भारत को ऐसे नुकसान झेलने पड़ सकते हैं जिन्हें... रघुराम राजन की बड़ी चेतावनी
राजन ने कहा कि अमेरिकी आयात शुल्क में हालिया बढ़ोतरी से कई उद्योगों में तनाव बढ़ गया है। बड़ी कंपनियां जैसे कि ऐपल, अपने भारत-निर्मित उत्पादों पर कुछ छूट हासिल कर लेती हैं, लेकिन छोटे निर्यातक भारी नुकसान झेल रहे हैं।
Raghuram Rajan: भारत, चीन के बढ़ते आर्थिक प्रभाव से चिंतित है, लेकिन साथ ही उसे अपने पारंपरिक सहयोगी संयुक्त राज्य अमेरिका (US) से निराशा का सामना भी करना पड़ रहा है। जैसे-जैसे व्यापारिक तनाव और टैरिफ (आयात शुल्क) बढ़ रहे हैं, देश के छोटे निर्यातक वैश्विक बाजारों से बाहर होते जा रहे हैं। इस स्थिति पर चिंता जताते हुए पूर्व भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) गवर्नर और दिग्गज अर्थशास्त्री रघुराम राजन ने कहा कि भारत को ऐसे नुकसान झेलने पड़ सकते हैं जिन्हें 'कभी पूरी तरह से वापस नहीं पाया जा सकेगा।'

'भारत को है डर...'
हाल ही में एक इंटरैक्शन के दौरान राजन ने कहा कि भारत, चीन की ट्रेड पावर को लेकर बेहद असहज महसूस कर रहा है। उन्होंने कहा, 'भारत को चिंता है कि चीनी वस्तुएं उसके बाजार में बाढ़ की तरह भर जाएंगी। भारत चीनी निवेश का स्वागत करता है, लेकिन वह चीन पर निर्भर नहीं होना चाहता।' राजन ने बताया कि भारत फिलहाल जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ संबंध मजबूत करने की दिशा में काम कर रहा है और वह अमेरिका के साथ दीर्घकालिक रणनीतिक पार्टनरशिप बनाना चाहता है। लेकिन, उन्होंने अफसोस जताया कि भारत-अमेरिका संबंध अब 'बहुत ज्यादा लेन-देन आधारित' हो गए हैं।
अमेरिकी टैरिफ से भारतीय उद्योगों में तनाव
राजन ने कहा कि अमेरिकी आयात शुल्क में हालिया बढ़ोतरी से कई उद्योगों में तनाव बढ़ गया है। बड़ी कंपनियां जैसे कि ऐपल, अपने भारत-निर्मित उत्पादों पर कुछ छूट हासिल कर लेती हैं, लेकिन छोटे निर्यातक भारी नुकसान झेल रहे हैं। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा, 'मेरी एक परिचित अमेरिकी दुकानों में कपड़े बेचती थीं। अब उनका पूरा काम रुक गया है क्योंकि 50% आयात शुल्क के कारण वह अपने उत्पाद वहां बेच नहीं पा रही हैं।'
छोटे उद्योगों के लिए स्थायी नुकसान का खतरा
राजन ने चेतावनी दी कि यह संकट भारत के छोटे और मध्यम उद्योगों (SMEs) के लिए बेहद गंभीर है। एक बार जब किसी अंतरराष्ट्रीय खरीदार के साथ संबंध टूट जाते हैं, तो उन्हें फिर से जोड़ना लगभग असंभव होता है। उन्होंने कहा, 'ऐसे हालात में कोई और—जैसे बांग्लादेश या वियतनाम—उस अवसर को तुरंत ले लेता है। जितना अधिक समय यह स्थिति बनी रहती है, उतना ही यह एक स्थायी नुकसान बन जाती है।'
रणनीतिक संतुलन की चुनौती
रघुराम राजन की यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब भारत अपनी आर्थिक निर्भरता को संतुलित करने की कोशिश कर रहा है एक ओर रणनीतिक प्रतिद्वंद्वी चीन, और दूसरी ओर अस्थिर सहयोगी अमेरिका। भारत का लक्ष्य है कि वह किसी एक देश पर अत्यधिक निर्भर न रहे, लेकिन बढ़ते टैरिफ और ग्लोबल सप्लाई चेन के पुनर्गठन के बीच यह संतुलन बनाए रखना दिन-ब-दिन मुश्किल होता जा रहा है।



