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30 अक्तूबर, 2020|1:15|IST

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दहशतगर्दों का साथ क्यों

पाकिस्तान में पल रहे दहशतगर्दों को लेकर अमेरिकी अधिकारियों की चिंता यह बताती है कि अमेरिका हमारे पड़ोसी मुल्क के आतंकी ठिकानों को नेस्तनाबूद करके अफगानिस्तान में अमन-चैन बहाल करने की इच्छा रखता है। अभी एक बड़े अमेरिकी खुफिया अधिकारी ने कहा है कि पाकिस्तान की दहशतगर्द जमातें भारत और अफगानिस्तान, दोनों मुल्कों में ‘हमले की योजना’ बना रही हैं। इस टिप्पणी में अफगानिस्तान और भारत, जैसे जांचे-परखे दोस्तों के लिए यह संदेश है कि वे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इन दहशतगर्दों के खिलाफ कदम उठाएं। यह सही है कि लंबे वक्त से पाकिस्तान के दहशतगर्द अफगानी अवाम का खून बहाते रहे हैं, मगर इस बार हमें कहीं ज्यादा गंभीर होना चाहिए। पाकिस्तान को यह हजम नहीं हो पा रहा कि काबुल और नई दिल्ली के रिश्ते बेहतर हो रहे हैं। एक समय तो अफगानिस्तान की पहचान सिल्क रोड और दूसरे कारोबारी रास्तों के लिए आर्थिक कॉरिडोर के रूप में हुआ करती थी। उस सुनहरे दौर को आज भी जीवंत किया जा सकता है, मगर हम अपनी अर्थव्यवस्था पर इसलिए कम ध्यान दे पा रहे हैं, क्योंकि पाकिस्तान दहशतगर्दों का साथ देकर हमसे एक बेमतलब की जंग में उलझा हुआ है। आखिर पाकिस्तान इससे क्या हासिल कर लेगा? तालिबान, अल-कायदा या आईएस जैसी जमातों का वह क्यों साथ दे रहा है, जबकि काबुल ने इस्लामाबाद से रिश्ते सुधारने की अहम कोशिश की है? यदि पाकिस्तान इस क्षेत्र में अपने सियासी, आर्थिक और वैचारिक प्रभाव बढ़ाने के लिए अफगानिस्तान पर नियंत्रण के ख्वाब देख रहा है, तो अच्छा यही होगा कि वह खुली आंखों से सपने देखना बंद करे। वक्त का तकाजा है कि काबुल व नई दिल्ली को लेकर वह अपने पूर्वाग्रहों को खत्म करे। उसे सोचना चाहिए कि दहशतगर्दों का साथ देकर उसने क्या हासिल कर लिया? इससे उसे दुनिया भर में बदनामी ही मिली है। अब चूंकि यह साफ है कि पाकिस्तान के दहशतगर्द हमला करने की सोच रहे हैं, तो अमेरिका, भारत और अफगानिस्तान को मिलकर इस्लामाबाद को सख्त पैगाम देना चाहिए कि वह या तो दहशतगर्दों पर काबू पाए या फिर कार्रवाई के लिए तैयार रहे।