महंगा है भारतीय शेयर बाजार...मार्केट रिस्क को लेकर बोले सरकार के CEA
मुख्य आर्थिक सलाहकार (सीईए) नागेश्वरन ने मौजूदा बाजार जोखिमों के बारे में आगाह करते हुए कहा कि ये जोखिम कुछ गिनी-चुनी बड़ी कंपनियों के वर्चस्व और बैंकों से हटकर अपेक्षाकृत कम विनियमित गैर-बैंक स्रोतों की तरफ वैश्विक वित्तीय प्रवाह के कारण और बढ़ रहे हैं।

भारतीय शेयर बाजार बहुत महंगा हो गया। मुख्य आर्थिक सलाहकार (सीईए) वी. अनंत नागेश्वरन ने आर्थिक समीक्षा पेश होने के बाद मीडिया से बातचीत के दौरान ये बात कही। उन्होंने कहा कि साल 2008 के बाद का ईजी मनी यानी आसानी से पैसे की उपलब्धता वाला दौर वर्ष 2022 और 2023 में उच्च मुद्रास्फीति का कारण बना और शेयर बाजार को भी काफी महंगा कर दिया। उन्होंने कहा- शेयर बाजार के वैल्युएशन मार्च, 2000 में टेक कंपनियों का गुब्बारा फूटने से पहले के स्तर तक पहुंच गए थे। नागेश्वरन ने मौजूदा बाजार जोखिमों के बारे में आगाह करते हुए कहा कि ये जोखिम कुछ गिनी-चुनी बड़ी कंपनियों के वर्चस्व और बैंकों से हटकर अपेक्षाकृत कम रेग्युलेटेड नॉन-बैंक सोर्सेज की तरफ ग्लोबल फाइनेंशियल फ्लो के कारण और बढ़ रहे हैं।
लोकलुभावन योजनाओं पर क्या बोले?
नागेश्वरन ने यह भी कहा कि परिवारों को कैश ट्रांसफर किए जाने की आर्थिक गतिविधियों में एक भूमिका होती है लेकिन इसका प्रभाव तभी अधिक होता है जब इसे उत्पादकता बढ़ाने वाले निवेश के साथ जोड़ा जाए। उन्होंने ये बात संसद में पेश आर्थिक समीक्षा के संदर्भ में कही। दरअसल, आर्थिक समीक्षा में कहा गया है कि राज्यों में चुनावों के समय लोकलुभावन योजनाओं और बिना-शर्त कैश पर खर्च बढ़ने से राज्यों की राजकोषीय अनुशासनहीनता बढ़ सकती है जिसका असर देश की सरकारी उधारी लागत पर भी पड़ सकता है। नागेश्वरन ने कहा कि राज्य के स्तर पर किसी भी तरह की वित्तीय अनुशासनहीनता सरकार के स्तर पर उधारी की लागत को भी प्रभावित करती है।
आर्थिक समीक्षा में क्या-क्या कहा गया है?
आर्थिक समीक्षा के मुताबिक, जहां केंद्र सरकार ने राजकोषीय मजबूती के साथ रिकॉर्ड सार्वजनिक निवेश भी किया है, वहीं कई राज्यों में बढ़ते राजस्व घाटे और बिना शर्त नकद अंतरण वृद्धि-उन्मुख खर्च को पीछे धकेलने का जोखिम पैदा कर रहे हैं। समीक्षा में कहा गया कि भारतीय सरकारी बॉन्ड अब वैश्विक सूचकांकों में शामिल हो चुके हैं और निवेशक अब केवल केंद्र सरकार नहीं, बल्कि सामान्य सरकारी वित्त का आकलन कर रहे हैं। ऐसे में राज्यों की कमजोर वित्तीय स्थिति को अब स्थानीय समस्या मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है।
रोजगार के मोर्चे पर पॉजिटिव संकेत
रोजगार के मोर्चे पर पॉजिटिव संकेतों की तरफ इशारा करते हुए उन्होंने कहा कि बेरोजगारी दर छह प्रतिशत से घटकर 2023-24 में 3.2 प्रतिशत रह गई। इसके अलावा महिला श्रम बल भागीदारी में लगभग 18 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। नागेश्वरन ने कहा कि चालू वित्त वर्ष के पहले नौ महीनों में बेरोजगारी दर में लगातार गिरावट आई है और यह 5.4 प्रतिशत से घटकर अंतिम तिमाही में 4.9 प्रतिशत पर आ गई है।
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