सरकार पर कितना भारी पड़ेगा 100 डॉलर का तेल, पेट्रोल-डीजल, LPG पर क्या पड़ेगा असर?
अगर क्रूड की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के आसपास बनी रहती हैं, तो हर महीने केंद्र सरकार पर करीब अतिरिक्त 30,000 करोड़ रुपये का अतिरिक्त वित्तीय भार डालेंगी। यह राशि मुख्य रूप से OMC के पेट्रोल और डीजल पर होने वाले नुकसान की भरपाई के लिए खर्च होगी।

अगर कच्चे तेल की कीमतें वित्त वर्ष 2027 में 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बनी रहती हैं, तो केंद्र सरकार पर हर साल अतिरिक्त 3.6 लाख करोड़ रुपये का वित्तीय बोझ पड़ सकता है। यह जानकारी एएनआई ने एलारा सिक्योरिटीज नामक संस्था की एक रिपोर्ट के हवाले से दी है। रिपोर्ट में कहा गया है कि मिडिल ईस्ट में चल रहे संघर्ष के कम होने के आसार नहीं दिख रहे हैं, जिससे एशिया में ऊर्जा संकट और गहरा सकता है और ग्लोबल सप्लाई चेन बाधित हो सकती हैं।
चालू खाता घाटा और रुपए पर दबाव बढ़ने की आशंका
रिपोर्ट के अनुसार, अगर ब्रेंट क्रूड की कीमत पूरे वित्त वर्ष 2027 के दौरान 100 डॉलर प्रति बैरल पर बनी रहती है, तो भारत का चालू खाता घाटा (Current Account Deficit) बढ़कर सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का 2 प्रतिशत हो सकता है। यह तब है जब कीमत 70 डॉलर प्रति बैरल रहने पर यह घाटा 1 प्रतिशत रहता है। इसका सीधा असर रुपए पर भी पड़ेगा और डॉलर के मुकाबले रुपया और कमजोर होकर 94 से 95 के स्तर तक जा सकता है।
हर महीने 30000 करोड़ का अतिरिक्त बोझ
एलारा सिक्योरिटीज ने यह भी कहा कि अगर तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के आसपास बनी रहती हैं, तो हर महीना केंद्र सरकार पर करीब अतिरिक्त 30,000 करोड़ रुपये का अतिरिक्त वित्तीय भार डालेंगी। यह राशि मुख्य रूप से ऑयल मार्केटिंग कंपनियों (OMC) के पेट्रोल और डीजल पर होने वाले नुकसान की भरपाई के लिए खर्च होगी। इस अनुमान में यह माना गया है कि सरकार इन कंपनियों के नुकसान को कम करने के लिए एक्साइज ड्यूटी में कटौती कर सकती है और रसोई गैस (LPG) पर सब्सिडी भी बढ़ा सकती है।
होर्मुज स्ट्रेट में संकट से बढ़ी तेल की कीमतें
इस रिपोर्ट के आने के बीच ही वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतें फिर से 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई हैं। ब्लूमबर्ग के मुताबिक ईरान युद्ध के कारण मिडिल ईस्ट में जहाजरानी में फैली अफरा-तफरी और चीन द्वारा ईंधन निर्यात पर लगाई गई पाबंदियों की वजह से यह उछाल आया है। होर्मुज स्ट्रेट, जहां से दुनिया का पांचवां हिस्सा तेल आता-जाता है, प्रभावी रूप से बंद पड़ा है। इस वजह से खाड़ी के प्रमुख उत्पादक देशों को अपना उत्पादन कम करना पड़ा है, जिससे बाजार में और दबाव बढ़ा है।
लंबे समय तक संकट से बढ़ सकता है आर्थिक जोखिम
रिपोर्ट में आगे कहा गया है कि लंबे समय तक चलने वाला संकट अर्थव्यवस्था पर दूसरे स्तर के दुष्प्रभाव भी डाल सकता है। आर्थिक विकास में आई मंदी के कारण सरकार के टैक्स कलेक्शन में कमी आ सकती है, जिससे सरकारी वित्त पर और दबाव बढ़ेगा। हालांकि, एक महीने के संकट को सरकार अपने आंतरिक वित्तीय उपायों से संभाल सकती है, लेकिन लंबे समय तक तेल की ऊंची कीमतें और भू-राजनीतिक तनाव वित्तीय जोखिम को बढ़ा सकते हैं और सरकार को अपने पूंजीगत खर्च में कटौती करनी पड़ सकती है।
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