RSS से जुड़े भारतीय मजदूर संघ की मांग, 'EPF सैलरी लिमिट हो ₹42,000', किसको होगा फायदा?
मुख्य बातें
- अगर किसी व्यक्ति की सैलरी 21,000 रुपये महीना तक है तो उसे ESI का फायदा मिलता है, लेकिन सैलरी 22,000 रुपये होते ही वह अचानक बंद हो जाता है, जबकि आमदनी में कोई बड़ा फर्क नहीं पड़ा है

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यानी RSS से जुड़े भारतीय मजदूर संघ (BMS) ने मांग की है कि अनिवार्य कर्मचारी भविष्य निधि (EPF) की सैलरी लिमिट दोगुनी कर दी जाए। संघ का कहना है कि मौजूदा लिमिट बढ़ती मजदूरी और बदलते कामकाजी हालात के हिसाब से नहीं है। इस ट्रेड यूनियन ने कर्मचारी राज्य बीमा (ESI) और वैधानिक बोनस की पात्रता सीमा बढ़ाने की भी मांग की है।
BMS में वित्त क्षेत्र के प्रभारी गिरीश आर्य ने द इकनॉमिक टाइम्स को बताया, “यह मुद्दा बातचीत और जनता को लामबंद करने, दोनों तरीकों से उठाया जा रहा है। 17 अगस्त को हमने अलग-अलग लेबर इश्यूज पर देशव्यापी आंदोलन किया और प्रधानमंत्री को ज्ञापन सौंपा है।”
BMS ने कहा कि उसे भरोसा दिलाया गया है कि इस मुद्दे पर विचार किया जाएगा, लेकिन अब तक कोई ठोस नीतिगत फैसला नहीं आया है। यह मांग ऐसे समय आई है, जब राज्यों में न्यूनतम मजदूरी में संशोधन हुआ है और सरकार रोजगार को औपचारिक दायरे में लाने की कोशिशें तेज कर रही है।
इस मांग के पीछे BMS का क्या है तर्क
BMS का तर्क है कि जब किसी कर्मचारी की सैलरी EPF और ESI की सीमा से ऊपर चली जाती है, तो उसका कवरेज छूट जाता है, लेकिन बढ़ती महंगाई को देखते हुए उसे ये फायदे अब भी जरूरी हैं।
लिमिट दोगुनी करने से किसको होगा फायदा
BMS के संगठन सचिव बी. सुरेंद्रन ने बताया, ‘जैसे, अगर किसी व्यक्ति की सैलरी 21,000 रुपये महीना तक है तो उसे ESI का फायदा मिलता है, लेकिन सैलरी 22,000 रुपये होते ही वह अचानक बंद हो जाता है, जबकि आमदनी में कोई बड़ा फर्क नहीं पड़ा है। इसलिए हम मांग कर रहे हैं कि ESI कवरेज की सीमा दोगुनी करके 42,000 रुपये प्रति महीना कर दी जाए।’
उन्होंने आगे कहा, "कई मामलों में राज्य सरकारें राज्य स्तर पर ऐसा कर रही हैं, लेकिन जब कर्मचारी की आर्थिक जरूरतें बढ़ रही हैं, तो उसकी सामाजिक सुरक्षा के लिए केंद्र सरकार की नीति जरूरी है।” बता दें ESIC स्कीम के तहत पात्र कर्मचारियों और उनके परिवार के सदस्यों को निर्धारित नियमों के मुताबिक मेडिकल सुविधाएं मिलती हैं।
10 साल पहले तय हुई थी लिमिट
यूनियन ने कहा कि EPF की मौजूदा सीमा दस साल से भी ज्यादा पहले तय हुई थी, जब मजदूरी और जीवन-यापन की लागत काफी कम थी। तब से राज्य सरकारों ने बदलती आर्थिक हालत और बढ़ती महंगाई को देखते हुए न्यूनतम मजदूरी में लगातार संशोधन किया है।


