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महिला फुटबॉल

5 दिसंबर 1921 को इंग्लिश फुटबॉल संगठन ने अपने मैदानों पर महिलाओं के खेलने पर पाबंदी लगा दी थी और कहा था कि फुटबॉल का खेल महिलाओं के अनुकूल नहीं है, अत: उसे बढ़ावा नहीं दिया जाना चाहिए। संगठन का यह फैसला 50 वर्षों तक महिला फुटबॉल के लिए एक झटका बना रहा। खैर, वक्त बदला, महिला फुटबॉल विश्व कप के दौरान जब इंग्लैंड और अमेरिका के बीच सेमीफाइनल चल रहा था, तब उसके आधे से ज्यादा टीवी दर्शक इंग्लैंड में बैठे थे।

टूर्नामेंट के 10 लाख से ज्यादा टिकट बिके हैं। इससे पता चलता है कि महिला फुटबॉल की लोकप्रियता किस ऊंचाई पर है। वर्ष 1991 में पहली बार हुए विश्व कप की तुलना में इस बार दोगुने प्रत्यक्ष दर्शक मिले हैं। सैम केर, वेंडी रेनार्ड और टोबिन हेथ जैसी खिलाड़ियों से लड़कियों की नई पीढ़ी निस्संदेह प्रेरित होगी। ज्यादा से ज्यादा लड़कियां पेशेवर फुटबॉल को अपना करियर बनाएंगी। टूर्नामेंट के अंत में अमेरिका को जीत हासिल हुई। अमेरिकी टीम ने एक के बाद एक बेहतरीन प्रदर्शन किया है। हालांकि अभी भी महिला फुटबॉल को बढ़ावा देने के लिए बहुत कुछ करने की जरूरत है। यह सच्चाई है कि क्वार्टर फाइनल में पहुंचने वाली आठ में से सात टीमें यूरोप की थीं।

बेशक, इस टूर्नामेंट से जो विश्व स्तर पर माहौल बना है, उसका उपयोग महिला फुटबॉल क्लबों, लीगों की ओर नई खिलाड़ियों, प्रायोजकों, दर्शकों और प्रसारकों को आकर्षित करने के लिए होना चाहिए। इस विश्व कप का असर दिखने भी लगा है, फुटबॉल के राष्ट्रीय संघों पर महिला फुटबॉल के लिए फंडिंग और सहयोग बढ़ाने के लिए दबाव बढ़ा है। कुछ विवाद भी हैं, जैसे अमेरिकी फुटबॉल टीम की कप्तान ने कह दिया था कि जीतने के बाद वह राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से मिलने नहीं जाएंगी। अब ट्रंप नाराज बताए जा रहे हैं। इसके अलावा अमेरिकी टीम ने न्यायपूर्ण भुगतान की मांग करते हुए कानूनी रास्ता भी अख्तियार किया है। कई देश हैं, जो अपनी महिला खिलाड़ियों को कोई भुगतान नहीं करते और कई देश ऐसे भी हैं, जिनके पास महिला टीम नहीं है, लेकिन हवा में बदलाव की सुगबुगाहट है।

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