videshi media hindustan column on 10 march - संसद की गरिमा और राजनीति DA Image
14 नबम्बर, 2019|3:48|IST

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संसद की गरिमा और राजनीति

सीनेट के निवर्तमान चेयरमैन रजा रब्बानी और सीनेटर फरहतुल्लाह बाबर की चिंता जायज है कि संसद की सर्वोच्चता का तेजी से अवमूल्यन हो रहा है, लेकिन यह भी सच है कि इस अवमूल्यन के लिए हमारे राजनेता ही जिम्मेदार हैं। अब नवाज शरीफ राष्ट्रीय असेंबली की बैठकों से लगातार अनुपस्थित रहकर संसद की गरिमा को चार चांद नहीं ही लगा रहे थे। उनके मंत्री और सांसद भी उन्हीं की राह पर थे। पनामा गेट कांड पर संसद में बात करने की बजाय उन्हें सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप बेहतर लगा, लेकिन जब फैसला अपने ही खिलाफ आ गया, तो उन्हें संसद की गरिमा याद आने लगी। अलग बात है कि उन्होंने स्वयं भी कभी इसकी कोई खास चिंता की हो, ऐसा नहीं दिखता।

पीटीआई के मुखिया तो एक कदम और आगे दिखे। वह न सिर्फ बैठकों से गैर-हाजिर होते रहे, सार्वजनिक मंचों पर भी संसद की आलोचना करने में उन्हें गुरेज नहीं था। उनके एक खास समर्थक ने उसी मंच से जैसी टिप्पणी की, वह संसद की गरिमा को तार-तार करने वाली थी। सच तो ये है कि सरकार और विपक्ष, दोनों सिद्धांत तो खूब बघारते हैं, लेकिन अपनी सुविधानुसार। वे कब सिद्धांतों का चोला पहन लेंगे, कब उतार फेंकेंगे, शायद उन्हें भी नहीं पता रहता। पीएमएल-एन को ही लीजिए, उसने संविधान के कुछ महत्वपूर्ण प्रावधान हटाने पर पीपीपी का साथ महज इसलिए नहीं दिया, क्योंकि इससे शायद उसे ज्यादा फायदा मिल जाता।

जाहिर है, मौका मिलते ही पीपीपी ने भी कसर नहीं छोड़ी और नवाज शरीफ पर सख्त से सख्त कानूनी प्रावधान आयद करने का दबाव बना दिया। गोया यह कि मौका मिले, तो कोई पीछे नहीं रहना चाहता। अब जनता के टैक्स के पैसे की चोरी कर इनसे देश-विदेश में बेहिसाब संपत्ति बनाना भी संसद की गरिमा को चार चांद तो नहीं ही लगा रहा होगा। दरअसल निजी हितों के मामले में यह एक अघोषित गठजोड़ है, जिसने संसद को ‘धनिकों का क्लब’ बनाकर छोड़ दिया है। इस सब पर तत्काल अंकुश लगाने की जरूरत है, वरना इतनी देर न हो जाए कि चीजें हाथ से बिल्कुल ही निकल जाएं।

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