
7 महीने में रुपये में ₹6 से ज्यादा की गिरावट, पेट्रोल-डीजल से लेकर सोना तक पर पड़ेगा असर
भारतीय मुद्रा अब उभरती और विकसित अर्थव्यवस्थाओं में सबसे कमजोर प्रदर्शन करने वाली मुद्रा बनती दिखाई दे रही है। डॉलर के मुकाबले रुपये में इस साल अब तक 5.5 फीसदी से ज्यादा की गिरावट दर्ज की गई है।
रुपये में बुधवार को पांचवें दिन गिरावट आई और यह पहली बार 90 रुपये का स्तर तोड़ते हुए ऑल टाइम निचले स्तर पर पहुंच गया। अंतरबैंक विदेशी मुद्रा बाजार में रुपया 25 पैसे टूटकर 90.21 प्रति डॉलर (अस्थायी) पर बंद हुआ। विदेशी मुद्रा कारोबारियों के मुताबिक, भारत-अमेरिका व्यापार समझौते पर अनिश्चितता कायम रहने और डॉलर के मुकाबले रुपये की गिरावट थामने के लिए रिजर्व बैंक के आगे न आने से स्थानीय मुद्रा रिकॉर्ड निचले स्तर पर आ गई। इसके अलावा स्थानीय स्तर पर डॉलर की बढ़ती मांग और विदेशी निवेशकों की मुनाफावसूली के कारण भी रुपये में गिरावट देखने को मिल रही है।
मंगलवार को भी रुपये में 43 पैसे की बड़ी गिरावट आई थी और यह 89.96 प्रति डॉलर के रिकॉर्ड निचले स्तर पर बंद हुआ था। विदेशी संस्थागत निवेशक (एफआईआई) बीते दो दिनों में 6800 करोड़ रुपये की तगड़ी बिकवाली कर चुके हैं।
पांच फीसदी से अधिक टूटा
बीते सात महीने में रुपये में छह रुपए से ज्यादा की गिरावट देखने को मिल चुकी है। इस दौरान रुपया डॉलर के मुकाबले में करीब पांच फीसदी से अधिक तक टूट चुका है। बाजार के जानकारों का कहना है कि रुपये का 90 के नीचे फिसलना बाजार के लिए एक ‘मनोवैज्ञानिक और तकनीक सपोर्ट’ के टूटने जैसा है। इससे रुपये पर और कमजोरी का खतरा बढ़ गया है। आरबीआई के लेवल को हफ्तों से बचाने का प्रयास कर था।
कीमतों पर तेज असर संभव
भारतीय मुद्रा अब उभरती और विकसित अर्थव्यवस्थाओं में सबसे कमजोर प्रदर्शन करने वाली मुद्रा बनती दिखाई दे रही है। डॉलर के मुकाबले रुपये में इस साल अब तक 5.5 फीसदी से ज्यादा की गिरावट दर्ज की गई है।
विशेषज्ञों के अनुसार, रुपये का कमजोर होना अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकता है। इससे आने वाले दिनों में पेट्रोल, डीजल से लेकर कई वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों में बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है।
आरबीआई के कदम
आरबीआई ने बाजार में डॉलर बेचकर रुपये को सहारा देने की कोशिश की है लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि जब तक विदेशी निवेश और व्यापार समझौते पर प्रगति नहीं होती, रुपया स्थिर नहीं होगा। लंबी अवधि में मजबूत मुद्रा के लिए अंतरराष्ट्रीय निवेश प्रवाह को बढ़ना और व्यापार करार करना जरूरी है।
कब-कब टूटे अहम स्तर
जनवरी 2012 में 50 रुपये
जून 2013 में 60 रुपये
अगस्त 2018 में 70 रुपए
नवंबर 2022 में 80 रुपये
दिसंबर 2025 में 90 रुपये
गिरावट के तीन प्रमुख कारण
1. अमेरिका से व्यापार तनाव : भारत और अमेरिका के बीच अब तक द्विपक्षीय व्यापार समझौता नहीं हो पाया है। उच्च शुल्क से भारत का निर्यात भी बड़े पैमाने पर प्रभावित हुआ है। अगस्त के बाद से रुपये में 1.64 फीसदी की गिरावट आई है।
2. विदेशी निवेशकों की निकासी : विदेशी पोर्टफोलियो निवेश भारतीय बाजारों से पैसा निकाल रहे हैं। इससे डॉलर की मांग बढ़ती दिखाई दे रही है और रुपया कमजोर होता दिखाई पड़ रहा है।
3. बढ़ता व्यापार घाटा : भारत का आयात बढ़ रहा है, लेकिन निर्यात क्षेत्र की बढ़ोतरी सीमित है। इससे व्यापार घाटा भी बढ़ रहा है। रुपया सिर्फ डॉलर के मुकाबले ही नहीं यूरो, पाउंड और जापानी येन के मुकाबले भी कमजोर हुआ है।
इन क्षेत्रों पर पड़ेगा असर
- भविष्य में भारत के लिए विदेशी कर्ज लेना महंगा हो सकता है।
- सोना और इलेक्ट्रिॉनिक्स सामान महंगे हो सकता है।
- कच्चे तेल की खरीद महंगी होगी। भारत अपनी जरूरत का करीब 85 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है।
- भविष्य में पेट्रोल, डीजल और एयरलाइन का टिकट भी महंगा हो सकता है।
- सरकार और कंपनियों के लिए विदेश से लिया गया कर्ज चुकाना महंगा होगा।
- कंपनियों के मुनाफे पर रुपये के कमजोर होने से असर पड़ सकता है।
- भारत का विदेशी मुद्रा भंडार कम हो सकती है।
- भारतीय छात्रों के लिए विदेश में पढ़ाई करना पहले से महंगा होगा।
किन संकेतों से उम्मीदों
1. अमेरिका के साथ व्यापार समझौता जल्द होने की उम्मीद है। इससे रुपये को मजबूती मिल सकती है।
2. रुपया का मौजूदा स्तर विदेशी निवेशकों के लिए मददगार होगा, क्योंकि नए सौदे डॉलर मूल्य पर सस्ती पड़ेंगे





