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नोपल का रेल संपर्क

लगभग एक सदी पहले छोटी लाइन की ट्रेनों के जरिए नेपाली कस्बों को जोड़ने की शुरुआत हुई थी और इसमें कुछ इलाके भारत के सीमावर्ती भी थे। इसका मूल मकसद लकड़ी का परिवहन था, लेकिन कुछ ट्रेनों से यात्री भी आते-जाते थे। एक को छोड़कर इनमें से प्राय: सभी इतिहास बनते गए हैं। देश में हाईवे का जाल बिछाने के नाम पर जो खेल चला, रेलवे उसमें प्राथमिकताओं में सबसे पीछे चला गया। ट्रैक की हालत बद से बदतर होती गई और आखिरकार ट्रेन सेवाएं रोक देनी पड़ीं। अब जब सरकार ने काठमांडू-चीन रेलमार्ग बनाने की योजना पर काम शुरू किया है, तो स्वाभाविक रूप से इन पुरातन रेलवे ट्रैक के दिन भी बहुरते दिख रहे हैं। बुद्धनगर, बिराटनगर और बथनाहा (बिहार) को जोड़ने वाला ट्रैक हाल ही में अपग्रेड हुआ और सोमवार को टेस्ट रन भी हो गया। शायद दिसंबर में यह रफ्तार भी पकड़ लेगा। यह अच्छी शुरुआत है, लेकिन अगर हम भारत-चीन के साथ-साथ व्यापक देश-दुनिया से जुड़ने का सपना देख रहे हैं, तो इसे स्थायित्व देने के लिए अभी बहुत कुछ करना होगा।

वर्षों से तो हम यही मानते आए हैं कि रेल सेवाएं नेपाल के लिए व्यावहारिक ही नहीं हैं। पहाड़ी बनावट और वित्तीय लागत का रोना रोते रहे। लेकिन अब जब प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने देश के भीतर ही नहीं, बाहरी दुनिया से भी रेल कनेक्टिविटी का सपना देखना शुरू किया है, तो हम उम्मीद कर सकते हैं। नेपाल में रेलवे की शुरुआत 1927 में अमलेखगंज-रक्सौल रेल लाइन से हुई थी, जिसका मूल मकसद भारत को निर्यात की लकड़ी पहुंचाना था। अस्सी साल पहले जनकपुर-जयनगर रेल लाइन बनी, लेकिन 15 साल पहले बाढ़ में तबाह क्या हुई, उपेक्षित ही पड़ी है। भारत और चीन जैसे दो प्रमुख पड़ोसी जब अपने यहां रेल परिवहन पर इतना आगे निकल गए हों, नेपाल की प्राथमिकताओं में यह कभी रहा ही नहीं। अब समय आ गया है कि नेपाल के हर योजनाकार की योजना रणनीति में रेल परिवहन सर्वोच्च प्राथमिकताओं में शामिल किया जाए। यह वक्त की भी मांग है, देश के लिए जरूरी भी।
 

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  • Web Title:Videshi media column of hindustan on 8th November