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क्रेडिट कार्ड के पीछे सिग्नेचर स्ट्रिप, नंबरों के बीच स्पेस के क्या हैं मायने, समझें

  • अगर आप क्रेडिट कार्ड का इस्तेमाल करते हैं और आपके भी दिमाग में कभी यह सवाल आया है तो चलिए समझते हैं इसकी वजह। साथ ही जानते हैं कि क्यों क्रेडिट/डेबिट कार्ड नंबर्स के बीच कंपनियां हर चार अंक के बाद स्पेस देती हैं।

Puneet Parashar नई दिल्ली, हिन्दुस्तान संवाददाताWed, 12 June 2024 08:35 PM
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अगर आप भी क्रेडिट कार्ड का इस्तेमाल करते हैं तो आपने शायद गौर किया हो कि कुछ कार्ड्स के पीछे एक छोटी सी स्ट्रिप होती है जिसके पास लिखा होता है- Authorized signature, Not valid unless signed. कुछ कार्ड्स पर इसकी जगह- Show ID लिखा रहता है। पहले लगभग हर कार्ड पर यह स्ट्रिप दी जाती थी, लेकिन अब वक्त के साथ नए क्रेडिट कार्ड्स में यह स्ट्रिप गायब होती जा रही है। वक्त के साथ बैंकों और क्रेडिट कार्ड कंपनियों ने यह स्ट्रिप देना बंद कर दिया है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि कार्ड्स के पीछे यह सिग्नेचर स्ट्रिप क्यों दिए जाते थे और इसका क्या उपयोग होता था? अगर आप क्रेडिट कार्ड का इस्तेमाल करते हैं और आपके भी दिमाग में कभी यह सवाल आया है तो चलिए समझते हैं इसकी वजह। साथ ही जानते हैं कि क्यों क्रेडिट/डेबिट कार्ड नंबर्स के बीच कंपनियां हर चार अंक के बाद स्पेस देती हैं।

क्यों होता था कार्ड के पीछे सिग्नेचर स्ट्रिप?

दरअसल, पहले बैंक और क्रेडिट कार्ड कंपनियां हर ट्रांजेक्शन को ग्राहक के साइन के साथ वैरिफाई किया करती थीं। इससे जहां एक तरफ कार्ड के इस्तेमाल से ट्रांजेक्शन टाइम घट जाता था, वहीं दूसरी तरफ सिग्नेचर की वजह से डबल वेरिफिकेशन हो जाता था। लेकिन वक्त के साथ इसमें कई सारी खामियां सामने आने लगीं जिसके बाद पिन और चिप वाली सुविधा को इंट्रोड्यूस किया गया। क्रेडिट कार्ड के पीछे साइन करने में सबसे बड़ी दिक्कत यह थी कि कार्ड किसी के हाथ लगने पर कस्टमर के साइन की एक ऑरिजनल कॉपी उसके पास होती थी जिसे थोड़ी सी प्रैक्टिस के बाद बड़ी आसानी से कॉपी किया जा सकता था। क्योंकि कार्ड के खोने या मिसप्लेस होने की गुंजाइस हमेशा बनी रहती थी, लिहाजा यह सुरक्षित नहीं होता था।

वक्त के साथ खत्म होने लगी इसकी जरूरत

जब सिग्नेचर की जगह पिन नंबर इस्तेमाल होने लगा और चिप वाली सुविधाएं लाई गईं तो इससे सिक्योरिटी का लेवल कई गुना बढ़ गया। क्योंकि जहां ग्राहक के द्वारा कार्ड पर सेट किया गया पिन पता करना आसान नहीं था, वहीं दूसरी तरफ कार्ड में दी गई चिप के जरिए एक ऐसा सेफ्टी कोड जेनरेट किया जाता था जो हर बार अलग होता था। 

इस तरह वक्त के साथ कार्ड पर सिग्नेचर का वैरिफिकेशन के लिए इस्तेमाल कम होता चला गया और धीरे-धीरे कार्ड कंपनियों ने क्रेडिट और डेबिट कार्ड्स के पीछे साइन करने के लिए स्ट्रिप देना बंद कर दिया। लेकिन कुछ कंपनियां अभी भी कार्ड के पीछे सिग्नेचर के लिए छोटी सी स्ट्रिप देती हैं। इसके अलावा भी प्लास्टिक मनी (क्रेडिट और डेबिट कार्ड्स) के बारे में एक चीज ऐसी है, जिसे लेकर कई लोग सोच में पड़ जाते हैं।

क्रेडिट कार्ड के बारे में कभी सोची यह बात?

क्या कभी आपके भी दिमाग में आया है कि क्रेडिट कार्ड और डेबिट कार्ड पर जो नंबर्स दिए होते हैं उनके बीच गैप क्यों होता है? क्रेडिट कार्ड पर आमतौर पर 16 डिजिट का एक यूनिक नंबर होता है जिसे क्रेडिट/डेबिट कार्ड नंबर कहा जाता है। इन नंबर्स के बीच आमतौर पर हर चार डिजिट के बाद गैप दिया जाता है। नए यूजर्स ऑनलाइन ट्रांजेक्शन के लिए डिटेल्स डालते वक्त कई बार हर चार डिजिट के बाद स्पेस भी एंटरट कर देते हैं। उन्हें लगता है कि शायद यह स्पेस क्रेडिट कार्ड संख्या का हिस्सा है। जबकि ऐसा नहीं है।

क्यों रखा जाता है क्रेडिट कार्ड नंबर में गैप?

कार्ड नंबर्स के बीच गैप रखने के पीछे एकमात्र वजह होती है इस लंबे नंबर को पढ़ने के लिहाज से सुविधाजनक बनाना। क्योंकि 16 डिजिट का नंबर अपने आप में इतना लंबा होता है, कि इसे ऑनलाइन ट्रांजेक्शन के लिए इस्तेमाल करते वक्त हमेशा गलती करने की गुंजाइश बनी रहती है। इसीलिए क्रेडिट कार्ड कंपनियों और बैंकों ने कार्ड डिजिट के बीच में स्पेस रखने का फैसला किया। इससे ना सिर्फ गलती की संभावना घट जाती है, बल्कि इस नंबर को पढ़ना आसान भी हो जाता है। क्रेडिट कार्ड का इस्तेमाल अगर समझदारी के साथ किया जाए तो इससे आपको ढेर सारे रिवॉर्ड पॉइंट और फायदे मिलते हैं। लेकिन अगर जानकारी अधूरी हो तो छोटी सी गलती के लिए आपको कई तरह के चार्जेज देने पड़ सकते हैं। इसलिए हमेशा अपने क्रेडिट कार्ड का चुनाव और इस्तेमाल समझदारी के साथ करें।

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