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दाहाल की महत्वाकांक्षा 

नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी के को-चेयरमैन पुष्प कमल दाहाल दिल्ली की तीन दिनों की यात्रा में भारत के शीर्ष नेताओं- प्रधानमंत्री, विदेश मंत्री, गृह मंत्री और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार से तो मिले ही, भाजपा व कांग्रेस के प्रमुख नेताओं से भी मिले। ऐसी किसी उच्चस्तरीय यात्रा के हमेशा प्रतीकात्मक अर्थ होते हैं और स्वाभाविक ही यह यात्रा उससे अलग नहीं है। ऐसे में, दाहाल की यात्रा को उनकी खुद को नेपाल की सबसे बड़ी पार्टी के अध्यक्ष और भविष्य के प्रधानमंत्री के तौर पर पेश करने की महत्वाकांक्षा से जोड़कर देखा जा रहा है। वैसे दाहाल ने इसे हालिया द्विपक्षीय समझौतों की वस्तु स्थिति आंकने की यात्रा बताया है, ताकि तय समय-सीमा में उनका क्रियान्वयन सुनिश्चित किया जा सके। 2015 की नाकेबंदी के बाद रिश्तों की तल्खी द्विपक्षीय प्रयासों से दूर हुई और पद संभालने के बाद अप्रैल में प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली का पहली विदेश यात्रा के लिए भारत जाना, अगले ही माह नरेंद्र मोदी की यात्रा और फिर अगस्त में बिम्सटेक के बहाने मोदी का नेपाल आना इस दिशा में महत्वपूर्ण है। अब मोदी की वापसी के चंद रोज बाद ही

दाहाल वहां जाकर मोदी सहित तमाम प्रमुख नेताओं से मिले। हालांकि ऐसी यात्राओं में कुछ कूटनीतिक आचरणों का भी पालन करना होता है। यानी ऐसी यात्राओं में विदेश मंत्रालय के जिम्मेदार अफसरों का होना लाजिमी है, लेकिन हमारे नेता शायद ही कभी इसका पालन करते हैं। वे भूल जाते हैं कि यही परंपराएं हमारी संस्थागत संरचना की मजबूती का आधार हैं। इस बार भी यही हुआ। अन्य नेताओं की तरह न तो यात्रा से पहले दाहाल को मंत्रालय से ब्रीफिंग हुई, न दाहाल ने ही यात्रा से लौटकर मंत्रालय को कुछ बताना उचित समझा। इसे बदलना होगा। अब अगर दाहाल की यात्रा किसी  व्यक्तिगत मिशन के तहत थी, तो सवाल उठता है कि अपना कल बनाने के लिए दूसरे देशों की ऐसी परिक्रमा में कितनी समझदारी है? यह गुणा-गणित के अपने फॉर्मूलों पर पुनर्विचार का वक्त है। खुद को बदले बिना किसी तीसरे पक्ष को दोषी ठहराने से कोई लाभ नहीं होने वाला।
 

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  • Web Title:videshi media hindustan column on 12 september