बेसिक सैलरी में डीए मर्ज… 8वें वेतन आयोग से केंद्रीय कर्मचारियों को तोहफा?

Deepak Kumar लाइव हिन्दुस्तान
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मुख्य बातें

  • कर्मचारी संगठन चाहते हैं कि महंगाई भत्ता यानी DA को बेसिक सैलरी में ही मिला दिया जाए
  • संगठनों के मुताबिक यह इसलिए जरूरी है क्योंकि सैलरी के कई हिस्से बेसिक सैलरी से जुड़े होते हैं, जिनमें मकान किराया भत्ता (HRA), परिवहन भत्ता, पेंशन और इंक्रीमेंट आदि शामिल होता है
बेसिक सैलरी में डीए मर्ज… 8वें वेतन आयोग से केंद्रीय कर्मचारियों को तोहफा?

8th Pay Commission latest: केंद्र सरकार के कर्मचारियों को आठवें वेतन आयोग की सिफारिशों का इंतजार है। वेतन आयोग सिफारिशों को तैयार करने के लिए केंद्रीय कर्मचारियों के अलग-अलग संगठनों के साथ बैठकों का दौर शुरू कर चुका है। कर्मचारी संगठन चाहते हैं कि महंगाई भत्ता यानी DA को बेसिक सैलरी में ही मिला दिया जाए। अब सवाल है कि आखिर ये मांग क्यों की जा रही है? आइए इसे समझने की कोशिश करते हैं।

क्या हैं इसके मायने?

DA को बेसिक सैलरी में मिलाने की मांग का मतलब है कि केंद्रीय कर्मचारियों के संगठन ये चाहते हैं कि मौजूदा DA को बेसिक सैलरी में ही शामिल कर लिया जाए। संगठनों के मुताबिक यह इसलिए जरूरी है क्योंकि सैलरी के कई हिस्से बेसिक सैलरी से जुड़े होते हैं, जिनमें मकान किराया भत्ता (HRA), परिवहन भत्ता, पेंशन और इंक्रीमेंट शामिल होता है। इसलिए, एक बार जब DA बेसिक सैलरी का हिस्सा बन जाता है तो सैलरी का पूरा स्ट्रक्चर काफी बढ़ जाता है। आसान शब्दों में कहें तो कर्मचारियों का कहना है कि महंगाई कई सालों से ज्यादा बनी हुई है और DA इतना बढ़ गया है कि अब इसे सैलरी का एक अलग हिस्सा नहीं रहना चाहिए।

इस मांग के पीछे मुख्य वजह रहने-सहने के खर्च में आई भारी बढ़ोतरी है। ऑल इंडिया NPS एम्प्लॉइज फेडरेशन द्वारा 8वें वेतन आयोग को सौंपे गए ज्ञापन के मुताबिक 31 दिसंबर 2025 तक DA लगभग 58% तक पहुंच गया था। फेडरेशन ने यह तर्क दिया कि DA का इतना ऊंचा स्तर खुद यह दिखाता है कि पिछले कुछ सालों में घर-परिवार के खर्च और महंगाई कितनी बढ़ गई है। फेडरेशन ने अपने ज्ञापन में कहा कि महंगाई भत्ता साफ तौर पर यह दिखाता है कि रहने-सहने का खर्च काफी बढ़ गया है और लोगों की खरीदने की ताकत कम हो गई है।

फैमिली यूनिट पर क्या है मांग?

फेडरेशन के अनुसार, 7वें वेतन आयोग के तहत मौजूदा न्यूनतम बेसिक सैलरी 18,000 रुपये पुरानी मान्यताओं और तीन-सदस्यीय फैमिली यूनिट मॉडल पर आधारित था। फेडरेशन ने फैमिली यूनिट स्ट्रक्चर को संशोधित करके 5 इकाइयों में बदलने और उसी के अनुसार न्यूनतम वेतन की फिर से गणना करने का प्रस्ताव दिया है।

इसके सुझाए गए फॉर्मूले के तहत: 6000 रुपये x 5 फैमिली यूनिट = 30,000 रुपये। इसके बाद फेडरेशन ने इस संशोधित राशि में मौजूदा डीए यानी 60% को जोड़ने का प्रस्ताव दिया, जिससे यह आंकड़ा बढ़कर लगभग 47,400 रुपये हो गया। बेहतर पोषण और उपभोग खर्चों को ध्यान में रखते हुए कर्मचारी संगठन ने तर्क दिया कि निर्धारित न्यूनतम सैलरी 55,000 रुपये से 60,000 रुपये के बीच होना चाहिए।

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हिन्दुस्तान डिजिटल में करीब 5 साल से कार्यरत दीपक कुमार यहां बिजनेस की खबरें लिखते हैं। दीपक को स्टॉक मार्केट, पर्सनल फाइनेंस के अलावा बिजनेस से जुड़े तमाम विषयों की गहरी समझ है। वह जटिल आर्थिक और कारोबारी मुद्दों को सरल, संतुलित और आम बोलचाल की भाषा में पाठकों तक पहुंचाना बखूबी जानते हैं। उनकी बिजनेस सेक्शन के अलावा एंटरटेनमेंट, स्पोर्ट्स और पॉलिटिक्स से जुड़ी खबरों पर भी मजबूत पकड़ है। दीपक को उनके बेहतरीन काम के लिए विभिन्न स्तरों पर सम्मानित भी किया जा चुका है। मूल रूप से बिहार के सीवान जिले से ताल्लुक रखने वाले दीपक के पास पत्रकारिता का करीब 13 साल का अनुभव है। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत अमर उजाला से की। इसके बाद दैनिक भास्कर, आजतक और इंडियन एक्सप्रेस ग्रुप जैसे प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में भी काम किया। इसका अगला पड़ाव हिन्दुस्तान डिजिटल था, जहां वह वर्तमान में असिस्टेंट न्यूज एडिटर के रूप में कार्यरत हैं। दीपक ने दिल्ली यूनिवर्सिटी से मास कम्युनिकेशन में ग्रेजुएशन की पढ़ाई की जबकि हिमाचल प्रदेश सेंट्रल यूनिवर्सिटी से पोस्ट ग्रेजुएट हुए हैं। जहां एक तरफ वह सोशल मीडिया पर सक्रिय हैं तो वहीं नई तकनीकों से खुद को अपडेट रखते हैं। खाली समय में फिल्में देखना, खाना बनाना और क्रिकेट खेलना पसंद है।

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