26 साल की सिगरेट की लत 6 मिनट में छूटी, कैसे?

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How To Quit Smoking: सुनने में यह भले ही चमत्कार लगे या फिर कोरा झूठ, लेकिन यह सोलह आने सच है। सिगरेट से छुटकारा पाने वाला शख्स कोई और नहीं बल्कि मैं हूं।यह ऐसी सक्सेस है, जो हमारे पाठकों तक न पहुंचे तो मेरी सफलता व्यक्तिगत रह जाएगी।

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एक फूंक से शुरू हुई कहानी 15 सिगरेट तक पहुंची और कैसे खत्म हुई

26 साल की सिगरेट की लत महज 6 मिनट में छूट गई। न विल पावर का इस्तेमाल हुआ और न ही निकोटिन च्यूंगम का। यहां तक सिगरेट का रिप्लेसमेंट जैसे, खैनी, गुटखा, पान, ईलायची-लौंग भी नहीं लिया। सुनने में यह भले ही चमत्कार लगे या फिर कोरा झूठ, लेकिन यह सोलह आने सच है। सिगरेट से छुटकारा पाने वाला शख्स कोई और नहीं बल्कि मैं हूं।यह ऐसी सक्सेस है, जो हमारे पाठकों तक न पहुंचे तो मेरी सफलता व्यक्तिगत रह जाएगी। इसलिए यह खबर के रूप में पूरी जर्नी आपके सामने रख रहा हूं।

एक फूंक से शुरू हुई कहानी 15 सिगरेट तक पहुंची

आम लोगों की तरह मेरी भी स्मोकिंग की शुरुआत एक पफ यानी एक फूंक से ही हुई। गोरखपुर यूनिवर्सिटी में कंप्यूटर साइंस की पढ़ाई के दौरान दोस्तों ने सिगरेट को चैलेंज के तौर पर प्रस्तुत किया। इसके बाद पढ़ाई पूरी हुई, नौकरी शुरू हुई। नौकरी बदली, शहर बदले, लेकिन आदत नहीं बदली। सिगरेट की संख्या बढ़ती गई।

सिगरेट ने कर लिया माइंड हैक

सिगरेट की लत ऐसी लगी कि अब उसे पीने के लिए बहाने ढूढ़ने पड़ते थे। सुबह सोकर उठो तो सिगरेट, चाय के साथ सिगरेट, खाना खाने के बाद सिगरेट, गम हो तो सिगरेट और गुस्सा हो तो सिगरेट। बोर हो तो सिगरेट, बिजी हो तो सिगरेट। सिगरेट ने माइंड को इस तरह हैक कर लिया कि हर घंटे ऑटोमेटिक सिगरेट के लिए बेचैन होता था।

सिगरेट छोड़ने की 1000 कोशिशें क्यों हुईं बेकार

ऐसा नहीं है कि सिगरेट छोड़ने की मैंने कोशिश नहीं की। 2000 में लत लगी और 2006 से ही छोड़ने की 1000 कोशिशें की। काउंसलर से लेकर डॉक्टर तक, सभी को आजमाया, लेकिन नतीजा सिफर। बरेली में एक बार अचानक छोड़ा तो 6 महीने तक हाथ नहीं लगाया। सिगरेट के पैसे से एक 7500 रुपये का एक फ्रीज ले लिया। एक खबर भी लिख डाली, 'सिगरेट की कीमत पर खरीदिए घर और लाइए सपनों की कार', पर स्मोकिंग नहीं छूटी।

6 मिनट में कैसे छूटी सिगरेट

इस सच्ची कहानी का क्लाइमेक्स अभी 29 दिन पहले ही आया। सिगरेट छोड़ने में महज 6 मिनट लगे। 26 साल पुरानी सिगरेट की लत 6 मिनट में छूट गई। इसका मुझे आज तक यकीं नहीं हो रहा, लेकिन यह हो चुका है और आज मैं स्मोकफ्री हूं।

दरअसल दो महीने पहले एक 'गुरु' से मुलाकात फेसबुक पर हो गई। यह कोई इंसान नहीं बल्कि एक App है। फेसबुक पर बार-बार QuitSure का ऐड मुझे परेशान कर रहा थे। एक दिन मैंने उसे प्ले स्टोर से डाउनलोड कर लिया और ट्रॉयल के तौर पर इस्तेमाल करने लगा। तीन दिन बाद ही उसे मुझे सब्सक्राइब करना पड़ा।

क्या था ऐप में और कैसे छुड़ाई लत

मैंने 6 हफ्ते का प्रोग्राम चुना। यानी 42 दिन में सिगरेट छुड़ाने का प्रोग्राम। IIT और IIM के पास आउट द्वारा बनाया गया यह ऐप मेरी 26 साल की लत 42वें दिन के खत्म होने से चंद मिनट पहले तक एक भी सिगरेट कम नहीं कर पाया था।

बिना किसी उपदेश के ऐप मुझे विडियो और टेक्स्ट के जरिए क्रेविंग, डिसेप्शन, माइंडफुल स्मोकिंग, निकोटिन, रिसेप्टर्स, अर्ज, लॉ ऑफ स्मोकिंग जैसे तमाम टर्म्स के जरिए वैज्ञानिक तरीके से ट्रेंड करता रहा। 42वें दिन भी मैं 14 सिगरेट पी चुका था और नोटिफिकेशन आया This is Your Last Cigrettee. इस सिगरेट को पीने के लिए एक खास इंस्ट्रक्शन दिए गए थे। इसे 6 मिनट में पीना था। मैंनें छोटी गोल्ड फ्लैक 6 मिनट में खत्म की और स्मोक फ्री हो गया। जो सिगरेट कोर्स के दौरान भी नहीं छूट पाई, वह हमेशा-हमेशा के लिए लास्ट 6 मिनट में छूट गई।

Drigraj Madheshia

लेखक के बारे में

Drigraj Madheshia

दृगराज मद्धेशिया पिछले 21 वर्षों से पत्रकारिता जगत का एक विश्वसनीय चेहरा हैं। वर्तमान में 'लाइव हिन्दुस्तान' की बिजनेस टीम के एक महत्वपूर्ण सदस्य के रूप में, वे शेयर बाजार, कमोडिटी, पर्सनल फाइनेंस और यूटिलिटी सेक्टर पर अपनी गहरी पकड़ रखते हैं। वह कलम से बाजार की नब्ज टटोलने वाले एक पत्रकार हैं, जो शेयर बाजार से लेकर आपकी जेब (Personal Finance) तक, हर खबर को आसान बनाते हैं। टीवी, प्रिंट और डिजिटल मीडिया के अपने विस्तृत अनुभव के साथ, दृगराज जटिल मार्केट डेटा को आम पाठकों के लिए 'कुछ अलग' और आसान भाषा में पेश करने के लिए पहचाने जाते हैं। उन्होंने अपने करियर में हिन्दुस्तान, सहारा समय, दैनिक जागरण और न्यूज नेशन जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में अपनी सेवाएं दी हैं। मूलत: उत्तर प्रदेश के कुशीनगर जिले के रहने वाले दृगराज मैथ्स बैकग्राउंड होने के कारण डेटा और कैलकुलेशन में माहिर हैं, जो बिजनेस पत्रकारिता के लिए एक बड़ा प्लस पॉइंट है। उन्होंने कॅरियर की शुरुआत गोरखपुर से सहारा समय साप्ताहिक से बतौर फ्रीलांसर की और बहुत ही जल्द सहारा समय उत्तर प्रदेश/उत्तराखंड के हिस्सा बन गए। ​इसके बाद छत्तीसगढ़ में वॉच न्यूज से जुड़े। टीवी को छोड़ हिन्दुस्तान अखबार के बरेली एडिशन की लॉन्चिंग टीम का हिस्सा बने। साढ़े सात साल की मैराथन पारी के बाद अगला पड़ाव न्यूज नेशन डिजिटल रहा। इसके बाद एक बार फिर हिन्दुस्तान दिल्ली से जुड़े और अब डिजिटल टीम का हिस्सा हैं। और पढ़ें

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