एथेनॉल पर बनेगा खाना, LPG की होगी छुट्टी! 'सरकार जल्द लाएगी सब्सिडी स्कीम'
मुख्य बातें
- एथेनॉल को खाना पकाने के ईंधन के रूप में बढ़ावा देने का एक बड़ा कारण यह है कि भारत में इसकी भरमार है
- देश की एथेनॉल उत्पादन क्षमता सालाना 20 अरब लीटर से अधिक हो गई है और इस वित्त वर्ष में इसमें 4 अरब लीटर और जुड़ने वाला है

एथेनॉल वाले पेट्रोल से कथित रूप से गाड़ियों के इंजन खराब होने की खबरों के बीच एक बड़ी खबर सामने आ रही है। आने वाले दिनों में एथेनॉल आपके किचन में एंट्री कर सकता है। खाना LPG या PNG की जगह एथेनॉल वाले चूल्हे पर पकता नजर आ सकता है। इसके लिए पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय जल्द ही एक नई नीति लाने जा रहा है, जिसमें एथेनॉल को खाना पकाने वाला मुख्य ईंधन बनाया जाएगा।
द इकनॉमिक टाइम्स ने यह जानकारी उद्योग जगत से जुड़े अधिकारियों के हवाले से दी है। इस नीति के तहत एथेनॉल को बढ़ावा देने के लिए सब्सिडी देने की शर्तों और सप्लाई चेन को मजबूत करने पर विशेष ध्यान दिया जाएगा।
एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि यह नीति एलपीजी के साथ-साथ घरेलू खाना पकाने में एथेनॉल को अपनाने में मदद करेगी। उम्मीद है कि यह नीति सितंबर तक तैयार हो सकती है। इस बारे में मंत्रालय से कोई जवाब नहीं मिला है।
2 लाख करोड़ रुपये की हो सकती है बचत
फरवरी में जारी 'इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर सस्टेनेबल डेवलपमेंट' की रिपोर्ट 'इंडियाज क्लीन कुकिंग शिफ्ट' के अनुसार, ई-कुकिंग और बायोगैस की ओर रुख करने से भारत को 2050 तक एलपीजी सब्सिडी में 2 लाख करोड़ रुपये (24 अरब डॉलर) से अधिक की बचत हो सकती है।
क्यों जरूरी है एथेनॉल का यह कदम?
एथेनॉल पर्यावरण के अनुकूल एक ऐसा ईंधन है, जो गन्ना, अनाज और अन्य सुगर वाली फसलों के फर्मेंटेशन से बनता है। इस साल अप्रैल में 'इकनॉमिक टाइम्स' ने खबर दी थी कि सरकार के कहने पर एथेनॉल से चलने वाले चूल्हों (स्टोव) का परीक्षण किया जा रहा है। एथेनॉल को खाना पकाने में इस्तेमाल करने से भारत की एलपीजी पर निर्भरता कम होगी और ईंधन आयात पर होने वाला खर्च भी घटेगा।
उद्योग के एक अन्य अधिकारी के अनुसार, एथेनॉल को बढ़ावा देने के लिए सरकार एक बार का निवेश या फिर लगातार वित्तीय सहायता यानी सब्सिडी दे सकती है।
भारत में एथेनॉल की भरमार
एथेनॉल को खाना पकाने के ईंधन के रूप में बढ़ावा देने का एक बड़ा कारण यह है कि भारत में इसकी भरमार है। देश की एथेनॉल उत्पादन क्षमता सालाना 20 अरब लीटर से अधिक हो गई है और इस वित्त वर्ष में इसमें 4 अरब लीटर और जुड़ने वाला है।
सरकार के E20 ब्लेंडेड (पेट्रोल में 20% एथेनॉल मिलाना) में लगभग 11 अरब लीटर एथेनॉल का उपयोग होता है, जबकि शराब, फार्मास्यूटिकल और रसायन कंपनियां 3 से 3.5 अरब लीटर का उपयोग करती हैं। इस हिसाब से करीब 7 अरब लीटर एथेनॉल बिना इस्तेमाल के बचा रहता है।
पड़ोसी देशों में भी होगा निर्यात
इतनी अधिक मात्रा को देखते हुए भारत पड़ोसी देशों नेपाल, बांग्लादेश और इंडोनेशिया को भी एथेनॉल निर्यात कर सकता है, क्योंकि इन देशों में 10% एथेनॉल मिश्रण का लक्ष्य है, लेकिन उनके पास पर्याप्त कच्चा माल और आसवन क्षमता नहीं है।
कैसे होगी शुरुआत?
ऑयल मार्केटिंग कंपनियां भी एथेनॉल आधारित चूल्हों पर रिसर्च एंड डेवलपमेंट का काम शुरू कर दी हैं। उद्योग अधिकारियों ने बताया कि इस योजना को शुरू करने के लिए तेल कंपनियों को एथेनॉल एटीएम लगाने को कहा जा सकता है, जहां से लोग गैलनों में एथेनॉल खरीद सकें। ये एटीएम तेल कंपनियों के पेट्रोल पंपों पर स्थापित किए जा सकते हैं।
एलपीजी पर निर्भरता कम करने की दिशा में बड़ा कदम
एक उद्योग अधिकारी ने कहा कि पश्चिम एशिया युद्ध ने भारत की एलपीजी सप्लाई को कितना प्रभावित किया, यह हम सभी ने देखा। अतिरिक्त एथेनॉल क्षमता को एलपीजी के विकल्प के रूप में इस्तेमाल करना एक अच्छा विकल्प है, जिससे एलपीजी आयात कम हो सकेगा।
हालांकि पश्चिम एशिया युद्ध के बाद से भारत ने एलपीजी सोर्सिंग में विविधता लाई है, फिर भी देश एलपीजी आयात के लिए खाड़ी देशों पर बहुत निर्भर है, और इसका अधिकांश हिस्सा होर्मुज से होकर गुजरता है। सरकारी तेल कंपनियां ईंधन सुरक्षा बढ़ाने के लिए 30 दिनों की एलपीजी स्ट्रेटजिक रिजर्व स्कीम भी तैयार कर रही हैं।
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Drigraj Madheshiaदृगराज मद्धेशिया पिछले 21 वर्षों से पत्रकारिता जगत का एक विश्वसनीय चेहरा हैं। वर्तमान में 'लाइव हिन्दुस्तान' की बिजनेस टीम के एक महत्वपूर्ण सदस्य के रूप में, वे शेयर बाजार, कमोडिटी, पर्सनल फाइनेंस और यूटिलिटी सेक्टर पर अपनी गहरी पकड़ रखते हैं। वह कलम से बाजार की नब्ज टटोलने वाले एक पत्रकार हैं, जो शेयर बाजार से लेकर आपकी जेब (Personal Finance) तक, हर खबर को आसान बनाते हैं। टीवी, प्रिंट और डिजिटल मीडिया के अपने विस्तृत अनुभव के साथ, दृगराज जटिल मार्केट डेटा को आम पाठकों के लिए 'कुछ अलग' और आसान भाषा में पेश करने के लिए पहचाने जाते हैं। उन्होंने अपने करियर में हिन्दुस्तान, सहारा समय, दैनिक जागरण और न्यूज नेशन जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में अपनी सेवाएं दी हैं। मूलत: उत्तर प्रदेश के कुशीनगर जिले के रहने वाले दृगराज मैथ्स बैकग्राउंड होने के कारण डेटा और कैलकुलेशन में माहिर हैं, जो बिजनेस पत्रकारिता के लिए एक बड़ा प्लस पॉइंट है। उन्होंने कॅरियर की शुरुआत गोरखपुर से सहारा समय साप्ताहिक से बतौर फ्रीलांसर की और बहुत ही जल्द सहारा समय उत्तर प्रदेश/उत्तराखंड के हिस्सा बन गए। इसके बाद छत्तीसगढ़ में वॉच न्यूज से जुड़े। टीवी को छोड़ हिन्दुस्तान अखबार के बरेली एडिशन की लॉन्चिंग टीम का हिस्सा बने। साढ़े सात साल की मैराथन पारी के बाद अगला पड़ाव न्यूज नेशन डिजिटल रहा। इसके बाद एक बार फिर हिन्दुस्तान दिल्ली से जुड़े और अब डिजिटल टीम का हिस्सा हैं। और पढ़ें


