कम बारिश का बड़ा प्रभाव: चावल-दाल, तेल की कीमतों में अभी से लगी 'आग', आगे होगा और भी बुरा हाल?

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मुख्य बातें

  • Mansoon Impacts: खरीफ की मुख्य दालों तूर यानी अरहर, उड़द और मूंग की कीमतों में भी जून में तेजी आई है
  • जून महीने में चावल (धान) में महंगाई दर बढ़कर 1.72 प्रतिशत हो गई
  • तिलहन में महंगाई जून में 5.42 प्रतिशत दर्ज की गई
mansoon impacts rising prices of rice lentils and oil sowing down due to scanty rainfall will inflation rise further

आने वाले समय में आपकी थाली में दाल पतली, सब्जियों में थोड़े तेल कम और चावल में कटौती दिख सकती है। क्योंकि, खरीफ सीजन की प्रमुख फसलों की बुआई घटने से खुदरा कीमतों में बढ़ोतरी शुरू हो गई है, जिससे नई महंगाई का दबाव पैदा हो रहा है। जून महीने में चावल (धान) में महंगाई दर बढ़कर 1.72 प्रतिशत हो गई, जो मई में सिर्फ 0.23 प्रतिशत थी। इसकी वजह यह है कि 10 जुलाई तक धान की बुआई पिछले साल की समान अवधि के मुकाबले 8.63 प्रतिशत कम हो गई है।

दालों पर संकट के बादल

खरीफ की मुख्य दालों तूर यानी अरहर, उड़द और मूंग की कीमतों में भी जून में तेजी आई है। तूर की महंगाई मई में -1.77 प्रतिशत (यानी कीमतें घट रही थीं) से जून में चढ़कर 0.85 प्रतिशत पर पहुंच गई। उड़द की महंगाई 0.89 प्रतिशत से बढ़कर 2.16 प्रतिशत और मूंग की 1.15 प्रतिशत से बढ़कर 1.71 प्रतिशत हो गई। इन दालों की बुआई में क्रमशः 30.29 प्रतिशत, 29.71 प्रतिशत और 10.62 प्रतिशत की गिरावट आई है, जिससे आने वाले महीनों में सप्लाई को लेकर चिंताएं बढ़ गई हैं।

9. Urad Dal (उड़द दाल)

तिलहन और मोटे अनाज की स्थिति

तिलहन में महंगाई जून में 5.42 प्रतिशत दर्ज की गई, जो मई में 4.9 प्रतिशत थी, क्योंकि तिलहन की बुआई 10 जुलाई तक पिछले साल के मुकाबले 21.1 प्रतिशत घट गई। ऐसे में खाद्य तेलों जैसे सरसों तेल, सोया ऑयल और सूरजमुखी के महंगे वहीं, ज्वार और रागी जैसे मोटे अनाजों की महंगाई भी बढ़ी है, जिन्हें कमजोर इलाकों में वैकल्पिक फसल के रूप में बढ़ावा दिया जा रहा है।

mustard oil

क्यों बिगड़ रहे हालात

द इकनॉमक टाइम्स ने बैंक ऑफ बड़ौदा के मुख्य अर्थशास्त्री मदन सबनवीस के हवाले से बताया है कि दालें एक मौसम में ही उगने वाली फसलें हैं, इसलिए एक बार की फसल अगली फसल आने तक चलनी पड़ती है। बुआई में देरी या क्षेत्र घटने से भविष्य की उपलब्धता को लेकर चिंता बढ़ जाती है, जिससे कीमतों पर दबाव पड़ता है।

उन्होंने कहा कि जब तक फसल की स्थिति और पैदावार स्पष्ट नहीं होती, दालों की कीमतें ऊंची बनी रहेंगी। व्यापारी और थोक विक्रेता कम बारिश या देरी से बुआई के कारण बेहतर दाम मिलने की उम्मीद में अपना माल रोके रखते हैं, जिससे आपूर्ति सीमित हो जाती है और कीमतें बढ़ती हैं।

बारिश की कमी और जोखिम वाले राज्य

भारत मौसम विभाग के अनुसार इस साल देश में सामान्य से कम बारिश होने की संभावना है, जो लंबी अवधि के औसत का करीब 90 प्रतिशत ही रहेगी। जून में बारिश की कमी करीब 40 प्रतिशत रही, जिससे धान, दालें, तिलहन और मोटे अनाज सहित सभी प्रमुख फसलों की बुआई में देरी हुई। जुलाई के पहले सप्ताह में कई राज्यों में भारी बारिश हुई, लेकिन कमी पूरी नहीं हो पाई।

धान की फसल

क्या कह रहे मौसम विभाग के आंकडे़

आईएमडी के आंकड़ों के अनुसार, 738 जिलों में से 44 प्रतिशत से अधिक जिलों में अब भी बारिश की कमी है और 10 प्रतिशत जिलों में भारी कमी है। क्वांटईको रिसर्च की रिपोर्ट के अनुसार, मानसून कमजोर रहने पर दालें, मोटे अनाज, तिलहन और कपास सबसे अधिक संकटग्रस्त फसलें होंगी। महाराष्ट्र, राजस्थान, कर्नाटक, झारखंड और छत्तीसगढ़ जैसे राज्य, जहां सिंचाई की सुविधा सबसे कम है, सबसे अधिक असुरक्षित हैं।

Drigraj Madheshia

लेखक के बारे में

Drigraj Madheshia

दृगराज मद्धेशिया पिछले 21 वर्षों से पत्रकारिता जगत का एक विश्वसनीय चेहरा हैं। वर्तमान में 'लाइव हिन्दुस्तान' की बिजनेस टीम के एक महत्वपूर्ण सदस्य के रूप में, वे शेयर बाजार, कमोडिटी, पर्सनल फाइनेंस और यूटिलिटी सेक्टर पर अपनी गहरी पकड़ रखते हैं। वह कलम से बाजार की नब्ज टटोलने वाले एक पत्रकार हैं, जो शेयर बाजार से लेकर आपकी जेब (Personal Finance) तक, हर खबर को आसान बनाते हैं। टीवी, प्रिंट और डिजिटल मीडिया के अपने विस्तृत अनुभव के साथ, दृगराज जटिल मार्केट डेटा को आम पाठकों के लिए 'कुछ अलग' और आसान भाषा में पेश करने के लिए पहचाने जाते हैं। उन्होंने अपने करियर में हिन्दुस्तान, सहारा समय, दैनिक जागरण और न्यूज नेशन जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में अपनी सेवाएं दी हैं। मूलत: उत्तर प्रदेश के कुशीनगर जिले के रहने वाले दृगराज मैथ्स बैकग्राउंड होने के कारण डेटा और कैलकुलेशन में माहिर हैं, जो बिजनेस पत्रकारिता के लिए एक बड़ा प्लस पॉइंट है। उन्होंने कॅरियर की शुरुआत गोरखपुर से सहारा समय साप्ताहिक से बतौर फ्रीलांसर की और बहुत ही जल्द सहारा समय उत्तर प्रदेश/उत्तराखंड के हिस्सा बन गए। ​इसके बाद छत्तीसगढ़ में वॉच न्यूज से जुड़े। टीवी को छोड़ हिन्दुस्तान अखबार के बरेली एडिशन की लॉन्चिंग टीम का हिस्सा बने। साढ़े सात साल की मैराथन पारी के बाद अगला पड़ाव न्यूज नेशन डिजिटल रहा। इसके बाद एक बार फिर हिन्दुस्तान दिल्ली से जुड़े और अब डिजिटल टीम का हिस्सा हैं। और पढ़ें

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