिंक्विशमेंट डीड सही थी, तब भी पिता केवल अपने हिस्से का त्याग कर सकते थे। वह अपनी बेटियों के जन्म से मिले कानूनी अधिकार समाप्त नहीं कर सकते। अदालत ने माना कि यह संपत्ति पैतृक थी, इसलिए सभी संतानें इसमें बराबर की हकदार हैं।
बेटे ने यह भी दावा किया था कि दूसरी पत्नी केवल रखैल थीं और उनकी छह बेटियां वैध संतान नहीं हैं। लेकिन अदालत ने इस दलील को भी खारिज कर दिया। पिता ने स्वयं कोर्ट में स्वीकार किया कि दूसरी पत्नी से उनका विधिवत विवाह हुआ था और छह बेटियां उसी शादी से पैदा हुई थीं। बेटे की ओर से इसके विपरीत कोई सबूत पेश नहीं किया गया।
हाईकोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखते हुए दूसरी अपील खारिज कर दी। अब संपत्ति का बंटवारा होगा, जिसमें बेटे, पहली पत्नी की बेटी, दूसरी पत्नी की छह बेटियां और पिता के हिस्से पर उनकी दूसरी पत्नी को वसीयत के अनुसार अधिकार मिलेगा। यह फैसला एक बार फिर साफ करता है कि पैतृक संपत्ति में बेटियों का अधिकार कानूनी तौर पर सही है।


