भारत के घरों और मंदिरों में 35000 टन सोना! इसके पीछे क्यों पड़ी है मोदी सरकार?
मुख्य बातें
- सरकार चाहती है कि हम बाहर से सोना मंगाने के बजाय अपने घर में रखे सोने को पिघलाकर काम में लाएं
- इससे देश का पैसा देश में ही रहेगा और हमें दूसरों पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा
- यही वजह है कि सरकार 'गोल्ड मोनेटाइजेशन स्कीम' जैसी योजनाएं चला रही है और लोगों को समझा रही है

एक अनुमान के मुताबिक भारतीय परिवारों और मंदिरों के पास करीब 30 से 35 हजार टन सोना रखा हुआ है। इसकी कीमत करीब 3.8 ट्रिलियन डॉलर यानी अरबों रुपये बैठती है। हैरानी की बात यह है कि इस सोने का एक बड़ा हिस्सा सालों तक बिना किसी काम के लॉकर और अलमारियों में धूल फांकता रहता है।
इन्हीं को निकालने के लिए प्रधानमंत्री मोदी ने हाल ही में लोगों से एक खास अपील की थी। उन्होंने कहा है कि हमें अपने पुराने और बेकार पड़े सोने को दोबारा इस्तेमाल में लाना चाहिए, बजाय इसके कि हम हर बार बाहर से नया सोना मंगवाएं। उनके कहने का मतलब साफ है कि पहले उस सोने को काम में लाओ जो हमारे पास पहले से मौजूद है। सुनने में यह बात छोटी लगती है, लेकिन इसके पीछे का गणित बहुत बड़ा है।
गोल्ड रीसाइक्लिंग क्या है
अब सवाल यह है कि आखिर यह गोल्ड रीसाइक्लिंग है क्या? इसे ऐसे समझिए कि यह बिल्कुल वैसी ही प्रक्रिया है जैसे पुराने अखबारों को इकट्ठा करके उन्हें फिर से नए कागज में बदल दिया जाए। पुराने, टूटे-फूटे गहने, सिक्के, या फोन-कंप्यूटर जैसी चीजों से निकला सोना, इन सबको पिघलाकर एकदम शुद्ध 24 कैरेट सोना बना लिया जाता है।
इस शुद्ध सोने से दोबारा नए डिजाइन के गहने या सोने की ईंटें तैयार की जा सकती हैं। यह तरीका पर्यावरण के लिए भी अच्छा है, क्योंकि जमीन खोदकर नया सोना निकालने में बहुत मेहनत और ऊर्जा लगती है।
मोदी सरकार इसके पीछे क्यों पड़ी है?
दरअसल, इसके पीछे देश की जेब पर पड़ने वाले बोझ की बड़ी वजह है। भारत अपनी जरूरत का ज्यादातर सोना दूसरे देशों से खरीदता है। पिछले साल ही हमने सोना खरीदने के लिए करीब 72 अरब डॉलर यानी लाखों करोड़ रुपये विदेश भेज दिए। जब हम इतना सारा पैसा बाहर भेजते हैं, तो इसका सीधा असर देश की आर्थिक सेहत पर पड़ता है।
सरकार चाहती है कि हम बाहर से सोना मंगाने के बजाय अपने घर में रखे सोने को पिघलाकर काम में लाएं। इससे देश का पैसा देश में ही रहेगा और हमें दूसरों पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा। यही वजह है कि सरकार 'गोल्ड मोनेटाइजेशन स्कीम' जैसी योजनाएं चला रही है और लोगों को समझा रही है।
एक फीसदी का कमाल: हर साल लाखों करोड़ रुपये का आयात बिल घट जाएगा
इस पूरी कहानी का सबसे दिलचस्प हिस्सा यह है कि हमें बहुत बड़ा बदलाव करने की जरूरत नहीं है। अगर हर साल भारत के घरों और मंदिरों में पड़े कुल सोने का सिर्फ 1 फीसदी हिस्सा भी रीसाइकिल कर लिया जाए, तो विदेशों से आने वाले सोने की मात्रा 25 से 30 फीसदी तक कम हो सकती है। इसका मतलब है कि हर साल लाखों करोड़ रुपये का आयात बिल घट जाएगा और देश की अर्थव्यवस्था को बहुत मजबूती मिलेगी।
आखिर इतना सोना बेकार क्यों पड़ा रहता है?
इसके पीछे हमारी परंपरा और सोच दोनों जुड़ी हैं। हम सोने को मुसीबत का साथी मानते हैं। दादी-नानी के जमाने से सोना इकट्ठा करने की आदत रही है। इसे बेचना अच्छा नहीं माना जाता, इसलिए पुराने और अनुपयोगी गहने सालों तक संदूक में बंद रहते हैं, लेकिन अब समय बदल रहा है। जब सोने के दाम रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंच गए हैं, तो लोगों को एहसास हो रहा है कि तिजोरी में पड़ा यह पुराना सोना उनके किसी बड़े सपने को पूरा कर सकता है।
अब लोगों की सोच में आ रहा है बदलाव
बाजार में अब कई सुनार और बड़ी कंपनियां पुराने गहनों को नए डिज़ाइन से बदलने की सुविधा दे रही हैं। पहले जहां पुराने गहने तुड़वाने पर भारी कटौती कर ली जाती थी, वहीं अब कई जगह बिना कटौती के नए गहने देने के ऑफर मिल रहे हैं।
ऊंची कीमतों और इन आसान सुविधाओं की वजह से अब आम आदमी भी अपने बेकार पड़े सोने को नकदी या नए गहनों में बदलने के लिए आगे आ रहा है। यह बदलाव छोटा ज़रूर है, लेकिन अगर हर परिवार अपने बेकार सोने को दोबारा बाजार में ले आए, तो यह पूरे देश के लिए बहुत बड़ी ताकत बन सकता है।
लेखक के बारे में
Drigraj Madheshiaदृगराज मद्धेशिया पिछले 21 वर्षों से पत्रकारिता जगत का एक विश्वसनीय चेहरा हैं। वर्तमान में 'लाइव हिन्दुस्तान' की बिजनेस टीम के एक महत्वपूर्ण सदस्य के रूप में, वे शेयर बाजार, कमोडिटी, पर्सनल फाइनेंस और यूटिलिटी सेक्टर पर अपनी गहरी पकड़ रखते हैं। वह कलम से बाजार की नब्ज टटोलने वाले एक पत्रकार हैं, जो शेयर बाजार से लेकर आपकी जेब (Personal Finance) तक, हर खबर को आसान बनाते हैं। टीवी, प्रिंट और डिजिटल मीडिया के अपने विस्तृत अनुभव के साथ, दृगराज जटिल मार्केट डेटा को आम पाठकों के लिए 'कुछ अलग' और आसान भाषा में पेश करने के लिए पहचाने जाते हैं। उन्होंने अपने करियर में हिन्दुस्तान, सहारा समय, दैनिक जागरण और न्यूज नेशन जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में अपनी सेवाएं दी हैं। मूलत: उत्तर प्रदेश के कुशीनगर जिले के रहने वाले दृगराज मैथ्स बैकग्राउंड होने के कारण डेटा और कैलकुलेशन में माहिर हैं, जो बिजनेस पत्रकारिता के लिए एक बड़ा प्लस पॉइंट है। उन्होंने कॅरियर की शुरुआत गोरखपुर से सहारा समय साप्ताहिक से बतौर फ्रीलांसर की और बहुत ही जल्द सहारा समय उत्तर प्रदेश/उत्तराखंड के हिस्सा बन गए। इसके बाद छत्तीसगढ़ में वॉच न्यूज से जुड़े। टीवी को छोड़ हिन्दुस्तान अखबार के बरेली एडिशन की लॉन्चिंग टीम का हिस्सा बने। साढ़े सात साल की मैराथन पारी के बाद अगला पड़ाव न्यूज नेशन डिजिटल रहा। इसके बाद एक बार फिर हिन्दुस्तान दिल्ली से जुड़े और अब डिजिटल टीम का हिस्सा हैं। और पढ़ें


