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भारत ने लंबी राह दिखाई 

समलैंगिकता पर फैसला सुनाकर भारतीय सर्वोच्च अदालत ने औपनिवेशिक युग के कानून को उलट दिया। इसका स्वागत होना चाहिए, साथ ही उन देशों को भी आगे आना चाहिए, जहां यह होना अभी बाकी है। ऐसे देशों के लिए यह एक संदेश भी है। मान लीजिए कि आप समलैंगिक हों और उन 70 में से किसी मुल्क में रह रहे हों, जहां समलैंगिकता अपराध है, तो सहज कल्पना की जा सकती है कि वहां ऐसे लोगों की क्या हालत होगी? यौन अपराध के मामले में समलैंगिक हमेशा से ही दबाव में रहे हैं। कई बार ये दबाव असहनीय होते हैं। ऐसे में, भारतीय सर्वोच्च अदालत का पिछले सप्ताह आया यह फैसला खुश होने का पर्याप्त अवसर है। इसने न सिर्फ समलैंगिकता को अपराध के दायरे से बाहर किया है, बल्कि ऐसे नागरिकों को हर तरह की सांविधानिक सुरक्षा भी दी।

कोर्ट की टिप्पणी अत्यंत महत्वपूर्ण है कि-‘इस समुदाय को उनका हक देने में जो देरी हुई, उसके लिए इतिहास को इनसे माफी मांगनी चाहिए’। सच है कि कोस्टारिका, बुल्गारिया, बेलीज, त्रिनिदाद और टोबैगो भी हाल ही में समलैंगिकों के पक्ष में फैसला सुना चुके हैं, लेकिन भारत जैसे देश में इसके आकार और प्रभाव को देखते हुए इसे कमतर नहीं आंका जा सकता। माना जाता है कि वैयक्तिक आजादी के मामले में पश्चिम सबसे आगे है। सच है कि इंग्लैंड कभी भी सऊदी अरब या मलेशिया की तरह ऐसे मामलों में क्रूर नहीं रहा, लेकिन यह भी सच है कि 70 देशों में, जहां समलैंगिकता आज भी अपराध है, से 40 तो ब्रिटिश रूल से ही शासित रहे हैं। ब्रिटिश कानून विश्व में सबसे ज्यादा उदार भले कहे जाएं, समलैंगिकता को प्रतिबंधित करने वाली धारा 28 तो वर्ष 2003 तक यहां भी निरस्त नहीं हुई थी। भारत का यह कदम कई दृष्टियों से महत्वपूर्ण है। वहां जिस तरह लोग खुलेआम जश्न मनाकर इसके स्वागत में आगे आए, यह बताता है कि ये लोग समाज का कितना अहम हिस्सा थे। अब जब भारत जैसे विशाल देश में इतनी बड़ी बाधा दूर हो चुकी है, तो इसके समर्थकों को अन्य देशों में भी मजबूती से अपने हक की आवाज उठानी चाहिए।

 

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  • Web Title:videshi media hindustan column on 11 september