videshi media hindustan column on 7 june - हाशिए के समाज का सच DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

हाशिए के समाज का सच

 

कैलाली की सांसद कालू देवी बिश्वकर्मा ने सोमवार को संसद में तमाम मशक्कत के बावजूद काठमांडू में मकान न मिलने की पीड़ा का बयान कर सबको चौंका दिया। संघीय समाजवादी फोरम की सांसद दो महीने से राजधानी में किराए का फ्लैट तलाश रही हैं, पर जातिवादी मानसिकता के सामने विफल हैं। दुर्भाग्यपूर्ण है कि पांच दशक पूर्व जाति आधारित भेदभाव अपराध घोषित होने के बावजूद दलित आज भी इसके शिकार हैं। निर्वाचित जन-प्रतिनिधि तक इससे नहीं बचे हैं। 2011 की जनगणना के अनुसार, नेपाल की कुल जनसंख्या का 13.13 प्रतिशत दलित हैं, हालांकि शोधार्थियों की नजर में यह आंकड़ा भी हकीकत से कम है। 1990 के राजनीतिक संक्रमण, विशेषकर 2006 के बाद देश ने पहचान व प्रतिनिधित्व से जुड़े कई राजनीतिक-सामाजिक बदलाव देखे, लेकिन बहुत कुछ अब भी नहीं बदला है। दलित अब भी राजनीति और समाज के हाशिए पर ही हैं। मधेसियों व जनजातीय समूहों की तुलना में इनका प्रतिनिधित्व नगण्य रहा है। प्रतिनिधित्व सार्वजनिक बहसों में भले ही मुद्दा हो, पर रहनुमाई के अभाव में इनकी आवाज वहां भी मुखर नहीं हो सकी। दलित महिलाएं तो आज भी सबसे ज्यादा उपेक्षित-उत्पीड़ित हैं। हालांकि वर्तमान संविधान के अनुच्छेद 40 में इनकेसशक्तीकरण और प्रतिनिधित्व के लिए कई प्रावधान हैं, जिसने इस समाज को उम्मीद बंधाई है। आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के अनुसार अब हर वार्ड में कम से एक दलित महिला प्रतिनिधि का होना अनिवार्य है और संसद में भी 13.8 प्रतिशत सीट दलितों के लिए आरक्षित हैं। यह सब है, कानून भी हैं, लेकिन मानसिकता नहीं बदली है। और सच है कि इसे बदले बिना महज सांविधानिक प्रावधानों से कुछ नहीं होगा। इसके लिए वैयक्तिक साझेदारी और समझदारी विकसित करनी होगी। निचली इकाइयों, स्कूल-कालेज और पाठ्यपुस्तकों के जरिए जागरूकता लानी होगी। संवैधानिक संस्थाओं से लेकर राजनीतिक-सामाजिक तानेबाना सक्रिय किए बिना सारे तो प्रयास ही नाकाम होंगे। 
 

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:videshi media hindustan column on 7 june