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ट्रेड वार के प्रति कितने सजग हम

जिस तरह से दुनिया की दो आर्थिक महाशक्तियों- चीन और अमेरिका के दरम्यान कारोबारी जंग एक गंभीर रुख लेती जा रही है और उनके आपसी रिश्तों में भी तल्खी बढ़ रही है, उसे देखते हुए तमाम विशेषज्ञ बेहद चिंतित हैं। ‘फ्रॉम ग्लोबलाइजेशन टु प्रोटेक्शनिज्म: इंप्लिकेशन्स फॉर द डेवलपिंग वर्ल्ड’ शीर्षक विमर्श से हमें यह सीखने की जरूरत है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था में बढ़ते संरक्षणवाद का प्रभाव पूरे इलाके की अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ने जा रहा है। जिस तरह से टैरिफ यानी सीमा-शुल्क में 30 से 35 फीसदी की बढ़ोतरी की जा रही है, इसका सीधा-सीधा असर व्यापार के वॉल्यूम पर पड़ेगा। इसलिए हमारे नीति-नियंताओं को अपनी प्रतिस्प्द्धिधता, उत्पादन क्षमता और सेवा गुणवत्ता को ज्यादा मजबूत करना होगा, ताकि हम हालात से बेहतर रूप से निपट सकें। पिछले कुछ वर्षों से बांग्लादेश व्यापार सुगमता यानी ईज ऑफ डूइंग बिजनेस की कसौटी पर अच्छा नहीं कर रहा है। यदि हम निकट भविष्य में उपलब्ध हो सकने वाले अवसरों का लाभ उठाना चाहते हैं, तो हमें इसके लिए पहले से ही तैयार रहना होगा। ध्यान देने की बात यह है कि ये अवसर खुद-ब-खुद पैदा हो सकते हैं, क्योंकि अमेरिका चीन पर टैरिफ-दबाव बढ़ाता ही जा रहा है। बांग्लादेश को विदेशी निवेशकों के लिए ‘वन-स्टॉप’ सेवा शुरू करने की तरफ फौरन कदम उठाना चाहिए। इसी तरह, निर्यात होने वाली वस्तुओं के लदान में काफी वक्त जाया होता है, इसे भी दुरुस्त किए जाने की जरूरत है।

हमें यह याद रखना चाहिए कि एशियाई हलके में बांग्लादेश कोई अकेला मुल्क नहीं है, जो अमेरिका और चीन के बीच जारी ट्रेड-वार को अपनी पैनी निगाहों से देख रहा हो और यह बताने की जरूरत नहीं कि संभावित मौकों का फायदा वही अर्थव्यवस्थाएं उठा पाएंगी, जिनके पास ऑफर करने को कुछ बेहतर होगा। मगर अफसोस, हम सुधारों के मामले में संतोषजनक काम नहीं कर पा रहे, जो दुनिया में हमारी छवि को प्रभावित कर रहा है। बाहर हमें एक ऐसे मुल्क के तौर पर देखा जाता है, जहां कारोबार शुरू करना बहुत आसान नहीं है।
   

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  • Web Title:videshi media column of hindustan on 9th november