
कमजोर रुपये से इन क्षेत्रों का संकट दूर होगा, लेकिन इनपर पड़ेगा बुरा असर
आरबीआई रुपये की गिरावट थामने के लिए अधिक दखल नहीं देगा। आरबीआई गवर्नर ने भी कहा है कि रुपये की हालिया कमजोरी बाजार की स्वाभाविक चाल का नतीजा है। लगभग 3-3.5 फीसदी की सालाना गिरावट लंबी अवधि के ट्रेंड के हिसाब से ही है।
पिछले कुछ दिनों से अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये में गिरावट आ रहीहै और यह 90 रुपये प्रति डॉलर का मनोवैज्ञानिक स्तर तोड़ चुका है। विशेषज्ञों का कहना है कि रुपये की इस कमजोरी का मिश्रित असर दिखेगा। कुछ क्षेत्रों खासकर श्रम प्रधान निर्यात क्षेत्रों को इसका बड़ा फायदा मिल सकता है। वहीं, कई मोर्चों पर दबाव भी बढ़ेगा। आने वाले दिनों में पेट्रोल, डीजल से लेकर कई वस्तुओं एवं सेवाओं की कीमतें बढ़ सकती हैं।
असली झटका अमेरिकी टैरिफ से
एसबीआई की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका द्वारा भारत पर लगाए गए भारी-भरकम टैरिफ ही रुपये की कमजोरी की सबसे बड़ी वजह हैं। अमेरिका ने अगस्त में भारत के मुख्य निर्यातों पर 50% तक का टैरिफ लगा दिया। चीन, वियतनाम और इंडोनेशिया जैसे देशों पर यह टैरिफ 15-30% ही है।
इसका असर यह हुआ कि इस साल अक्टूबर में भारत का व्यापार घाटा बढ़कर 41.68 अरब डॉलर के रिकॉर्ड उच्च स्तर पर पहुंच गया। जबकि चालू वित्त वर्ष के अप्रैल से अक्तूबर के दौरान व्यापार घाटा 78.14 अरब डॉलर तक पहुंचा था। यानी अक्तूबर के दौरान घाटे में तेजी देखी गई। हालांकि, इस उछाल का मुख्य कारण सोने के आयात में तेज वृद्धि है।
सरकार और आरबीआई के कदम
अमेरिकी शुल्क द्वारा उपजे इसे व्यापार घाटे से उबरने के लिए सरकार और आरबीआई ने अपने स्तर पर कई कदम उठाए हैं। सरकार ने निर्यात को बढ़ाने और प्रभावित हुए क्षेत्रों को राहत देने के लिए कई देशों के साथ व्यापार समझौतों पर बातचीत तेज की है। वहीं, आरबीआई ने रुपये को ‘खास स्तर’ पर बनाए रखने के लिए हाथ खींचे हैं।
इसका मतलब है कि आरबीआई रुपये की गिरावट थामने के लिए अधिक दखल नहीं देगा। आरबीआई गवर्नर ने भी कहा है कि रुपये की हालिया कमजोरी बाजार की स्वाभाविक चाल का नतीजा है। लगभग 3-3.5 फीसदी की सालाना गिरावट लंबी अवधि के ट्रेंड के हिसाब से ही है। गौरतलब है कि रुपये में इस साल 5.3 फीसदी की तेज गिरावट आई है, जो 2022 के बाद सबसे अधिक है।
निर्यातकों को फायदा, आयातक प्रभावित होंगे
विशेषज्ञों का कहना है कि रुपये की इस गिरावट का फायदा भारतीय निर्यात क्षेत्र खासतौर पर आईटी सेक्टर, टेक्सटाइल, इंजीनियरिंग और फार्मा बाजार में देखने को मिलेगा। कमजोर रुपया भारतीय सामान को दुनिया में सस्ता दिखाता है, जिससे निर्यात बढ़ने की संभावना होती है।
डॉलर में कमाई करने वाले इन क्षेत्रों को रुपये की कमजोरी से अधिक लाभ मिलता है। लेकिन इसके उलट, कच्चा तेल, गैस, मशीनरी, रसायन और इलेक्ट्रॉनिक्स जैसी आयातित वस्तुएं महंगी हो जाएंगी। इससे देश में महंगाई का दबाव बढ़ सकता है।
50 देशों के साथ व्यापार वार्ता जारी
भारत वर्तमान में लगभग 50 अलग-अलग देशों और समूहों के साथ व्यापार समझौतों को लेकर सक्रिय रूप से बातचीत कर रहा है। इनमें प्रमुख रूप से अमेरिका और ईयू शामिल हैं। अमेरिका से इस महीने के अंत तक समझौते का ऐलान हो सकता है। वहीं, यूरेशियन आर्थिक संघ (ईएईयू) के साथ आगे की बातचीत चल रही है, जिसमें रूस, आर्मेनिया, बेलारूस, कजाकिस्तान और किर्गिस्तान शामिल हैं।
साथ ही भारत दस सदस्यीय आसियान समूह और दक्षिण कोरिया के साथ मौजूदा व्यापार समझौतों की भी समीक्षा कर रहा है। आसियान के सदस्य देशों में ब्रुनेई, कंबोडिया, इंडोनेशिया, लाओस, मलेशिया, म्यांमार, फिलीपींस, सिंगापुर, थाईलैंड और वियतनाम शामिल है। इसके अलावा सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, कतर, कुवैत, ओमान और बहरीन से मिलकर बनी खाड़ी सहयोग परिषद (जीसीसी) से भी वार्ता चल रही है।
इन क्षेत्रों में राहत संभव
1. इलेक्ट्रॉनिक्स और मोबाइल : भारत ने हाल के वर्षों में मोबाइल और इलेक्ट्रॉनिक्स बड़ा निर्यात किया है।
2. केमिकल्स और फार्मा : इनका निर्यात बढ़ सकता है क्योंकि वैश्विक कीमतों के मुकाबले भारतीय कीमत सस्ती दिखेगी।
3. मशीनरी और ऑटो-पार्ट्स : मशीनरी और इंजीनियरिंग उत्पादों में भी प्रतिस्पर्धा बढ़ सकती है।
इन पर मिश्रित प्रभाव
1. टेक्सटाइल्स और वस्त्र : यह क्षेत्र कीमत के लिहाज से संवेदनशील है लेकिन कमजोर रुपया कुछ हद तक मददगार साबित हो सकता है।
2. हथकरघा/हैंडीक्राफ्ट/ज्वेलरी : कुछ में लाभ होगा लेकिन बहुती सी इकाइयां कच्चे सोने और कच्चे माल के लिए आयात पर निर्भर है इसलिए असर मिश्रित होगा।
कमजोरी से आम लोगों पर असर
- पेट्रोल-डीजल और गैस कीमतें बढ़ सकती हैं।
- विदेश में पढ़ाई, यात्रा और इलाज और महंगा होगा।
- आयातित मोबाइल, लैपटॉप और इलेक्ट्रॉनिक्स का खर्च बढ़ सकता है।
- विदेशी लोन लेने वालों को EMI बढ़ने का जोखिम होगा।
रुपया रिकॉर्ड निचले स्तर से उबरा, 26 पैसे उछला
विदेशी मुद्रा विनिमय बाजार में गुरुवार को रुपया अपनी रिकॉर्ड गिरावट से उबरने में सफल रहा। रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 26 पैसे मजबूत होकर 89.89 रुपये प्रति डॉलर पर बंद हुआ।
रुपये के मूल्य में यह तेजी मुख्य रूप से डॉलर सूचकांक में नरमी और भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के मुद्रा बाजार में संभावित हस्तक्षेप की वजह से आई। विदेशी मुद्रा कारोबारियों ने कहा कि अमेरिका में गैर-कृषि रोजगार के आंकड़े अनु्मान से कम रहने से डॉलर में नरमी आई और इसने रुपये को निचले स्तर पर समर्थन दिया।
रुपये पर दबाव के कारण
अंतरबैंक विदेशी मुद्रा विनिमय बाजार में रुपया कमजोर खुला था और शुरुआती कारोबार में फिसलकर 90.43 के नए सर्वकालिक निचले स्तर तक पहुंच गया। विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) की बिकवाली, कच्चे तेल की ऊंची कीमतें और भारत-अमेरिका व्यापार समझौते की घोषणा में देरी से रुपये पर दबाव रहा।
हालांकि, बाद में रुपये की स्थिति संभली और अंत में यह 89.89 रुपये प्रति डॉलर के भाव पर बंद हुआ। इस तरह पिछले कारोबारी सत्र के मुकाबले रुपये में 26 पैसे की मजबूती रही। बुधवार को रुपया पहली बार 90 के स्तर के ऊपर चला गया था और 90.15 रुपये प्रति डॉलर पर बंद हुआ था। यह इसका अब तक सर्वकालिक निचला बंद स्तर है।
इस बीच, दुनिया की प्रमुख मुद्राओं के मुकाबले डॉलर की मजबूती दर्शाने वाला डॉलर सूचकांक 0.01 प्रतिशत की मामूली गिरावट के साथ 98.84 पर आ गया। वैश्विक तेल मानक ब्रेंट क्रूड वायदा कारोबार में 0.22 प्रतिशत की तेजी के साथ 62.81 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया।





