
चिंताजनक: गलत तरीके से पॉलिसी बेचने की शिकायतें 14% बढ़ीं
इरडा की रिपोर्ट के मुताबिक, 2024-25 में अनुचित व्यावसायिक प्रथाओं, जिनमें मिस-सेलिंग प्रमुख है, से जुड़ी शिकायतें बढ़कर 26,667 हो गईं। पिछले वित्त वर्ष 2023-24 में यह संख्या 23,335 थी।
इंश्योरेंस सेक्टर में गलत तरीके से पॉलिसी बेचने यानी मिस-सेलिंग की समस्या लगातार गहराती जा रही है। बीमा नियामक एवं विकास प्राधिकरण की ताजा वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार, वित्त वर्ष 2024-25 में जीवन बीमा कंपनियों के खिलाफ मिस-सेलिंग से जुड़ी शिकायतों में 14 प्रतिशत से अधिक की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। नियामक ने इसे उपभोक्ता हितों के लिए गंभीर चुनौती बताते हुए बीमा कंपनियों को सख्त कदम उठाने की सलाह दी है।
इरडा का कहना है कि यदि इंश्योरेंस सेक्टर को टिकाऊ विकास की राह पर ले जाना है, तो मिस-सेलिंग पर सख्त लगाम लगाना अनिवार्य है। पारदर्शिता, ग्राहक-हित और जवाबदेही को प्राथमिकता देकर ही बीमा उद्योग में भरोसा बढ़ाया जा सकता है।
वित्त मंत्रालय भी पहले कई बार बैंकों और बीमा कंपनियों को बीमा पॉलिसियों की मिस-सेलिंग को लेकर चेतावनी दे चुका है। मंत्रालय ने इस बात पर जोर दिया है कि कंपनियां कॉरपोरेट गवर्नेंस के सर्वोत्तम मानकों का पालन करें और ग्राहकों के हितों को सर्वोपरि रखें।
शिकायतों में तेज उछाल
इरडा की रिपोर्ट के मुताबिक, 2024-25 में अनुचित व्यावसायिक प्रथाओं, जिनमें मिस-सेलिंग प्रमुख है, से जुड़ी शिकायतें बढ़कर 26,667 हो गईं। पिछले वित्त वर्ष 2023-24 में यह संख्या 23,335 थी।
इस तरह एक साल में इन शिकायतों में लगभग 14.3 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। नियामक का कहना है कि यह वृद्धि दर्शाती है कि बीमा उत्पादों की बिक्री के दौरान पारदर्शिता और ग्राहक-अनुकूल व्यवहार की कमी अब भी एक बड़ी समस्या बनी हुई है।
कुल शिकायतें स्थिर, लेकिन गलत बिक्री चिंता का कारण
रिपोर्ट के अनुसार, जीवन बीमा कंपनियों के खिलाफ दर्ज कुल शिकायतों की संख्या लगभग स्थिर रही। 2023-24 में जहां कुल 1,20,726 शिकायतें दर्ज हुई थीं, वहीं 2024-25 में यह आंकड़ा 1,20,429 रहा।
हालांकि, कुल शिकायतों में खास बदलाव नहीं हुआ, लेकिन मिस-सेलिंग और अनुचित व्यावसायिक प्रथाओं का हिस्सा बढ़कर 22.14 प्रतिशत हो गया, जो पिछले वर्ष 19.33 प्रतिशत था। इससे साफ है कि शिकायतों की प्रकृति अधिक गंभीर होती जा रही है।
गलत तरीके से पॉलिसियां क्यों बेची जा रहीं
इसका मतलब ऐसे बीमा उत्पाद बेचना है, जो ग्राहक की जरूरत के अनुरूप न हों या जिनकी शर्तों, जोखिमों और लाभों की पूरी जानकारी ग्राहक को न दी जाए। कई मामलों में ग्राहकों को निवेश और बीमा का अंतर स्पष्ट रूप से नहीं बताया जाता या लंबे समय के प्रीमियम दायित्वों की सही जानकारी नहीं दी जाती।
विशेषज्ञों के अनुसार, बिक्री लक्ष्य पूरा करने का दबाव, बैंक-बीमा चैनल के जरिए आक्रामक बिक्री और एजेंटों की अपर्याप्त ट्रेनिंग इसके प्रमुख कारण हैं।
इरडा ने बीमा कंपनियों को दिए सख्त निर्देश
इरडा ने अपनी रिपोर्ट में बीमा कंपनियों को सलाह दी है कि वे मिस-सेलिंग की शिकायतों का मूल कारण पता लगाने के लिए नियमित रूप से प्रयास करें। नियामक ने कहा है कि केवल शिकायतों का निपटान पर्याप्त नहीं है, बल्कि यह समझना जरूरी है कि गलत बिक्री हो क्यों रही है। इसके लिए इरडा ने कंपनियों को कुछ अहम कदम उठाने को कहा है, जिनमें शामिल हैं ग्राहक की प्रोफाइल के अनुसार उत्पाद की उपयुक्तता का आकलन, एजेंटों और वितरण चैनलों पर कड़ा नियंत्रण, और मिस-सेलिंग से जुड़ी शिकायतों के लिए स्पष्ट और समयबद्ध कार्ययोजना।
ग्राहकों पर सीधा असर, पॉलिसी चूक बढ़ीं
इसका सबसे बड़ा नुकसान ग्राहकों को होता है। गलत जानकारी के आधार पर खरीदी गई पॉलिसियों में अक्सर प्रीमियम अधिक होता है, जिसे ग्राहक लंबे समय तक नहीं चुका पाते। इसके चलते पॉलिसी लैप्स हो जाती है और ग्राहक का पैसा भी फंस जाता है। इससे बीमा कंपनियों की छवि को भी नुकसान पहुंचता है और पूरे इंश्योरेंस सेक्टर पर भरोसा कमजोर होता है।
बीमा पैठ अब भी वैश्विक औसत से काफी कम
रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि भारत में बीमा पैठ 3.7 प्रतिशत पर स्थिर बनी हुई है, जबकि वैश्विक औसत 7.3 प्रतिशत है। जीवन बीमा पैठ घटकर 2.7 प्रतिशत रह गई है, जो इंश्योरेंस सेक्टर के सामने एक और बड़ी चुनौती है।





