साइबर ठगी का नया स्वरूप: धोखाधड़ी के वे तरीके जिनकी जानकारी हर भारतीय के लिए आवश्यक है
एक फर्जी पुलिस अधिकारी, एक कूरियर जो है ही नहीं और एक WhatsApp निवेश समूह। ये सभी अलग-अलग घटनाएँ प्रतीत होती हैं, लेकिन यही बात इन्हें खतरनाक बनाती है।

शायद ही लोग सुबह यह सोचकर उठते हों की वे आज किसी धोखाधड़ी के शिकार होने वाले हैं। वे फोन कॉल उठाते हैं क्योंकि उन्हें लगता है की वह ज़रूरी हो सकता है। वे एक मैसेज पर क्लिक करते हैं क्योंकि वे अपने पार्सल की प्रतीक्षा कर रहे होते हैं। वे ग्राहक सेवा नंबर ऑनलाइन खोजते हैं क्योंकि उनका भुगतान विफल हो गया होता है। इनमें से कोई भी निर्णय लापरवाही से लिया गया नहीं लगता है, बल्कि ये सभी निर्णय स्वाभाविक प्रतीत होते हैं।
भारत में साइबर ठगी के तरीकों में पिछले कुछ समय में यही मुख्य बदलाव आया है। अब अपराधी पहले की तरह सीधे बैंक खातों में सेंध लगाने के बजाय ऐसे जाल बिछाते हैं की लोग स्वयं ऐसी जानकारी उनके साथ साझा करते हैं, जिनसे उनके बैंक खातों तक पहुँच संभव हो जाती है।
जैसे-जैसे साइबर ठगी का दायरा और जटिलताएँ बढ़ती जा रही हैं, जागरूकता इससे बचने के सबसे असरदार तरीकों में से एक बन गई है। इस ज़रूरत को समझते हुए, बंधन बैंक की सीएसआर पहल 'साइबर कॉप', जिसका क्रियान्वयन एडेंट सोशल वेलफ़ेयर ऑर्गनाइज़ेशन द्वारा किया जा रहा है, साइबर सुरक्षा के प्रति जागरूकता बढ़ाने और नागरिकों को धोखाधड़ी के नए तरीकों को पहचानने में सहायता करने की दिशा में कार्य कर रही है, ताकि वे इनका शिकार बनने से बच सकें।
आंकड़े चिंताजनक स्थिति की ओर इशारा करते हैं
साइबर ठगी अब केवल कुछ इंटरनेट उपयोगकर्ताओं तक सीमित अपराध नहीं रह गई है। यह देश के सबसे तेज़ी से बढ़ते वित्तीय खतरों में से एक बन चुकी है। जनवरी 2026 तक, गृह मंत्रालय के सिटिजन फाइनेंशियल साइबर फ्रॉड रिपोर्टिंग एंड मैनेजमेंट सिस्टम (CFCFRMS) के माध्यम से24.65 लाख से अधिक शिकायतों के आधार पर साइबर ठगों द्वारा लगभग₹8,690 करोड़ की संभावित धोखाधड़ी को रोका गया है। इसके बावजूद इससे होने वाले वित्तीय नुकसान में लगातार वृद्धि हो रही है।
उपलब्धआँकड़ों के अनुसार, साइबर ठगी से होने वाला रिपोर्ट किया गया वित्तीय नुकसान 2021 में ₹551 करोड़ से बढ़कर 2022 में ₹2,290 करोड़ हो गया, फिर 2023 में ₹7,465 करोड़, 2024 में ₹22,848 करोड़ और 2025 में चिंताजनक रूप से ऊँचे स्तर ₹22,495 करोड़ पर बना रहा – यानी पाँच वर्षों में लगभग 4,000% की वृद्धि दर्ज की गई। इसी अवधि के दौरान, नेशनल साइबर क्राइम रिपोर्टिंग पोर्टल (NCRP) पर दर्ज वित्तीय धोखाधड़ी की शिकायतें 2021 में 2,62,846 से बढ़कर 2022 में 6,94,446, 2023 में 13,10,357, 2024 में 19,18,835 और 2025 में 24,02,579 तक पहुँच गईं।
हैरान करने वाली बात सिर्फ़ इसमें शामिल धनराशि नहीं है, बल्कि यह है कि इसे चुराने के लिए कितने अलग-अलग तरीकों का इस्तेमाल किया जा रहा है। किसी व्यक्ति को फोन कर बताया जाता है कि उसका आधार कार्ड किसी आपराधिक मामले से जुड़ा पाया गया है। किसी अन्य को एक पेशेवर ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म जैसा दिखने वाले माध्यम से निवेश के लिए मनाया जाता है। कोई ग्राहक सेवा का नंबर खोजते हुए अनजाने में साइबर ठग से संपर्क कर बैठता है। वहीं, कोई क्यूआर (QR) कोड यह समझकर स्कैन कर लेता है कि उसके खाते में धनराशि आएगी, जबकि वास्तव में वह भुगतान कर रहा होता है।
पहली नज़र में, ये सभी मामले एक दूसरे से बिल्कुल भिन्न प्रतीत होते हैं। लेकिन अगर आप थोड़ा ध्यान से देखें, तो एक पैटर्न दिखाई देने लगता है। लगभग हर सफल साइबर ठगी की शुरुआत पीड़ित को किसी कहानी पर भरोसा दिलाकर होती है, जिसके बाद उनसे राशि ठगी जाती हैं।
ठगी के तरीके बदल जाते हैं, लेकिन उनके पीछे की मनोवैज्ञानिक रणनीति लगभग समान रहती है। कुछ मामलों में भय का वातावरण बनाया जाता है, जबकि कुछ में तत्काल निर्णय लेने का दबाव डाला जाता है। कहीं आकर्षक अवसरों का लालच दिया जाता है तो कहीं विश्वास का लाभ उठाया जाता है। ऐसे में अलग-अलग प्रकार के तरीकों को याद रखने की अपेक्षा इन सामान्य प्रवृत्तियों को समझना अधिक उपयोगी हो सकता है, क्योंकि ठगी के तरीके भले बदलते रहते हैं, लेकिन उन्हें अंजाम देने की कार्यप्रणाली प्रायः एक जैसी रहती है।
साइबर ठगी के बदलते स्वरूप को देखते हुए जागरूकता आधारित पहलें भी आवश्यक होती जा रही हैं जैसे की साइबर कॉप, बन्धन बैंक की CSR पहल, जिसका क्रियान्वयन एडेंट सोशल वेलफेयर ऑर्गेनाइजेशन द्वारा किया जा रहा है, जो इनका शिकार बनने से पहले ही लोगों को साइबर धोखाधड़ी के शुरुआती संकेतों को पहचानने के लिए जागरूक कर रही है।
डिजिटल अरेस्ट: जब डर ही हथियार बन जाए
पिछले एक वर्ष में अगर कोई साइबर ठगी का तरीका सुर्खियों में रहा है तो वह डिजिटल अरेस्ट है। इसमें पीड़ित को कोई व्यक्ति पुलिस, सीबीआई, सीमा शुल्क (कस्टम्स) या किसी अन्य सरकारी एजेंसी का अधिकारी बताकर कॉल करता है। वह दावा करता है कि पीड़ित का आधार, मोबाइल नंबर या बैंक खाता धन शोधन (मनी लॉन्ड्रिंग), मादक पदार्थों की तस्करी अथवा किसी अन्य गंभीर अपराध से जुड़ा हुआ है। इससे पहले कि पीड़ित इस दावे पर सवाल उठाए, आगे इस प्रकार से बात की जाती है कि उस पर मानसिक दबाव बनाकर, उसे अकेला और भ्रमित महसूस कराया जाए ताकि वह कॉल करने वाले के निर्देशों का पालन करता रहे।
वास्तव में "डिजिटल अरेस्ट" नाम की कोई कानूनी प्रक्रिया नहीं है। इसके बावजूद भी इस प्रकार की ठगी के मामले सामने आते रहते हैं, क्योंकि यह एक बहुत ही साधारण बात का फायदा उठाता है — अनभिज्ञता। अधिकांश लोगों को यह पता ही नहीं होता है कि वास्तविक आपराधिक जाँच-पड़ताल कैसी होती है।
सरकारीआंकड़ें बताते हैं की पिछले कुछ वर्षों में "डिजिटल अरेस्ट" से संबंधित शिकायतों में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। इसके बाबत, गृह मंत्रालय, राज्य पुलिस बलों तथा भारतीय रिजर्व बैंक समय-समय पर नागरिकों को आगाह करते रहे हैं कि कोई भी जाँच एजेंसी किसी व्यक्ति से वीडियो कॉल पर बने रहने या अपनी बेगुनाही ‘’सिद्ध’’ करने के लिए धनराशि हस्तांतरित करने के लिए नहीं कहती है।
टेक्नोलॉजी का उपयोग केवल फ़ोन कॉल करने के लिए किया जा सकता है, लेकिन डर ही है जिससे बातचीत आगे बढ़ती है।
एआई आधारित साइबर धोखाधड़ी में इजाफा
यदि डिजिटल अरेस्ट डर का फ़ायदा उठाता है, तो एआई आधारित धोखाधड़ी लोगों के विश्वास का फ़ायदा उठाती है। एक परिचित आवाज़, एक विश्वसनीय प्रतीत होने वाला वीडियो, वीडियो कॉल पर दिखाई देने वाला चेहरा। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस ने इन सभी की नक़ल करना पहले की तुलना में अधिक आसान बना दिया है, जिससे धोखेबाज़ों को अपनी कहानियों को विश्वसनीय बनाने के नए साधन मिल रहे हैं।
बढ़ते खतरों को देखते हुए, गृह मंत्रालय और इंडियन साइबर क्राइम कोऑर्डिनेशन सेंटर (I4C) ने बैंकों तथा वित्तीय संस्थानों को एआई द्वारा तैयार किए गए डीपफेक और सिंथेटिक पहचान के संभावित दुरुपयोग को लेकर सतर्क किया है। इन तकनीकों का इस्तेमाल पहचान सत्यापन प्रणालियों को धोखा देने और वित्तीय धोखाधड़ी के लिए किया जा सकता है।
उपभोक्ताओं के लिए, इससे मिलने वाली सीख यह है कि केवल किसी परिचित आवाज़ या चेहरे के आधार पर किसी दावे को सही ना मानें । संदिग्ध लिंक या मैसेज की पहचान करने के साथ-साथ अब स्वतंत्र रूप से पुष्टि करना भी आवश्यक हो गया है।
फर्जी निवेश योजनाएँ : जब अवसर ही जाल बन जाए
हर साइबर धोखाधड़ी की शुरुआत धमकी से नहीं होती है। कुछ की शुरुआत अधिक लाभ कमाने के वादे से भी होती है। फर्जी निवेश प्लेटफ़ॉर्म, क्रिप्टोकरेंसी योजनाएँ और धोखाधड़ी वाले ऑनलाइन ट्रेडिंग समूह अक्सर पेशेवर प्रतीत होते हैं। इनमें पीड़ितों से शानदार लाभ का दावा किया जाता है, अधिक धनराशि निवेश करने के लिए उकसाया जाता है और सक्रिय "कस्टमर सपोर्ट" के माध्यम से उनका भरोसा बनाए रखा जाता है। लेकिन जब वे अपनी धनराशि निकालने का प्रयास करते हैं, तब या तो प्लेटफ़ॉर्म गायब हो चुका होता है या फिर कर और प्रोसेसिंग शुल्क के नाम पर अतिरिक्त भुगतान की माँग की जाती है।
इस प्रकार की धोखाधड़ी के मामलों में जाँच एजेंसियों के सामने संगठित नेटवर्क की भूमिका सामने आ रही है। हाल ही में, मध्य प्रदेश में ₹21 करोड़ के एक ऑनलाइन ट्रेडिंग के धोखाधड़ी केमामले की जाँच के दौरान पुलिस ने पाया कि ठगी की धनराशि 20,507 म्यूल बैंक खातों और लेन-देन के 12 स्तरों के ज़रिए घुमाई गई थी। यह मामला दर्शाता है कि चोरी का पैसा कई खातों के ज़रिए कितनी तेज़ी से चुराया जा सकता है।
धोखाधड़ी के आम तरीके : ठगी का तरीका बदलता है, लेकिन रणनीति वही रहती है
हर धोखाधड़ी राष्ट्रीय स्तर की ख़बर नहीं बनती। कई बार ऑनलाइन खोज करने पर कोई फर्जी ग्राहक सेवा नंबर मिलता है। कभी कोई क्यूआर (QR) कोड होता है, जो राशि मिलने का वादा करता है लेकिन उसे स्कैन करने पर भुगतान अधिकृत हो जाता है। वहीं, कुछ मामलों में पार्ट-टाइम नौकरी का झांसा देकर ज़्यादा पैसे वाले काम शुरू करने से पहले पैसे जमा करने को कहा जाता है। घटनाएँ अलग-अलग हो सकती हैं, लेकिन उद्देश्य एक ही होता है, तत्काल निर्णय लेने का दबाव बनाना, विश्वास हासिल करना और पीड़ित को तथ्य की पुष्टि करने का अवसर न देना।
इन बदलते तरीकों के साथ सरकार भी अपनी कार्रवाई का दायरा बढ़ा रही है। अक्टूबर 2025 तक, साइबर धोखाधड़ी से जुड़े9.42 लाख से अधिक सिम कार्ड और2.63 लाखसे अधिक मोबाइल आईएमईआई (IMEI) नंबरों को ब्लॉक किया जा चुका था। वर्ष 2025 के अंत तक यह संख्या बढ़कर11.14 लाख से अधिक सिम कार्ड और2.96 लाख से अधिक आईएमईआई (IMEI) तक पहुँच गई थी। ये आंकड़े साइबर अपराध में इस्तेमाल किए जा रहे नेटवर्क और संसाधनों के व्यापक स्वरूप को दर्शाते हैं।
यह चुनौती इसलिए भी बढ़ रही है क्योंकि देश का डिजिटल इकोसिस्टम भी लगातार बढ़ रहा है। वर्ष 2025 में181 अरबसे ज़्यादा UPI लेन-देन और लगभग100 करोड़ इंटरनेट उपयोगकर्ताओं के साथ, साइबर अपराधियों के पास संभावित शिकारों की संख्या पहले की तुलना में काफी बढ़ गई है।
यदि आप साइबर धोखाधड़ी के शिकार हो जाएँ तो क्या करें
यह पता चलने पर कि आपके साथ धोखाधड़ी हुई है, परेशान होना स्वाभाविक है। ऐसे समय में अक्सर लोग घबरा जाते हैं या यह समझने में अपना कीमती समय बर्बाद कर देते हैं कि आखिर हुआ क्या। लेकिन ऐसी परिस्थितियों में त्वरित कार्रवाई करना अधिक महत्वपूर्ण होता है।
अगर आपको लगता है कि आप साइबर ठगी का शिकार हुए हैं :
- घटना की रिपोर्ट करने के लिए तुरंत नेशनल साइबर क्राइम हेल्पलाइन नंबर 1930 पर कॉल करें।
- www.cybercrime.gov.in पर नेशनल साइबर क्राइम रिपोर्टिंग पोर्टल पर ठगी की रिपोर्ट करें।
- तत्काल अपने बैंक को सूचित करें और किसी भी संदिग्ध लेन-देन को ब्लॉक या फ़्रीज़ करने के लिए कहें।
- जिन खातों के प्रभावित होने की आशंका हो, उनके पासवर्ड तुरंत बदलें तथा जहाँ संभव हो, अतिरिक्त सुरक्षा सुविधाएँ सक्रिय करें।
- स्क्रीनशॉट, लेन-देन का विवरण, मैसेज और फ़ोन नंबर सहित जो कुछ भी आप सेव कर सकते हैं, उसे सेव कर लें, क्योंकि ये जाँच के दौरान मदद कर सकते हैं।
- आवश्यकता पड़ने पर स्थानीय पुलिस थाने में भी शिकायत दर्ज कराएँ।
साइबर ठगी के बाद के शुरुआती कुछ घंटे अत्यंत महत्वपूर्ण होते हैं। समय पर शिकायत दर्ज कराने से बैंक और संबंधित एजेंसियाँ शीघ्र कार्रवाई कर सकती हैं, जिससे आगे होने वाले वित्तीय नुकसान को सीमित करने की संभावना बढ़ जाती है।
जागरूकता ही सबसे प्रभावी बचाव है
साइबर अपराधी समय-समय पर ठगी के नए तरीके अपनाते रहेंगे लेकिन ऐसे में नागरिकों को भी चाहिए कि वे भी उसी गति से अपनी जागरूकता बढ़ाएँ। धोखाधड़ी के हर नए तरीके को याद रखना संभव नहीं है, लेकिन उसके संकेतों को पहचानना अवश्य संभव है।
क्या कोई व्यक्ति भय या घबराहट पैदा कर रहा है ? क्या तुरंत निर्णय लेने का दबाव बनाया जा रहा है? क्या स्थिति की पुष्टि करने का समय दिए बिना पैसे मांगे जा रहे हैं? ये सारे सवाल तब भी अहम होते हैं, जब मामला फर्जी पुलिस अधिकारी का हो, क्लोन की गई आवाज़ का हो या किसी आकर्षक निवेश प्रस्ताव का।
यहाँ पर 'साइबर कॉप', अहम भूमिका निभाता है जो की बंधन बैंक की CSR पहल है जिसे एडेंट सोशल वेलफेयर ऑर्गनाइज़ेशन ने क्रियान्वित किया है। इसका उद्देश्य नागरिकों के बीच साइबर सुरक्षा के प्रति जागरूकता बढ़ाना और सुरक्षित डिजिटल आदतों को बढ़ावा देना है। इसका उद्देश्य हर फ़ोन कॉल या मैसेज के प्रति अनावश्यक संदेह पैदा करना नहीं, बल्कि एक सरल और प्रभावी आदत को बढ़ावा देना है : रुकें, पुष्टि करें और रिपोर्ट करें।
क्योंकि आज के साइबर परिवेश में, कुछ क्षण का यह ठहराव बहुत बड़े वित्तीय नुकसान से बचा सकता है।
पाठकों के लिए नोट : यह लेख HT ब्रांड स्टूडियो द्वारा ब्रांड की ओर से तैयार किया गया है और इसमें HT की पत्रकारिता या संपादकीय भूमिका नहीं है।


