भारत के अमीर जवान बने रहने को लुटा रहे पैसे, जानें कैसे बन रहा है लंबी उम्र का कारोबार
भारत के अमीर लोग अपने स्वास्थ्य को बेहतर बनाने और उम्र कम करने के लिए नए-नए उपचार, सप्लीमेंट्स, जिम, और आधुनिक तकनीकों जैसे कोल्ड प्लंज, इन्फ्रारेड थेरेपी और हायपरबारिक ऑक्सीजन थेरेपी का इस्तेमाल करते हैं।
भारत में यह “अमीरों का खेल” माना जाता है, जो अपनी उम्र बढ़ाने और जीवन की गुणवत्ता सुधारने के लिए महंगे इलाज और तकनीकों को अपना रहे हैं। हालांकि, ये सेवाएं अभी सीमित वर्ग के लिए उपलब्ध हैं, लेकिन भविष्य में यह क्षेत्र बढ़ने और आम जनता तक पहुंचने की संभावना रखता है। विशेषज्ञ मानते हैं कि स्वास्थ्य में सुधार के जरिए ही दीर्घायु संभव है, न कि कोई जादू की गोली।

भारतीय लॉन्गेविटी स्टार्टअप्स का उदय
मुंबई के 30 वर्षीय मैनेजमेंट कंसल्टेंट और दिल्ली के 36 वर्षीय मीडिया प्रोफेशनल की लाइफ स्टाइल को अगर देखें तो ये बायोहैकिंग और हैल्थ-सेविंग टेक्निक्स में गहरी रुचि रखते हैं। वे अपने स्वास्थ्य को बेहतर बनाने और उम्र कम करने के लिए नए-नए उपचार, सप्लीमेंट्स, जिम और आधुनिक तकनीकों जैसे कोल्ड प्लंज, इन्फ्रारेड थेरेपी और हायपरबारिक ऑक्सीजन थेरेपी का इस्तेमाल करते हैं। इस बढ़ती रुचि ने भारतीय उद्यमियों और निवेशकों का ध्यान आकर्षित किया है, जो व्यक्तिगत सप्लीमेंट्स और थेरपियों की सुविधा देने वाले स्टार्टअप्स शुरू कर रहे हैं।
पिछले दो वर्षों में भारत में फॉक्सो हेल्थ, Vieroots Wellness Solutions, बायोपिक, ह्यूमन एज जैसे कई स्टार्टअप्स उभरे हैं, जो नई और वैज्ञानिक रूप से आधारित चिकित्सा और स्वास्थ्य सुधार सेवा देते हैं। ये स्टार्टअप्स ₹45,000 से ₹2.6 लाख तक सालाना सदस्यता में व्यक्तिगत स्वास्थ्य जांच, जीनोमिक टेस्टिंग, न्यूट्रिशन काउंसलिंग, एक्सरसाइज ट्रेनिंग और थेरापी प्रदान करते हैं, जिनकी कीमतें आम तौर पर महंगी होती हैं।
दीपिंदर गोयल ने शुरू किया $25 मिलियन का फंड
इस क्षेत्र में निवेश भी बढ़ रहा है। जोमैटो के CEO दीपिंदर गोयल ने $25 मिलियन का फंड शुरू किया है, जबकि Biopeak, Human Edge, Foxo Health जैसे स्टार्टअप्स ने निवेश जुटाया है। हालांकि, भारत में यह क्षेत्र अभी शुरुआती चरण में है, जबकि अमेरिका में इस क्षेत्र में निवेशक पहले से काफी सक्रिय हैं।
चुनौतियां और भविष्य
विशेषज्ञों के अनुसार, भारतीय आबादी के लिए जायंटिक बायोमार्कर और स्वास्थ्य डेटा पर अनुसन्धान की आवश्यकता है क्योंकि भारतीय और पश्चिमी आबादी के जीन और जीवनशैली में अंतर है। इस क्षेत्र में नियमन भी आने की उम्मीद है, जिससे बेहतर प्रोटोकॉल और सेवा सुनिश्चित होगी। अभी यह क्षेत्र समग्र विज्ञान के बजाय वेलनेस के बीच एक ग्रे क्षेत्र है, जिसमें प्रभावी और प्रमाणित परिणाम की कमी है।





