युद्ध का असर: संकट में कपड़ा से लेकर शराब बनाने वाली कंपनियां, सप्लाई चेन टूटी, लागत बढ़ी

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मुख्य बातें

  • युद्ध का असर: पश्चिम एशिया में इरान-ईरायल युद्ध का असर भारत के उद्योगों पर दिखने लगा है
  • केमिकल, कपड़ा, स्टील और एल्युमीनियम सेक्टर में सप्लाई चेन टूट रही है और लागत तेजी से बढ़ रही है
युद्ध का असर: संकट में कपड़ा से लेकर शराब बनाने वाली कंपनियां, सप्लाई चेन टूटी, लागत बढ़ी

पश्चिम एशिया में जारी युद्ध का असर अब धीरे-धीरे भारत के उद्योगों पर साफ दिखने लगा है। पहले जहां यह संकट सिर्फ कच्चे तेल और ईंधन तक सीमित माना जा रहा था, वहीं अब इस्पात, एल्युमीनियम, कपड़ा, रसायन और शराब जैसे कई बड़े सेक्टर इसकी चपेट में आ चुके हैं। कंपनियां बढ़ती लागत, गैस की कमी, देरी से पहुंच रहे कच्चे माल और फंसी हुई खेपों के कारण उत्पादन और सप्लाई में दिक्कतें झेल रही हैं।

होर्मुज स्ट्रेट का बंद होना बना सबसे बड़ा कारण

इस पूरे संकट की सबसे बड़ी वजह होर्मुज स्ट्रेट में पैदा हुई रुकावट है, जो दुनिया के सबसे अहम ऊर्जा और व्यापार मार्गों में से एक है। इस मार्ग के प्रभावित होने से अंतरराष्ट्रीय शिपिंग बुरी तरह प्रभावित हुई है। कई कार्गो रास्ते में फंस गए हैं, जिससे कच्चे माल की सप्लाई में देरी हो रही है और कंपनियों की लागत लगातार बढ़ती जा रही है।

कपड़ा उद्योग में उत्पादन रुकने का खतरा

कपड़ा उद्योग पर इस संकट का असर सबसे तेज दिख रहा है। द इंडियन एक्सप्रेस ने एक प्रमुख टेक्सटाइल कंपनी के हवाले से बताया है कि कंपनी के पास केवल लगभग 30 दिन का कच्चा माल बचा है। यूरोप से आने वाली फ्लैक्स की खेप कई दिनों से यूएई के पोर्ट पर फंसी हुई है। अगर अगले कुछ दिनों में सप्लाई नहीं पहुंचती, तो उत्पादन पूरी तरह बंद होने की स्थिति बन सकती है, जिससे बाजार में कपड़ों की उपलब्धता पर असर पड़ सकता है।

केमिकल सेक्टर में ‘रॉ मटेरियल शॉक’

विशेषज्ञों का कहना है कि यह सिर्फ तेल संकट नहीं, बल्कि कच्चे माल का बड़ा झटका है। पश्चिम एशिया से आने वाले सल्फर की सप्लाई प्रभावित होने से इसकी कीमतों में भारी उछाल आया है। इससे सल्फ्यूरिक और फॉस्फोरिक एसिड महंगे हो रहे हैं, जिसका असर उर्वरकों की कीमतों पर पड़ रहा है। यह स्थिति किसानों के लिए चिंता का विषय बन सकती है, खासकर खरीफ सीजन से पहले।

एल्युमीनियम और स्टील सेक्टर में उत्पादन पर असर

द इंडियन एक्सप्रेस की खबर के मुताबिक गैस की कमी के कारण एल्युमीनियम उद्योग को भी बड़ा झटका लगा है। कई कंपनियों ने एक्सट्रूडेड एल्युमीनियम का उत्पादन रोक दिया है। इस सेक्टर में काम करने वाली ज्यादातर कंपनियां MSME हैं, जिनके सामने अब वित्तीय दबाव बढ़ रहा है। यदि स्थिति जल्द नहीं सुधरी, तो कई छोटे उद्योग बंद होने की कगार पर पहुंच सकते हैं।

शराब और पैकेजिंग इंडस्ट्री पर बढ़ा दबाव

शराब बनाने वाली कंपनियों पर भी इस संकट का असर साफ दिख रहा है। कांच की बोतलों, पैकेजिंग सामग्री और लॉजिस्टिक्स की लागत में भारी बढ़ोतरी हुई है। इसके चलते कंपनियों की कुल लागत में 12 से 15 प्रतिशत तक का इजाफा हो चुका है। आने वाले गर्मी के मौसम में बियर की सप्लाई प्रभावित होने की आशंका जताई जा रही है।

गैस की कमी से कई यूनिट्स पर संकट

LPG और PNG की कमी ने कई उद्योगों के लिए नई परेशानी खड़ी कर दी है। खासकर कांच और मेटल सेक्टर में गैस पर निर्भर यूनिट्स को उत्पादन घटाना पड़ रहा है। कुछ जगहों पर आंशिक या पूरी तरह से उत्पादन बंद करने की नौबत आ चुकी है, जिससे आने वाले समय में सप्लाई और भी प्रभावित हो सकती है।

रुपया कमजोर, आयात और महंगा

युद्ध के चलते भारतीय रुपया डॉलर के मुकाबले कमजोर हुआ है, जिससे आयात की लागत और बढ़ गई है। इसका सीधा असर कंपनियों के मार्जिन पर पड़ रहा है और उत्पादन लागत में लगातार इजाफा हो रहा है।

आगे क्या? महंगाई बढ़ने के संकेत

विशेषज्ञों का मानना है कि अगर पश्चिम एशिया का यह संकट लंबा चलता है, तो इसका असर आम उपभोक्ताओं तक पहुंचेगा। उत्पादन लागत बढ़ने से कंपनियां कीमतें बढ़ा सकती हैं, जिससे बाजार में महंगाई बढ़ने की आशंका है। आने वाले महीनों में रोजमर्रा की कई चीजें महंगी हो सकती हैं।

Drigraj Madheshia

लेखक के बारे में

Drigraj Madheshia

दृगराज मद्धेशिया पिछले 21 वर्षों से पत्रकारिता जगत का एक विश्वसनीय चेहरा हैं। वर्तमान में 'लाइव हिन्दुस्तान' की बिजनेस टीम के एक महत्वपूर्ण सदस्य के रूप में, वे शेयर बाजार, कमोडिटी, पर्सनल फाइनेंस और यूटिलिटी सेक्टर पर अपनी गहरी पकड़ रखते हैं। वह कलम से बाजार की नब्ज टटोलने वाले एक पत्रकार हैं, जो शेयर बाजार से लेकर आपकी जेब (Personal Finance) तक, हर खबर को आसान बनाते हैं। टीवी, प्रिंट और डिजिटल मीडिया के अपने विस्तृत अनुभव के साथ, दृगराज जटिल मार्केट डेटा को आम पाठकों के लिए 'कुछ अलग' और आसान भाषा में पेश करने के लिए पहचाने जाते हैं। उन्होंने अपने करियर में हिन्दुस्तान, सहारा समय, दैनिक जागरण और न्यूज नेशन जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में अपनी सेवाएं दी हैं। मूलत: उत्तर प्रदेश के कुशीनगर जिले के रहने वाले दृगराज मैथ्स बैकग्राउंड होने के कारण डेटा और कैलकुलेशन में माहिर हैं, जो बिजनेस पत्रकारिता के लिए एक बड़ा प्लस पॉइंट है। उन्होंने कॅरियर की शुरुआत गोरखपुर से सहारा समय साप्ताहिक से बतौर फ्रीलांसर की और बहुत ही जल्द सहारा समय उत्तर प्रदेश/उत्तराखंड के हिस्सा बन गए। ​इसके बाद छत्तीसगढ़ में वॉच न्यूज से जुड़े। टीवी को छोड़ हिन्दुस्तान अखबार के बरेली एडिशन की लॉन्चिंग टीम का हिस्सा बने। साढ़े सात साल की मैराथन पारी के बाद अगला पड़ाव न्यूज नेशन डिजिटल रहा। इसके बाद एक बार फिर हिन्दुस्तान दिल्ली से जुड़े और अब डिजिटल टीम का हिस्सा हैं। और पढ़ें

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