
क्या भारतीय रुपये का गिरना भी एक अच्छी खबर है? जानें किसे होगा फायदा
रुपये का गिरना निर्यात के लिए दोहरा फायदा है। भारत में कीमतें कम हैं और इसकी मुद्रा कमजोर हुई है। नतीजा यह है कि एक अमेरिकी खरीदार के लिए भारतीय सामान पहले से सस्ता हो गया है। हालांकि, भारतीयों के लिए अमेरिकी सामान खरीदना महंगा हो गया है।
रुपया मंगलवार को शुरुआती कारोबार में 10 पैसे टूटकर 90.15 प्रति डॉलर पर आ गया। विदेशी मुद्रा कारोबारियों ने बताया कि अमेरिकी डॉलर मांग की मजबूत मांग से निवेशकों की धारणा प्रभावित हुई और वे सतर्क रुख अपनाए हुए हैं। अंतरबैंक विदेशी करेंसी मार्केट में रुपया, अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 90.15 पर खुला जो पिछले बंद भाव से 10 पैसे की गिरावट दर्शाता है।
रुपया 2025 की शुरुआत से 5% से अधिक टूट चुका है। इस साल एक्सचेंज रेट में काफी गिरावट आई है, लेकिन ताजा झटका अक्टूबर महीने में निर्यात में 12% की गिरावट से लगा है। यह गिरावट मुख्य रूप से अमेरिका को होने वाले निर्यात में कमी के कारण है। बाजार इस बात से चिंतित हैं कि अमेरिका के उच्च टैरिफ भारत के सबसे बड़े निर्यात बाजार को नुकसान पहुंचाने लगे हैं।
रुपये का गिरना क्या एक अच्छी खबर है
अच्छी खबर यह है कि रुपये की कमजोरी से भारतीय निर्यात डॉलर के मुकाबले सस्ता हो जाता है, जो अमेरिकी टैरिफ से होने वाले कुछ नुकसान की भरपाई करता है। इस बार तो नाममात्र एक्सचेंज रेट में गिरावट के साथ-साथ भारत और अमेरिका के बीच मुद्रास्फीति के अंतर में भी कमी आई है। भारत में उपभोक्ता मूल्य मुद्रास्फीति 1% से नीचे आ गई है, जबकि अमेरिका में यह 2-3% पर स्थिर दिख रही है।
यह निर्यात के लिए दोहरा फायदा है। भारत में कीमतें कम हैं और इसकी मुद्रा कमजोर हुई है। नतीजा यह है कि एक अमेरिकी खरीदार के लिए भारतीय सामान पहले से सस्ता हो गया है। हालांकि, भारतीयों के लिए अमेरिकी सामान खरीदना महंगा हो गया है।
दूसरे शब्दों में, वास्तविक रूप में रुपया डॉलर के मुकाबले कम कीमत पर है यानी अवमूल्यित है। "वास्तविक अवमूल्यन" का मतलब है कि रुपये के मूल्य में आई गिरावट नाममात्र मूल्यह्रास और सापेक्ष कीमतों दोनों का नतीजा है।
निर्यात-आयात से संबंध
वास्तविक एक्सचेंज रेट में बदलाव का निर्यात और आयात दोनों पर असर देखना जरूरी है, और इसके दो कारण हैं। पहला, वैश्विक व्यापार में निर्यात और आयात आपस में गहराई से जुड़े हुए हैं। अनुमान है कि अंतरराष्ट्रीय व्यापार का लगभग 70% हिस्सा वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं से होकर गुजरता है, जहां अंतिम उत्पाद ग्राहक तक पहुंचने से पहले वस्तुएं और सेवाएं मूल्यवर्धन के लिए बार-बार सीमाओं के पार जाती हैं।
भारत कुछ निर्यात-उन्मुख अर्थव्यवस्थाओं की तरह इन श्रृंखलाओं में उतना नहीं बसा है, लेकिन यह आयातित कच्चे माल और मध्यवर्ती वस्तुओं पर बहुत अधिक निर्भर करता है।
एक्सिम बैंक के हालिया अध्ययन से पता चला है कि 2022-23 में, समग्र विनिर्माण क्षेत्र के लिए कच्चे माल की आयात तीव्रता 33.4% थी, और रत्न और आभूषण (68.4%), इलेक्ट्रॉनिक्स (64%), और रसायन (63%) जैसे शीर्ष निर्यात-उन्मुख उद्योगों के लिए यह बहुत अधिक थी। इन क्षेत्रों के लिए, नाममात्र मूल्यह्रास से मिलने वाली अतिरिक्त प्रतिस्पर्धात्मकता आयातित इनपुट की उच्च लागत से कमजोर हो जाती है।
चीन पर निर्भरता
दूसरा, भारत प्रमुख औद्योगिक सामग्रियों के आयात के लिए काफी हद तक चीन पर निर्भर है। वस्तु श्रेणियों के अनुसार आयात की मैपिंग से इस निर्भरता का पता चलता है कि शीर्ष 15 श्रेणियों में से 10 में चीन का दबदबा है या वह एक महत्वपूर्ण आपूर्तिकर्ता है। भारतीय आयातकों के लिए खुशकिस्मती से, चीन लंबे समय से मूल्य अपस्फीति के दौर से गुजर रहा है, और चीनी वस्तुओं की कम कीमतें कुछ हद तक रुपये की कमजोरी के प्रभाव को कम करती हैं।
सस्ते आयात का खतरा
लेकिन, यह प्रक्रियाभारतीय घरेलू निर्माताओं के लिए उलट काम करती है, जो विदेशी कम लागत वाले उत्पादकों के मुकाबले नुकसान में हैं, खासकर अगर उनकी कम कीमतें कमजोर रुपये के असर से ज्यादा भारी पड़ें। उदाहरण के लिए, जनवरी 2024 और अक्टूबर 2025 के बीच, चीन में औसत मुद्रास्फीति लगभग 0.04% थी, जबकि भारत की मुद्रास्फीति औसतन 4% पर बहुत अधिक थी। इस प्रकार, हालांकि रुपया नाममात्र रूप से युआन के मुकाबले कमजोर हुआ, फिर भी चीन से आयात करना स्थानीय रूप से उत्पादन करने से सस्ता रहा होगा।
इसके अलावा, बड़ी अतिरिक्त क्षमताओं और कमजोर घरेलू मांग के कारण, चीनी निर्माताओं के बाजार दर से कम कीमत पर सामान डंप करने की सूचना है। चीनी स्टील उत्पादों पर "सुरक्षात्मक शुल्क" लगाने का हालिया सुझाव इन्हीं घटनाक्रमों का एक उप-उत्पाद है।
करेंसी की सीमाएं
वास्तविक एक्सचेंज रेट और निर्यात केबीच संबंध जटिल है। विश्व बैंक के एक अध्ययन में पाया गया कि जब कोई फर्म अपने मध्यवर्ती इनपुट का 30% से अधिक आयात करती है तो अवमूल्यित वास्तविक एक्सचेंज रेट का निर्यात पर सकारात्मक प्रभाव खत्म हो जाता है। उपरोक्त एक्सिम बैंक अध्ययन ने भारत के आयात-गहन इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र के लिए ऐसा ही नतीजा पाया।
प्रतिस्पर्धात्मकता सुधार की जरूरत
1970 केदशक में, एशियाई टाइगर्स ने निर्यात-आधारित विकास रणनीति को आगे बढ़ाने के लिए प्रबंधित एक्सचेंज रेटों पर भरोसा किया था; स्पष्ट है कि आज यह काम नहीं करेगा। निश्चित रूप से, एक अवमूल्यित वास्तविक एक्सचेंज रेट विशेष रूप से अगर यह बड़े नाममात्र मूल्यह्रास से प्रेरित है, तो एकमुश्त निर्यात प्रोत्साहन दे सकती है। लेकिन लगातार आधार पर, निर्यात प्रतिस्पर्धात्मकता काफी हद तक विश्व विकास और उत्पादकता पर निर्भर करती है। निर्यात तभी तेजी से बढ़ने की संभावना होती है जब वैश्विक विकास मजबूत हो और घरेलू निर्माता वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी हों।
हमें अभी लंबा रास्ता तय करना है
भारत ने व्यवसाय के संचालन में आसानी सुधारने के लिए हाल ही में कुछ महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। इनमें प्रमुख श्रम सुधारों को अधिसूचित करना, वित्तीय क्षेत्र के कुछ हिस्सों को विदेशी पूंजी के लिए खोलना और टैक्स के बोझ को कम करना शामिल है। फिर भी हमें अभी लंबा रास्ता तय करना है। प्रतिस्पर्धात्मकता के एक व्यापक रूप से ट्रैक किए जाने वाले सूचकांक में भारत का 69 देशों में 41वां स्थान है, जो उत्पादकता में बुनियादी ढांचे की अपर्याप्तता और सरकारी अक्षमताओं को मुख्य बाधा के रूप में रेखांकित करता है।





