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वेनेजुएला संकट और अमेरिका

दुनिया भर के चालीस से भी अधिक देशों ने, जिनमें यूरोप और दक्षिण अमेरिका के ज्यादातर मुल्क शामिल हैं, वेनेजुएला में निकोलस मादुरो की तानाशाह हुकूमत को अलग-थलग करते हुए विपक्ष के नेता जॉन ग्वाइदो को अंतरिम राष्ट्रपति के रूप में अपना समर्थन दिया है। ट्रंप प्रशासन के बयानों और इसके कुछ वामपंथी आलोचकों को सुनकर, जो वेनेजुएला के संकट के लिए हमेशा से अमेरिका पर आरोप लगाते आए हैं, आप शायद पूरी सच्चाई नहीं जान पाएंगे। और यदि वहां मादुरो की मौजूदा अवैधानिक सरकार को हटाने का प्रयास कामयाब होता है, तो ट्रंप प्रशासन को यह खास ख्याल रखना चाहिए कि अमेरिका को इसका नायक न बनने दें। खबरों के मुताबिक, राष्ट्रपति ट्रंप अपने प्रशासन के शुरुआती दिनों से ही वेनेजुएला के घटनाक्रमों को लेकर चिंतित रहे हैं। लेकिन जॉन ग्वाइदो के उदय के पीछे मुख्य पहल कनाडा और कुछ लैटिन अमेरिकी देशों की है। इन देशों ने ही 2017 में इस संकट के समाधान के लिए ‘लीमा ग्रुप’ का गठन किया था। पिछले महीने इस समूह ने यह एलान किया था कि वह मादुरो के नए राष्ट्रपति काल को मान्यता नहीं देगा, क्योंकि उनका चुनाव एक फर्जीवाड़ा है। लीमा गु्रप की पहल से प्रेरित होकर ही वेनेजुएला की नेशनल असेंबली जॉन ग्वाइदो के पीछे खड़ी हुई और बाद में उन्हें सांविधानिक प्रावधानों के तहत अंतरिम राष्ट्रपति घोषित किया गया। ट्रंप प्रशासन भी ग्वाइदो को मान्यता देते हुए लीमा ग्रुप के साथ हो गया और इसके बाद से ही मादुरो को हटाने के लिए उसने कई बडे़ कदम उठाए। इसने ग्वाइदो के उस आह्वान का भी समर्थन किया है, जिसमें वह अपनी फौज से पाला बदलने की अपील कर रहे हैं। यह बेहद जोखिम वाली रणनीति है।  यदि फौज कोई प्रतिक्रिया नहीं देती और मादुरो के साथी क्यूबा, रूस और उन तमाम सरकारों से मदद मांगते हैं, जो अब भी उनका समर्थन कर रही हैं, तो यह विफल हो सकती है। इसीलिए ट्रंप प्रशासन को लीमा ग्रुप के साथ मिलकर काम करना चाहिए और क्षेत्रीय आम सहमति से खुद को अलग रखने से बचना चाहिए।
  

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  • Web Title:videshi media column of Hindustan on 9 february