सरकारी बैंकों का बड़ा कदम: 15000 ATM होंगे अपग्रेड, जानें इसमें नया क्या है और किसको होगा फायदा

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मुख्य बातें

  • 15,000 से ज्यादा एटीएम यूनिटों के लिए जल्द ही टेंडर जारी किए जाएंगे
  • इनमें से लगभग 77 फीसदी एटीएम सरकारी बैंकों के हैं
  • कैश रिसाइक्लर वह मशीन है, जो न केवल पैसे निकालती है, बल्कि जमा किए गए नोटों को जमा भी करती है
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सरकारी बैंक अब अपने पुराने एटीएम को जल्द से जल्द बदलने की योजना पर तेजी से काम कर रहे हैं। वे इन जर्जर मशीनों की जगह कैश रिसाइक्लर लगाने जा रहे हैं। यह नोट जमा भी करेगा और निकालेगा भी। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि छोटे शहरों (टियर-2 और टियर-3) में बार-बार कैश खत्म होने की समस्या ने पुरानी तकनीक की कमियों को उजागर कर दिया है।

77 फीसदी एटीएम सरकारी बैंकों के होंगे अपग्रेड?

उद्योग के जानकारों के मुताबिक, करीब 15,000 से ज्यादा एटीएम यूनिटों के लिए जल्द ही टेंडर जारी होंगे। इनमें से लगभग 77 फीसदी एटीएम सरकारी बैंकों के हैं। पंजाब नेशनल बैंक, यूनियन बैंक ऑफ इंडिया और बैंक ऑफ इंडिया जैसे बड़े बैंक भी जल्द ही कैश रिसाइक्लर के लिए टेंडर निकाल सकते हैं।

कैश रिसाइक्लर क्या है और इसके फायदे क्या हैं?

कैश रिसाइक्लर वह मशीन है, जो न केवल पैसे निकालती है, बल्कि जमा किए गए नोटों को जमा भी करती है। इससे बैंक जमा कैश को दोबारा निकासी के लिए इस्तेमाल कर सकते हैं। इसका फायदा यह है कि बार-बार एटीएम में कैश भरने का खर्च कम हो जाता है, मशीन अधिक चालू रहती है और ऑपरेशनल कॉस्ट भी घट जाती है।

सरकारी बैंकों को ज्यादा जल्दी क्यों है?

एक वरिष्ठ सरकारी बैंक अधिकारी (जिन्होंने नाम न छापने की शर्त रखी) ने द इकनॉमिक टाइम्स को बताया कि हाल की कैश किल्लत ने यह साफ कर दिया है कि सरकारी बैंकों को अपने एटीएम ढांचे को आधुनिक बनाने की सख्त जरूरत है। उनके पास अभी भी बड़ी संख्या में पारंपरिक कैश डिस्पेंसर यानी सिर्फ नोट निकालने वाली मशीन हैं, जिन्हें बार-बार भरना पड़ता है।

यह बात और भी अहम है कि सरकारी बैंक अब भी अपने करीब 90,000 ऑन-साइट एटीएम (बैंक शाखाओं के अंदर या पास लगे एटीएम) खुद चलाते हैं। इन्हें अभी तक आउटसोर्स नहीं किया गया है, जिससे ये रुकावटों और कैश मैनेजमेंट की चुनौतियों के प्रति ज्यादा संवेदनशील हैं।

आउटसोर्सिंग की लहर क्यों आ रही है?

उद्योग के जानकारों के मुताबिक, चार बड़ी वजहें हैं जो इस आउटसोर्सिंग को तेज कर रही हैं। पहली, नियामक (RBI) बैंकों को कोर बैंकिंग पर ध्यान देने और गैर-जरूरी कामों के लिए एक्सपर्ट कंपनियों को साथ लेने की सलाह दे रहे हैं। दूसरी, कर्मचारियों की बढ़ती लागत, तीसरी, सख्त नियमों का पालन, और चौथी, तकनीकी निवेश में बढ़ोतरी। इन सबने एटीएम को खुद चलाना कम फायदेमंद बना दिया है।

क्या कहना है एटीएम कंपनियों का?

एक एटीएम कंपनी के वरिष्ठ अधिकारी कहते हैं कि कैश रिसाइक्लर तेजी से पारंपरिक एटीएम की जगह ले रहे हैं। जैसे-जैसे बैंक इस अपग्रेडेशन को तेज कर रहे हैं, इन मशीनों को लगाने, मेंटेन करने और बेहतर बनाने के लिए विशेषज्ञ भागीदारों की मांग लगातार बढ़ रही है।

भारत में एटीएम की बढ़ती संख्या और आउटसोर्सिंग का भविष्य

भारत में एटीएम की कुल संख्या 2018-19 में लगभग 221,000 थी, जो अब बढ़कर करीब 246,000 हो गई है और 2029-30 तक इसके लगभग 275,000 तक पहुंचने का अनुमान है। हालांकि, आउटसोर्स किए गए एटीएम (जिन्हें थार्ड पार्टी कंपनियां चलाती हैं) की संख्या और भी तेजी से बढ़ेगी। सितंबर 2025 में यह संख्या लगभग 120,000 थी, जो 2029-30 तक लगभग 170,000 तक पहुंच सकती है।

Drigraj Madheshia

लेखक के बारे में

Drigraj Madheshia

दृगराज मद्धेशिया पिछले 21 वर्षों से पत्रकारिता जगत का एक विश्वसनीय चेहरा हैं। वर्तमान में 'लाइव हिन्दुस्तान' की बिजनेस टीम के एक महत्वपूर्ण सदस्य के रूप में, वे शेयर बाजार, कमोडिटी, पर्सनल फाइनेंस और यूटिलिटी सेक्टर पर अपनी गहरी पकड़ रखते हैं। वह कलम से बाजार की नब्ज टटोलने वाले एक पत्रकार हैं, जो शेयर बाजार से लेकर आपकी जेब (Personal Finance) तक, हर खबर को आसान बनाते हैं। टीवी, प्रिंट और डिजिटल मीडिया के अपने विस्तृत अनुभव के साथ, दृगराज जटिल मार्केट डेटा को आम पाठकों के लिए 'कुछ अलग' और आसान भाषा में पेश करने के लिए पहचाने जाते हैं। उन्होंने अपने करियर में हिन्दुस्तान, सहारा समय, दैनिक जागरण और न्यूज नेशन जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में अपनी सेवाएं दी हैं। मूलत: उत्तर प्रदेश के कुशीनगर जिले के रहने वाले दृगराज मैथ्स बैकग्राउंड होने के कारण डेटा और कैलकुलेशन में माहिर हैं, जो बिजनेस पत्रकारिता के लिए एक बड़ा प्लस पॉइंट है। उन्होंने कॅरियर की शुरुआत गोरखपुर से सहारा समय साप्ताहिक से बतौर फ्रीलांसर की और बहुत ही जल्द सहारा समय उत्तर प्रदेश/उत्तराखंड के हिस्सा बन गए। ​इसके बाद छत्तीसगढ़ में वॉच न्यूज से जुड़े। टीवी को छोड़ हिन्दुस्तान अखबार के बरेली एडिशन की लॉन्चिंग टीम का हिस्सा बने। साढ़े सात साल की मैराथन पारी के बाद अगला पड़ाव न्यूज नेशन डिजिटल रहा। इसके बाद एक बार फिर हिन्दुस्तान दिल्ली से जुड़े और अब डिजिटल टीम का हिस्सा हैं। और पढ़ें

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