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ईरान पर संयम 

जहां एक ओर, वाशिंगटन इन दिनों तेहरान पर लगातार अधिकतम दबाव बढ़ाता जा रहा है, वहीं दूसरी ओर, ईरान ऐसे दबाव को पूरी बेचैनी के साथ टालने के प्रयास में लगा है। तेहरान और वाशिंगटन के बीच परस्पर धमकियों में बढ़ोतरी तय लगती है। दोनों देश अनपेक्षित संघर्ष की आशंका को बढ़ा रहे हैं। वाशिंगटन को ही निश्चित रूप से जिम्मेदार ठहराना चाहिए, उसने बड़ी मुश्किल से हुए परमाणु संधि को अवास्तविक दावे करते हुए खारिज कर दिया। ईरान पर संधि की शर्तों को तोड़ने का आरोप लगाया गया। इस तात्कालिक निर्णय ने झगड़े का पिटारा खोल दिया। जैसा कि तेहरान ने आधिकारिक तौर पर घोषणा की है, उसके यूरेनियम के भंडार ने 300 किलोग्राम की सीमा को पार कर लिया है और संवद्र्धन का स्तर अब 3.67 प्रतिशत से ऊपर है। ईरान अन्य सौदा प्रतिबद्धताओं पर वापस जाता है, तो चीजें तेजी से 2015 से पूर्व की स्थिति में वापस आ जाएंगी, लेकिन ऐसा करते हुए तेहरान खुद का ही नुकसान करेगा। उसके खिलाफ प्रतिबंधों को कम करने के लिए चल रहे अंतरराष्ट्रीय प्रयासों से वह वंचित हो जाएगा। साथ ही, इससे वाशिंगटन को दबाव और तेज करने के लिए बहाना मिल जाएगा। अमेरिकी ड्रोन को मार गिराए जाने के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति ने अनुमोदित हमले को वापस लेने का फैसला किया, लेकिन इसे अमेरिका की कमजोरी के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि दोनों पार्टियां आगे भी उतनी ही समझदार रहेंगी, जितनी खतरनाक गलतफहमी की वजह से हुई हैं। डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को सावधान रहने की चेतावनी दी है। अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोम्पिओ ने भी अलगाव और प्रतिबंधों की चेतावनी दी है। हमारी सलाह है, सभी पक्ष बहुत सावधान रहें, ताकि यह मामला पहले की तरह तनावों में वापस न जाए। ईरान को पूरा अधिकार है कि वह अपना बचाव करे। उसने कहा भी है कि यूरोपीय भागीदारों के साथ बातचीत के रास्ते खुले हैं और आशा भी व्यक्त की है कि ये देश जरूरी कदम उठाएंगे। आगे का रास्ता खोजने के लिए ईरान के पास 60 दिन हैं। 
 

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  • Web Title:videshi media hindustan column 10 july