
रतन टाटा के करीबी रहे मेहली मिस्त्री को झटका! टाटा ट्रस्ट्स से हो सकते हैं बाहर
टाटा ट्रस्ट्स (Tata Trusts) में चल रहा विवाद खत्म होने का नाम नहीं ले रहा। अब इस लड़ाई में एक नया मोड़ आ गया है। इकनॉमिक्स टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार रतन टाटा के करीबी रहे मेहली मिस्त्री (Mehli Mistry) टाटा ट्रस्ट्स से बाहर हो सकते हैं।
टाटा ट्रस्ट्स (Tata Trusts) में चल रहा विवाद खत्म होने का नाम नहीं ले रहा। अब इस लड़ाई में एक नया मोड़ आ गया है। इकनॉमिक्स टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार रतन टाटा के करीबी रहे मेहली मिस्त्री (Mehli Mistry) टाटा ट्रस्ट्स से बाहर हो सकते हैं। रिपोर्ट के अनुसार चेयरमैन नोएल टाटा, वाइस चेयरमैन वेणु श्रीनिवासन और ट्रस्टी विजय सिंह ने उन्हें बाहर करने के लिए मतदान किया है। ये तीन अहम सदस्य मेहली मिस्त्री के कार्यकाल को आगे ना बढ़ाने पर एकमत हैं। टाटा संस में सर रतन टाटा ट्रस्ट और सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट की होल्डिंग 51 प्रतिशत है। वहीं, सभी अन्य ट्रस्ट्स को मिला लिया जाए तो यह होल्डिंग 66 प्रतिशत तक पहुंच जाएगी। इस लिहाज से टाटा ट्रस्ट्स का ट्रस्टी होना काफी अहम माना जाता है।

कौन-कौन है दोनों प्रमुख ट्रस्ट के सदस्य
सर दारोबजी टाटा ट्रस्ट के सदस्य नोएल टाटा, वेणु श्रीनिवासन, मेहली मिस्त्री, प्रमीत झावेरी और डेरियस जे. खंबाटा हैं। वहीं, सर रतन टाटा ट्रस्ट के ट्रस्टी में नोएल टाटा, वेणु श्रीनिवासन, विजय सिंह, जिम्मी टाटा, महेली मिस्त्री, डेरियस जे. खंबाटा और जहांगीर जहांगीर हैं। नियमों के अनुसार मिस्त्री अपने कार्यकाल को आगे बढ़ाने के लिए खुद वोट नहीं कर सकते हैं। ऐसे में बहुमत उनके पक्ष में नहीं है। जिसकी वजह से उन्हें अब टाटा ट्रस्ट्स से बाहर जाना पड़ सकता है। हालांकि, इस मसले पर अभी तक कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है।
मिस्त्री परिवार का अक्टूबर महीने से है पुराना नाता
साल 2016, अक्टूबर के महीने में ही सायरस मिस्त्री को टाटा संस के चेयरमैन पद से हटाया गया था। मेहली मिस्त्री उनके चचेरे भाई हैं। अब अक्टूबर के महीने में ही उनको बाहर किए जाने की बात सामने आ रही है। बता दें, पिछले शुक्रवार को टाटा ट्रस्ट्स के सीईओ सिद्धार्थ खेमका ने मेहली मिस्त्री के कार्यकाल को आगे बढ़ाने का प्रस्ताव दिया था। उनका तीन साल का कार्यकाल 28 अक्टूबर को पूरा हो रहा है।
विजय सिंह से शुरू हुआ विवाद
टाटा ट्रस्ट्स में सदस्यों के कार्यकाल को लेकर फैसला सर्वसम्मति से किया जाता रहा है। यह मामला तब शुरू हुआ जब बोर्ड के नामित सदस्य विजय सिंह को हटाने के लिए मतदान किया गया। जिसके बाद से एक के बाद एक घटनाक्रम सामने आने लगे। वहीं से पूरे देश का ध्यान टाटा ट्रस्ट्स के अंदर चल रहे विवाद पर गया। बता दें, 1932 में लिखे गए सर दोराबरजी टाटा ट्रस्ट के डीड में कहा गया है कि कोरम पूरा करने के लिए तीन ट्रस्टियों को बैठना आवश्यक होगा। वहीं, बैठक में उपस्थित ट्रस्टियों के बहुमत का निर्णय अल्पतम को मानना होगा।
रतन टाटा के देहांत के नौ दिन के बाद 17 अक्टूबर को ट्रस्टियों की बैठक हुई। जिसमें कई महत्वपूर्ण निर्णय लिए गए। इसी मीटिंग में ट्रस्टियों की उम्र सीमा को हटाया गया था। रिपोर्ट के अनुसार अब आजीवन ट्रस्टियों को बनाया रखा जा सकेगा। बता दें, टाटा संस में टाटा ट्रस्ट के बाद सबसे बड़ी होल्डिंग शापूरजी पालोनजी ग्रुप का है। उनके पास 18.37 प्रतिशत हिस्सा है।





