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रोहिंग्या समस्या और बांग्लादेश

इस वर्ष की शुरुआत से अब तक कम से कम 1,300 रोहिंग्या मुसलमान सीमा पार करके भारत से बांग्लादेश में दाखिल हो चुके हैं, जबकि इनमें से ज्यादातर वहां बरसों से रह रहे थे। इनका पलायन इस खौफ की वजह से शुरू हुआ है कि भारत उन्हें हिंदू अतिवादियों के दबाव में कहीं जबरन म्यांमार न भेज दे। जाहिर है, यह पूरा घटनाक्रम बहुत परेशान करने वाला और निराशाजनक है। बांग्लादेश पहले से ही एक लाख से अधिक रोहिंग्या शरणार्थियों का भार झेल रहा है, जिन्हें फौज के क्रूर नरसंहार से बचने के लिए म्यांमार से भागना पड़ा था। भारत से हजारों अन्य रोहिंग्या मुसलमानों की आमद से हालात निस्संदेह काफी जटिल हो जाएंगे। भारत हमारा करीबी पड़ोसी है और हमारा उसके साथ गहरा मेल-जोल है। म्यांमार के घटनाक्रम से भारत की हुकूमत अच्छी तरह वाकिफ भी है। वह जानती है कि रोहिंग्या मुसलमानों ने किस कदर जुल्म और तबाही झेली है। ऐसे में, यह पलायन रोहिंग्या-संकट को कम करने की बजाय उसे बढ़ाने वाला साबित होगा। इससे पहले, सऊदी अरब ने भी कथित रूप से उन रोहिंग्या प्रवासियों को निर्वासित करके बांग्लादेश भेज दिया था, जो वहां बिना दस्तावेज के पकड़े गए थे और जिनके पास गैर-कानूनी रूप से हासिल बांग्लादेशी पासपोर्ट था। इन सबसे यही लग रहा है कि बांग्लादेश चूंकि इस मानवीय संकट का सकारात्मक हल तलाशने की कोशिश में है, इसीलिए यह अवांछित रोहिंग्याओं का ‘ट्रांसफर स्टेशन’ यानी सिखकाने का अड्डा बन गया है। इस बीच म्यांमार ने भी, जो रोहिंग्या लोगों का मूल ठिकाना है, इनकी वतन-वापसी के लगभग सभी दरवाजे बंद कर दिए हैं। ऐसे में, हम यही जानना चाहते हैं कि हमारी हुकूमत के पास क्या इस संकट से निपटने की कोई योजना या रणनीति है? बहरहाल, बांग्लादेश को वैश्विक मंच पर अपना पक्ष मजबूती से रखना चाहिए। उसे दुनिया को बताना होगा कि यह मसला सिर्फ हमारा नहीं है। उसे यह भी जाहिर करना चाहिए कि यदि रोहिंग्या संकट का जल्दी हल नहीं निकाला गया, तो यह क्षेत्रीय के साथ-साथ वैश्विक स्थिरता को भी प्रभावित कर सकता है।

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  • Web Title:videshi media hindustan column on 21st january