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युद्ध की धमकी क्यों?

जब यूरोप में द्वितीय विश्व युद्ध छिड़ गया था, तब एक रेडियो चैट में राष्ट्रपति फ्रेंकलिन रूजवेल्ट ने फ्रांस और इंग्लैंड के समर्थन में भावी संकेत दिए थे। जब भी किसी संघर्ष में देश उलझा है, अमेरिकी राष्ट्रपति देश से विस्तृत संवाद करते रहे हैं। जब अमेरिका और ईरान के बीच तनाव तेजी से बढ़ रहा है, जब बमवर्षक तैयार हैं, नौसेना समूह तैयार हैं, तब ट्रंप हमसे संवाद करते नहीं दिख रहे हैं। पिछले सप्ताह जब उनसे एक पत्रकार ने ईरान से लड़ाई की आशंका के बारे में पूछा, तो उन्होंने जवाब दिया, मैं इसकी आशा नहीं करता। लेकिन उन्होंने पिछले रविवार को अपनी ही बात को काटते हुए ट्विट कर दिया, ‘यदि ईरान लड़ना चाहता है, तो यह ईरान का आधिकारिक अंत होगा। यूनाइटेड स्टेट्स को फिर कभी धमकी न दें।’ जब ईरान पर प्रतिबंध कड़े होते जा रहे हैं, तब अमेरिका से एक जहाज इस क्षेत्र में पहुंचा और अमेरिकी दूतावास से सभी गैर-आपात अफसरों को स्वदेश वापस ले गया। यह कदम तो तब भी नहीं उठाया गया था, जब वर्ष 2014 में आईएस के आतंकी इराक भर में हमले बोल रहे थे। ट्रंप को समझना चाहिए कि वह क्या पाना चाहते हैं। क्या अमेरिका का कमांडर इन चीफ हिंसा के लिए सेना को तैयार कर रहा है? वह जनता को तैयार करने की अपनी भूमिका क्यों नहीं निभा रहा है? तात्कालिक आपात स्थिति से परे जब हम देखें, तो ट्रंप की मंशा को लेकर संदेह बने हुए हैं। ट्रंप प्रशासन प्रतिबंधों के जरिए अधिकतम दबाव बनाना चाहता है। यह रणनीति तब से कायम है, जब पिछले वर्ष अमेरिका ने वर्ष 2015 में हुए उस समझौते को ठुकरा दिया था, जिसके कारण ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम पर लगाम लगाए हुए था। ट्रंप के प्रमुख विदेश नीति सलाहकार, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार, जॉन बोल्टन ने तो ईरान के खिलाफ बल प्रयोग की वकालत करते हुए अपना करियर बनाया है। ट्रंप ने पहले कहा था कि वह ईरान के साथ युद्ध नहीं चाहते, लेकिन उन्होंने बोल्टन को अपने साथ क्यों ले लिया? उन्हें देश को बताना चाहिए कि योजना क्या है।
 

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