Petrol Diesel New Rates: LPG में बड़े झटके के बाद चेक करें पेट्रोल-डीजल के 1 मई के दाम
मुख्य बातें
- Petrol Diesel New Rates: आज 1 मई है और एलपीजी के रेट्स और बुकिंग संबंधी नियमों में बदलाव हुआ है
- पेट्रोल-डीजल के रेट्स भी जारी हो गए हैं
- एलपीजी तो 1000 रुपये महंगा हो गया, डीजल-पेट्रोल के क्या हैं हाल…

बंगाल समेत 5 राज्यों के चुनाव के बाद आज 1 मई को कमर्शियल एलपीजी सिलेंडर के उपभोक्ताओं को बड़ा झटका लगा। गैस सिलेंडर करीब 1000 रुपये महंगा हो गया। गैस के बाद आज 1 मई को सुबह 6 बजे सरकारी ऑयल माार्केटिंग कंपनियों इंडियन ऑयल, एचपीसीएल और बीपीसीएल ने पेट्रोल-डीजल के रेट जारी कीं। आज 1 मई के ताजा रेट के मुताबिक दिल्ली में इंडियन ऑयल के पंपों पर पेट्रोल 94.77 रुपये और डीजल 87.67 रुपये प्रति लीटर पर उपलब्ध है। यानी एलपीजी की तुलना में पेट्रोल-डीजल की कीमतों को लेकर चुनाव बाद भी राहत है। बता दें कि अप्रैल 2022 के शुरू से ही पेट्रोल और डीजल के रिटेल दाम नहीं बदले हैं।
आम जनता को राहत
इंडियन ऑयल ने एक बयान में कहा कि आम जनता पर असर डालने वाले प्रमुख ईंधनों की दरों में कोई बदलाव नहीं हुआ है। आम नियम के अनुसार, एटीएफ की कीमतों में हर महीने 1 तारीख को इनपुट लागत के आधार पर संशोधन किया जाता है। घरेलू एयरलाइंस के लिए दरों में कोई बदलाव नहीं किया गया है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय विमानन कंपनियों के लिए कीमतों में बढ़ोतरी की गई है।
पेट्रोल-डीजल पर राहत
आईओसी ने कहा कि पेट्रोल और डीजल के रिटेल प्राइस में कोई बदलाव नहीं हुआ है। ये उपभोक्ता कुल खपत का लगभग 90 प्रतिशत हैं। सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) के तहत मिलने वाले मिट्टी के तेल के दाम भी स्थिर रहे। बयान में कहा गया कि कुल मिलाकर, पेट्रोलियम उत्पादों के लगभग 80 प्रतिशत हिस्से के दामों में कोई बदलाव नहीं हुआ है, जिससे अधिकांश उपभोक्ताओं के लिए स्थिरता सुनिश्चित हुई है।
तो कहां हुए बदलाव
आईओसी ने कहा कि रेट में बदलाव सिर्फ कुछ चुनिंदा इंडस्ट्रियल सेगमेंट तक सीमित रखा गया है, जिनकी खपत का हिस्सा बहुत कम है। अंतरराष्ट्रीय विमानन कार्यों के लिए थोक डीजल और एटीएफ के दाम बढ़ाए गए हैं।
कच्चे तेल की कीमतें आसमान पर फिर भी भारत में क्यों नहीं बढ़े पेट्रोल-डीजल के दाम
जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल महंगा होता है और घरेलू कीमतें नहीं बढ़ाई जातीं, तो इसका सीधा नुकसान तेल कंपनियों को उठाना पड़ता है, लेकिन जब बाद में कच्चा तेल सस्ता होता है, तब कंपनियां कीमतें तुरंत कम नहीं करतीं और अपने नुकसान की भरपाई करती हैं।
लंबे समय से पेट्रोल-डीजल के दाम स्थिर
ईरान युद्ध के बीच अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें 77 से 120 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई। दुनिया के कई देशों में पेट्रोल-डीजल के दाम डबल हो गया। अमेरिका से चीन तक में पेट्रोल-डीजल के रेट बढ़े, लेकिन भारत में लंबे समय से पेट्रोल-डीजल के दाम स्थिर हैं। इसके पीछे सिर्फ बाजार नहीं, बल्कि सरकार की रणनीति, चुनावी गणित और टैक्स स्ट्रक्चर का बड़ा रोल होता है।
जून 2017 से देश में पेट्रोल-डीजल के लिए डायनामिक प्राइसिंग सिस्टम लागू है, जिसके तहत कीमतें रोजाना बदल सकती हैं। हालांकि व्यवहार में तेल कंपनियां पूरी तरह स्वतंत्र नहीं होतीं और सरकार का अप्रत्यक्ष नियंत्रण बना रहता है।
चुनाव और तेल कीमतों का कनेक्शन
डेटा और पिछले अनुभव बताते हैं कि चुनाव से पहले तेल कीमतों में बढ़ोतरी रोक दी जाती है और चुनाव खत्म होने के बाद ही बदलाव किया जाता है। पेट्रोल-डीजल और रसोई गैस जैसी जरूरी चीजों की कीमतों का सीधा असर आम लोगों पर पड़ता है, इसलिए ये चुनावी मुद्दा भी बन जाती हैं। यही वजह है कि विधानसभा चुनावों के दौरान अक्सर कीमतों को स्थिर रखा जाता है, ताकि जनता में नाराजगी न बढ़े।
2019 में कई राज्यों के चुनावों के दौरान कीमतों में बदलाव नहीं हुआ। 2020 के बिहार चुनाव में वोटिंग से 51 दिन पहले तक दाम स्थिर रहे और बाद में बढ़ोतरी शुरू हुई। 2021 में पश्चिम बंगाल चुनाव के दौरान भी यही ट्रेंड दिखा। वहीं 2022 में यूपी समेत कई राज्यों के चुनाव से पहले महीनों तक कीमतें नहीं बदलीं और चुनाव के बाद उनमें तेजी आई।
सरकार कैसे संभालती है पूरा खेल
भारत में पेट्रोल-डीजल की कीमतें कई स्तरों पर तय होती हैं। कच्चे तेल को रिफाइन करने के बाद उसमें डीलर कमीशन जुड़ता है। इसके बाद केंद्र सरकार एक्साइज ड्यूटी लगाती है और फिर राज्य सरकारें VAT जोड़ती हैं। इसी वजह से अलग-अलग शहरों में कीमतें अलग होती हैं।
जब कच्चा तेल महंगा होता है, तो सरकार तुरंत दाम नहीं बढ़ाती। वह पहले एक्साइज ड्यूटी घटाती है या तेल कंपनियों से कुछ समय तक घाटा सहने को कहती है। इसे ‘काउंटर-सब्सिडी’ जैसा मॉडल माना जाता है।
घाटे की भरपाई कैसे होती है
जब कच्चे तेल की कीमतें घटती हैं, तो सरकार पेट्रोल-डीजल के दाम तुरंत कम नहीं करती। इससे तेल कंपनियों को पहले हुए नुकसान की भरपाई का मौका मिलता है।
हालांकि हाल के उदाहरण बताते हैं कि ड्यूटी घटाने के बावजूद कंपनियों को नुकसान उठाना पड़ा। एक समय ऐसा भी आया जब कंपनियों को रोजाना करीब 1,600 करोड़ रुपये तक का नुकसान हुआ।
आयात रणनीति में बदलाव
ईरान युद्ध के बाद भारत ने कच्चे तेल के आयात के स्रोतों में भी बदलाव किया है। रूस से आयात बढ़ाया गया, जो औसतन 15 लाख बैरल प्रतिदिन तक पहुंच गया और इसे 20 लाख बैरल तक बढ़ाया जा सकता है। इसके अलावा अमेरिका और अफ्रीकी देशों से भी तेल खरीदा जा रहा है। सरकार का कहना है कि अब सिर्फ करीब 30% तेल होर्मुज रूट से आता है, जबकि बाकी 70% अन्य रास्तों से मंगाया जा रहा है, जिससे सप्लाई जोखिम कम हो सके।
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Drigraj Madheshiaदृगराज मद्धेशिया पिछले 21 वर्षों से पत्रकारिता जगत का एक विश्वसनीय चेहरा हैं। वर्तमान में 'लाइव हिन्दुस्तान' की बिजनेस टीम के एक महत्वपूर्ण सदस्य के रूप में, वे शेयर बाजार, कमोडिटी, पर्सनल फाइनेंस और यूटिलिटी सेक्टर पर अपनी गहरी पकड़ रखते हैं। वह कलम से बाजार की नब्ज टटोलने वाले एक पत्रकार हैं, जो शेयर बाजार से लेकर आपकी जेब (Personal Finance) तक, हर खबर को आसान बनाते हैं। टीवी, प्रिंट और डिजिटल मीडिया के अपने विस्तृत अनुभव के साथ, दृगराज जटिल मार्केट डेटा को आम पाठकों के लिए 'कुछ अलग' और आसान भाषा में पेश करने के लिए पहचाने जाते हैं। उन्होंने अपने करियर में हिन्दुस्तान, सहारा समय, दैनिक जागरण और न्यूज नेशन जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में अपनी सेवाएं दी हैं। मूलत: उत्तर प्रदेश के कुशीनगर जिले के रहने वाले दृगराज मैथ्स बैकग्राउंड होने के कारण डेटा और कैलकुलेशन में माहिर हैं, जो बिजनेस पत्रकारिता के लिए एक बड़ा प्लस पॉइंट है। उन्होंने कॅरियर की शुरुआत गोरखपुर से सहारा समय साप्ताहिक से बतौर फ्रीलांसर की और बहुत ही जल्द सहारा समय उत्तर प्रदेश/उत्तराखंड के हिस्सा बन गए। इसके बाद छत्तीसगढ़ में वॉच न्यूज से जुड़े। टीवी को छोड़ हिन्दुस्तान अखबार के बरेली एडिशन की लॉन्चिंग टीम का हिस्सा बने। साढ़े सात साल की मैराथन पारी के बाद अगला पड़ाव न्यूज नेशन डिजिटल रहा। इसके बाद एक बार फिर हिन्दुस्तान दिल्ली से जुड़े और अब डिजिटल टीम का हिस्सा हैं। और पढ़ें


